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Gorakhpur News: शव पहुंचते ही घर में मचा कोहराम, इकलौते बेटे का चेहरा भी नहीं देख सकी मां
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घर पर एंबुलेंस से पहुंचा शव।
गोरखपुर। महाराजगंज जिले में पोस्टमार्टम के बाद अंबुज उर्फ रीशु का शव मंगलवार देर शाम तिवारीपुर थाना क्षेत्र के सूरजकुंड स्थित घर पहुंचा तो चीख-पुकार मच गई। घर के बाहर एंबुलेंस में इकलौते बेटे का चेहरा भी न देख पाने के चलते मां रेखा त्रिपाठी बदहोश होकर जमीन पर गिर पड़ीं। उनकी चीखों ने पूरे माहौल को ऐसा हिला दिया कि वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। अंबुज की छोटी बहन राधा फफक-फफक कर रो रही थी।
मंगलवार को देर शाम एंबुलेंस के रुकते ही आसपास करीब 200 की संख्या में भारी जुट गई। लोगों में गुस्सा साफ दिख रहा था। इसी बीच कई लोग आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर सड़क पर उतरने की कोशिश करने लगे। लेकिन मौके पर मौजूद अधिकारियों ने सभी को समझाकर शांत किया। घर के बाहर भारी पुलिस बल तैनात कर स्थिति को नियंत्रित किया गया। अंबुज का चेहरा क्षतविक्षत होने के चलते मां को एंबुलेंस के पास नहीं ले गया। बेटे का चेहरा न देख पाने से वह बदहवाश हो गईं। रो-रोकर उनका बुरा हाल था। अंबुज के पिता ने एंबुलेंस के अंदर ही पिंडदान किया। भावुक होकर उन्होंने कहा कि बेटा तो चला गया...अब बस इंसाफ चाहिए। भीड़ की बढ़ती संख्या और तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए शव को महज 15 मिनट ही घर के बाहर रोका गया। इसके बाद पुलिस की निगरानी में शव को राजघाट पर ले जाया गया। जहां पिता संतोष मणि त्रिपाठी ने मुखाग्नि दी।
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मंगलवार को देर शाम एंबुलेंस के रुकते ही आसपास करीब 200 की संख्या में भारी जुट गई। लोगों में गुस्सा साफ दिख रहा था। इसी बीच कई लोग आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर सड़क पर उतरने की कोशिश करने लगे। लेकिन मौके पर मौजूद अधिकारियों ने सभी को समझाकर शांत किया। घर के बाहर भारी पुलिस बल तैनात कर स्थिति को नियंत्रित किया गया। अंबुज का चेहरा क्षतविक्षत होने के चलते मां को एंबुलेंस के पास नहीं ले गया। बेटे का चेहरा न देख पाने से वह बदहवाश हो गईं। रो-रोकर उनका बुरा हाल था। अंबुज के पिता ने एंबुलेंस के अंदर ही पिंडदान किया। भावुक होकर उन्होंने कहा कि बेटा तो चला गया...अब बस इंसाफ चाहिए। भीड़ की बढ़ती संख्या और तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए शव को महज 15 मिनट ही घर के बाहर रोका गया। इसके बाद पुलिस की निगरानी में शव को राजघाट पर ले जाया गया। जहां पिता संतोष मणि त्रिपाठी ने मुखाग्नि दी।
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