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UP: महामारी की पहली आहट पकड़ेंगे 'डिजीज डिटेक्टिव', एम्स में 19 डॉक्टरों की मिल रही 'जासूसी' ट्रेनिंग
Thu, 06 Aug 2026 02:17 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
निखिल तिवारी, गोरखपुर
निखिल तिवारी, गोरखपुर
Published by: गोरखपुर ब्यूरो
Updated Thu, 06 Aug 2026 02:17 AM IST
सार
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) ने फील्ड एपिडेमियोलॉजी ट्रेनिंग प्रोग्राम (एफईटीपी) के लिए एम्स गोरखपुर को क्षेत्रीय केंद्र बनाया है। इंटरमीडिएट फील्ड एपिडेमियोलॉजी ट्रेनिंग प्रोग्राम (आई-एफईटीपी) के तहत एम्स गोरखपुर और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मदद से 19 डॉक्टरों को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
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गोरखपुर एम्स
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
बीमारी फैलने से पहले ही अब उसके संकेत पकड़ लिए जाएंगे। अचानक बढ़ते बुखार, डायरिया या किसी नए संक्रमण की पहचान शुरुआती दौर में ही हो सकेगी। इसके लिए एम्स गोरखपुर यूपी और बिहार के डॉक्टरों को ‘डिजीज डिटेक्टिव’ की तरह तैयार कर रहा है।
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यह प्रशिक्षण सामान्य चिकित्सा शिक्षा से अलग है। इसमें डॉक्टरों को सिखाया जाता है कि किसी बीमारी के बढ़ते मामलों के पीछे की वजह कैसे पता करें, संक्रमण कहां से फैल रहा है और उसे रोकने के लिए कौन से कदम उठाए जाएं।
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स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) ने फील्ड एपिडेमियोलॉजी ट्रेनिंग प्रोग्राम (एफईटीपी) के लिए एम्स गोरखपुर को क्षेत्रीय केंद्र बनाया है। इंटरमीडिएट फील्ड एपिडेमियोलॉजी ट्रेनिंग प्रोग्राम (आई-एफईटीपी) के तहत एम्स गोरखपुर और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मदद से 19 डॉक्टरों को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इसमें यूपी के 15 और बिहार के चार मेडिकल ऑफिसर शामिल हैं। ये डॉक्टर बीमारी के फैलने के कारण, उसके स्रोत और संभावित खतरे की पहचान करना सीख रहे हैं। प्रशिक्षण के बाद ये अपने-अपनी तैनाती वाले जिलों में जाकर वास्तविक परिस्थितियों में काम करेंगे।
इसमें यूपी के 15 और बिहार के चार मेडिकल ऑफिसर शामिल हैं। ये डॉक्टर बीमारी के फैलने के कारण, उसके स्रोत और संभावित खतरे की पहचान करना सीख रहे हैं। प्रशिक्षण के बाद ये अपने-अपनी तैनाती वाले जिलों में जाकर वास्तविक परिस्थितियों में काम करेंगे।
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पहला प्रशिक्षण सत्र पूरा होने के बाद सभी डॉक्टरों को उनके तैनाती वाले जिलों में फील्ड असाइनमेंट दिए गए हैं। वहां वे बीमारी के मामलों की निगरानी करेंगे और उनसे जुड़े आंकड़ों का अध्ययन करेंगे। सितंबर में होने वाले अगले प्रशिक्षण सत्र में उनके काम की समीक्षा की जाएगी।
एम्स के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के डॉ. यू वेंकटेश इस कार्यक्रम के नोडल अधिकारी हैं। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान डॉक्टरों को बीमारी के समूह (क्लस्टर) की पहचान, फील्ड सर्विलांस, संदिग्ध संक्रमण की जांच और आंकड़ों के वैज्ञानिक विश्लेषण की जानकारी दी जा रही है। इसके आधार पर बीमारी को नियंत्रित करने की रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी।
एम्स के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के डॉ. यू वेंकटेश इस कार्यक्रम के नोडल अधिकारी हैं। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान डॉक्टरों को बीमारी के समूह (क्लस्टर) की पहचान, फील्ड सर्विलांस, संदिग्ध संक्रमण की जांच और आंकड़ों के वैज्ञानिक विश्लेषण की जानकारी दी जा रही है। इसके आधार पर बीमारी को नियंत्रित करने की रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी।
देश के 14 संस्थानों में शुरू हुआ कार्यक्रम
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने देश के 14 प्रमुख चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में इस कार्यक्रम की शुरुआत की है। इसमें यूपी में एम्स गोरखपुर के साथ क्षेत्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण प्रशिक्षण केंद्र, मेरठ भी शामिल है।
इसका उद्देश्य ऐसे विशेषज्ञ तैयार करना है जो मरीजों के इलाज के साथ-साथ बीमारी के फैलाव को समझ सकें और समय रहते खतरे का पता लगा सकें। प्रोग्राम में डॉक्टरों को किसी बीमारी के अचानक बढ़ने की जांच, संक्रमण के स्रोत की तलाश और स्वास्थ्य विभाग को जरूरी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराने का प्रशिक्षण दिया जाता है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने देश के 14 प्रमुख चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में इस कार्यक्रम की शुरुआत की है। इसमें यूपी में एम्स गोरखपुर के साथ क्षेत्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण प्रशिक्षण केंद्र, मेरठ भी शामिल है।
इसका उद्देश्य ऐसे विशेषज्ञ तैयार करना है जो मरीजों के इलाज के साथ-साथ बीमारी के फैलाव को समझ सकें और समय रहते खतरे का पता लगा सकें। प्रोग्राम में डॉक्टरों को किसी बीमारी के अचानक बढ़ने की जांच, संक्रमण के स्रोत की तलाश और स्वास्थ्य विभाग को जरूरी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराने का प्रशिक्षण दिया जाता है।
कोविड-19 के बाद महामारी की समय रहते पहचान और उसकी वैज्ञानिक जांच की जरूरत और बढ़ गई है। यह कार्यक्रम जिला स्तर पर ऐसी क्षमता विकसित करेगा जिससे डेंगू, जापानी इंसेफेलाइटिस, एईएस, डायरिया और अन्य संक्रामक रोगों के संभावित प्रकोप को शुरुआती चरण में नियंत्रित करने में मदद मिलेगी: डॉ. विभा दत्ता, कार्यकारी निदेशक, एम्स