Taaza Khabar Review: दलाल बंधुओं ने इस बार भुवन बाम को लपेटा, पहली ओटीटी सीरीज में हाथ आया काला खट्टा कोकाकोला
अभी क्या बोलेगा मैं, साल शुरू शुरू होएला है। डिज्नी वाला पूरी दुनिया को मेल भेज भेजकर बता रहेला है कि उनका पीछू के साल में कैसा धमाल बिजनस हुआ। बोले तो फिल्म पे फिल्म हिट। खोखा का खोखा अंदर। टोटल 16 पिक्चर तो केवल थिएटर में रिलीज किया। और कमाई मालूम? 4.9 बिलियन डॉलर। गांधीजी वाले नोट में बदलेगा तो गिनती करने को भी भारी पड़ेगा। लेकिन, रुको, मोबाइल वाला कैलकुलेटर लेके बोलता है अपुन। 405 अरब रुपये के ऊपर हिसाब बैठता है बाप। अभी मिंडी लगाकर लिखने जाएगा तो पूरा एक लाइन कम पड़ जाएंगा। इतना रोकड़ा सिर्फ पिक्चर से जिस कंपनी के पास आ रहा होएंगा, उसको ये ‘ताजा खबर’ जैसा चिंदी सीरीज चलेगा कि नहीं चलेगा, क्या फर्क पड़ने वाला है। इंडिया के डिज्नी ऑफिस में मुंडी बदलता रहता है बस। इधर सब येईच लोग चमत्कार भी करता है और जादू भी। बोले तो, ‘लक्ष्मी’ से लेकर ‘कठपुतली’ तक का फिलम इसी ओटीटी पर आने का। और, ये गोची देने वाला ‘ताजा खबर’ जैसा सीरीज भी। राइटर लोग ऐसा है कि मुतारी को मूत्री लिखता है। बाकी क्या समझेगा ये चाल पट्टी के बोल बचन को....
भुवन बाम की पहली ओटीटी सीरीज
आपको लग रहा होगा कि ये क्या हो गया। ये किस भाषा में मैं आज रिव्यू लिखने बैठ गया। लेकिन, समझने वाली बात ये है कि गंगा किनारे पैदा होकर अवधी बोलने वाले परिवार में पैदा हुआ मैं, अगर मुंबइया बोली इतने आराम से लिख सकता हूं तो ये ‘ताजा खबर’ जैसी सीरीज को हरी झंडी दिखाने वाले डिज्नी+ हॉटस्टार के लोग सिर्फ इसी बोली पर इतना लट्टू कैसे हो सकते हैं, क्योंकि इस वेब सीरीज में और तो कुछ भी नहीं है देखने समझने को। ‘टोड्स एंड डायमंड्स’ की कहानी में ‘बदमाश कंपनी’ का तड़का मारकर पेश की गई इस बासी दाल में उबाल तो आने से रहा और इसके सबसे बड़े गुनहगार अगर कोई हैं तो वह हैं इसके राइटर हुसैन दलाल और अब्बास दलाल। कहानी ओरिजिनल नहीं है। सेटअप दर्जनों फिल्मों में देखा हुआ है। लघुशंका और दीर्घशंका स्थल (सार्वजनिक शौचालय) के आसपास बुनी गई इस कहानी में भले दलाल बंधुओं को देसी ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ जैसी चमक दिखी हो लेकिन हकीकत यही है कि देश के शानदार यूट्यूबर भुवन बाम को दिखाया गया ये एक ऐसा ख्वाब है जिसने उनके अभिनय करियर को एक पायदान ऊपर चढ़ाने की बजाय चार पायदान नीचे ला दिया है। ध्यान देने वाली बात ये है कि भुवन बाम अपनी इस पहली ओटीटी सीरीज के निर्माता भी हैं।
ओटीटी का नया ‘भगवान’!
वेब सीरीज ‘ताजा खबर’ की कहानी कॉकटेल की तरह है। अमिताभ बच्चन की शख्सियत जैसे कुछ नींबू के कतरे भी इस गिलास की रिम में अटके हुए हैं। कहानी को बसने में भी काफी समय लगता है। नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म ‘मिन्नल मुरली’ ने एक आम इंसान के सुपरहीरो बन सकने का जो सपना बुना, उस पर वेब सीरीज ‘ताजा खबर’ इस विचार से धार चढ़ाने की कोशिश करती दिखती है कि अगर भविष्य का पक्का पता पहले से किसी को चल जाए तो क्या वह वाकई खुद को भगवान समझ बैठेगा? ‘सेक्रेड गेम्स’ में जैसे गणेश गायतोंडे कहता है, ‘कभी कभी लगता है अपुन ही भगवान है।’ यहां भुवन बाम को वसंत गावड़े बनाया गया और संवाद मिला, ‘कहीं मैं भगवान तो नहीं!’ इन सारे संवादों को लिखने वालों को एक बार डैनियल क्रेग की आखिरी जेम्स बॉन्ड फिल्म ‘नो टाइम टू डाय’ फिर से देखनी चाहिए जो साफ साफ कहती है, ‘जो भगवान बनने की कोशिश करते हैं, इतिहास उनके प्रति दयालु कभी नहीं होता।’
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किस्मत ने सजाया जुगाड़ का बाजार
‘ताजा खबर’ के बस नाम में ही ताजा है बाकी इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जिसमें किसी तरह की ताजगी दिखती हो। सब कुछ जुगाड़ का लगता है वैसा ही जैसा कि इसमें किस्मत बने महेश मांजरेकर कहते हैं कि उनका बाजार जुगाड़ से चलता है। उधर, गावड़े क्रिप्टो से लेकर क्रिकेट तक के नतीजे एडवांस में बताने का जुगाड़ जान गया है। सीरीज की दूसरी कमजोर कड़ी कहानी का हीरो गावड़े है। बीएमसी की मुतारी पर बैठने से लेकर चेम्बूर का चीता और भी न जाने क्या क्या जानवरपंती करने वाला ये नायक एक भी एपिसोड में हकीकत से नाता नहीं बनाता। सीरीज की सेटिंग ऐसी है कि खाना खाने के बाद इसे देखने बैठो तो उबकाई आने लगे और खाना खाने से पहले देखने बैठो तो फिर देर तक खाना खाने का मन न करे।
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डिज्नी+ हॉटस्टार का हैप्पी न्यू ईयर?
डिज्नी+ हॉटस्टार का हाल भी कुछ कुछ उन मुंबइया फिल्म निर्माताओं सरीखा होता जा रहा है जिनके लिए इंडिया बस बांद्रा से नालासोपारा के बीच ही बसता है। अच्छे खासे दिल्ली निवासी यूट्यूबर को ठेठ मराठी किरदार देने की जरूरत इस सीरीज को देखकर समझ नहीं आती। ये कहानी तो मुखर्जी नगर से लेकर मेरठ, मथुरा, मालेगांव कहीं की भी हो सकती थी। भुवन बाम पर इतना ज्यादा फोकस रखने का साइडइफेक्ट ये हुआ कि शिल्पा शुक्ला, जे डी चक्रवर्ती. देवेन भोजानी और अतिशा नायक जैसे मजबूत कलाकार भी कहानी के चक्रव्यूह में फंसकर कमजोर पड़ गए। कहानी में नेता हो, पैसा हो, कोठेवाली हो और मां भी हो तो फिर महेश मांजरेकर को लाकर उनकी सारी फिल्मों की याद दिलाने की जरूरत यहां क्यों रही होगी, सीरीज बनाने वाले और इसे पास करने वाले ही बेहतर बता सकते हैं। सीरीज को लेकर ओटीटी की आकुलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे तय समय से पहले ही रिलीज कर दिया गया। इसी फैसले में सीरीज का सारा सार है, कि ये जैसे बनी, वैसी ही इसकी डिलीवरी हो गई। प्रिमैच्योर!
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