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अर्चना पैन्यूली की नई किताब 'पॉल की तीर्थयात्रा' की समीक्षा
दिनेश मिश्र
Updated Sat, 26 Mar 2016 07:17 PM IST
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किताब का कवर
कहते हैं कि जीवन अपने आप में एक यात्रा है। इस यात्रा में कभी-कभी एक पड़ाव ऐसा भी आता है, जहां जिंदगी खुद के लिए एक ‘गाइड’ बन जाती है। बहुत कुछ सदाबहार अभिनेता देवानंद की फिल्म `गाइड’ के गीत की तरह- ‘वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां...’। जीवन के इसी उतार-चढ़ाव भरे इंद्रधनुषी रंगों को एक खूबसूरत कथानक में भरा है लेखिका अर्चना पैन्यूली ने अपनी नई किताब ‘पॉल की तीर्थयात्रा’ में। दरअसल यह तीर्थयात्रा और कुछ नहीं, जीवन की ही यात्रा है, जो उपन्यास के नायक पॉल स्कॉट की जिंदगी की कहानी है। किताब के शीर्षक में ही लिखा गया है कि यह उपन्यास पत्नी के प्रति एक पति का अमर प्यार है। यह एक तरह से अमिट प्रेम की यात्रा है। जो ताउम्र चलती रहती है। प्रेम संबंधों से शुरू हुए रिश्ते जब पति-पत्नी के संबंधों में तब्दील होते हैं, तो इन रिश्तों को यथार्थ की कठोर जमीन पर चलना पड़ता है, जो कई बार उतना सहज नहीं रह जाता। अक्सर उनमें बिखराव की स्थिति देखी जाती है। डेनमार्क में भारतीय मूल की नीना और उसके डेनिश पति पॉल की जिंदगी भी तमाम उतार-चढ़ावों से भरी है, जो कई जगहों पर बड़ी ही मर्मस्पर्शी बन पड़ी है। पत्नी नीना की मौत की पहली बरसी पर पॉल उसे श्रद्धांजलि देने के लिए पूरे जोशो-खरोश से 108 किमी की पैदल यात्रा करता है, जो उसे जीवन के आखिरी पड़ाव में एक मकसद दे जाता है। यह यात्रा एक तरह से पॉल के लिए तीर्थयात्रा बन जाती है, क्योंकि यहां उसे हर तरह की मुक्ति की दरकार है, चाहे वह भीतर की हो या बाहरी या फिर खुद से ही क्यों न हो! जैसे एक स्थान पर पॉल अपनी जिंदगी के अनुभव बयां करता है, ‘जिंदगी की डगर कंकड़ों-पत्थरों, हवा-पानी की सरसराहट-सनसनाहट से अलग थोडे़ ही है...। मगर मैं पथरीली राहों पर बेखौफ चलता चला गया।’ इन रास्तों पर भटकाव भी आते हैं, मगर जिंदगी की ललक ही इस यात्रा के लिए हौसला दे जाती है। किताब के नायक की इस यात्रा में एक ओर कहीं-कहीं जीवन से विचलन भी नजर आता है, तो कहीं उसे अनुभवों की लंबी गलियां भी मिलती हैं। रास्ते में अतीत की गठरी भी खुलती जाती है और जिंदगी उससे नए नजरिए के साथ रूबरू होती है। डेनमार्क में रहने वाली और पेशे से अध्यापिका अर्चना के लेखन की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उनके पात्र भले ही उपन्यास की काल्पनिक दुनिया के हों, मगर उनमें हकीकत की दुनिया के गहरे जीवन सूत्र मौजूद हैं। इससे पहले उनके दो उपन्यास ‘परिवर्तन’ और ‘वेयर डू आई बिलॉन्ग’ भी खासे चर्चित रहे। वास्तव में यह उपन्यास दिन ब दिन पतझड़ होते जाते रिश्तों की पड़ताल भी करता है। यह उपन्यास वैवाहिक जीवन की नियति, तलाक, पुनर्विवाह, परंपरा और आधुनिकता के अंतर्विरोध से भी जूझते हुए दिखाई देता है। कुल मिलाकर यह उपन्यास जीवन की परत दर परत हकीकत को बयां करने वाला दस्तावेज है।
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