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विश्वरूपः एक रोमांचक पॉलिटिकल थ्रिलर
दिनेश श्रीनेत
Updated Fri, 01 Feb 2013 03:18 PM IST
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कमल हासन की फिल्म 'विश्वरूप' के एक दृश्य में पूछताछ के दौरान एफबीआई की ऑफिसर फिल्म की नायिका से उसके धर्म के बारे में जानना चाहती है। नायिका जवाब देती है- "हमारे भगवान के चार हाथ हैं।" "ओह! तब तुम उन्हें सूली पर कैसे चढ़ाती हो?" ऑफिसर पूछती है। "सूली पर..." नायिका एक मिनट के लिए कन्फ्यूज होती है- "नहीं... हम उन्हें पानी में डुबो देते हैं।" यह पूरा प्रसंग फिल्म बनाने वाले की नियत को साफ कर देता है।
कमल हासन ने एक दिलचस्प पॉलिटिकल थ्रिलर प्रस्तुत किया है। इसमें विचलित कर देने वाली हिंसा के साथ-साथ हास्य का पुट है। फिल्म के निर्देशक और अभिनेता कमल हासन ही इस फिल्म के लेखक भी हैं; और कहीं भी उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ बेवजह की भाषणबाजी या लंबे-लंबे डॉयलाग नहीं रखे हैं। निर्माण और तकनीकी के स्तर पर फिल्म भव्य है। कमल हासन बेहतर अभिनेता तो हैं मगर कई सिक्वेंस में अपनी निर्देशकीय कौशल से चमत्कृत भी करते हैं।
कहानी
पूरी फिल्म को दरअसल कन्फ्यूज सी दिखने वाली नायिका पूजा कुमार के नजरिए से प्रस्तुत किया गया है। उसके मन में उठने वाले सवाल समय-समय पर दर्शकों के मन में उठते रहते हैं। 'हे राम!' की तरह कमल इस फिल्म को भी चरित्रों की निजी उलझनों से शुरु करते हैं और जैसे-जैसे हम कहानी के साथ आगे बढ़ते हैं उसका कैनवस बड़ा होता जाता है। फिल्म डा. निरूपमा (पूजा कुमार) की आत्मस्वीकृति से शुरु होती है। जिसने सिर्फ अमेरिका आने के लिए बेमन से अपनी उम्र से बड़े और स्त्रियों जैसा व्यवहार करने वाले कथक नर्तक विश्वनाथ (कमल हासन) से शादी कर ली।
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दोनों के बीच सेक्स संबंध नहीं हैं और लगातार बना रहने वाला अलगाव निरुपमा को विवाहेत्तर संबंधों की तरफ ले जाता है। विश्वनाथ के बारे में और पता लगाने के लिए निरुपमा एक प्राइवेट जासूस की मदद लेती है। डिटेक्टिव विश्वनाथ को नमाज पढ़ते देखकर हैरान रह जाता है। इसके तुरंत बाद डिटेक्टिव को खत्म कर दिया जाता है। यहां से फिल्म में तेजी से एक के बाद एक चौंकाने वाले घटनाक्रम घटते हैं। कमल हासन स्त्रियों जैसे हावभाव वाले डांसर की जगह एक घातक योद्धा के रूप में सामने आता है और कहानी का कैनवस अफगानिस्तान में तालिबानों की ट्रेनिंग से लेकर न्यूयार्क में न्यूक्लियर बम ब्लास्ट तक फैलता जाता है।
अभिनय
कमल हासन के सधे हुए परिवक्व अभिनय के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है। मगर फिल्म के मुख्य खलनायक ओमार की भूमिका में राहुल बोस ने कमाल का अभिनय किया है। कम हाइट और दुबले-पतले दिखने के बावजूद उन्होंने तालिबानियों के सरगना के किरदार को साकार किया है। ओमार के साथ सलीम की भूमिका में जयदीप अहलावत भी दर्शकों को लंबे समय तक याद रहेंगे। पूजा कुमार और एंड्रिया जेरेमिया के पास अभिनय के नाम पर कुछ खास करने को नहीं था। उन्हें सिर्फ फिल्म के नायकों के साथ दौड़ते-भागते रहना था। विशेष भूमिका में शेखर कपूर लंबे समय बाद अभिनय करते दिखे। एक छोटे से इमोशनल दृश्य में उनका अंडरप्ले देखने लायक बन पड़ा है।
निर्देशन
'विश्वरूप' पूरी तरह से निर्देशक कमल हासन की फिल्म है। पटकथा की संरचना और फिल्मांकन की शैली हॉलीवुड की फिल्मों जैसी है। कुछ दृश्यों में कमल अपने निर्देशकीय कौशल की छाप छोड़ जाते हैं। जैसे अफगानिस्तान में तालिबानियों के छोटे से ठिकाने पर बच्चे एक-दूसरे को गोलियां मारने का खेल खेलते नजर आते हैं, एक जगह फ्लैशबैक में सीन फ्रीज़ हो जाने का इस्तेमाल बड़े कौशल से किया गया है और दर्शक पहले देखे गए सारे दृश्यों को फिर एक नए नजरिए से देखता है। फिल्म के आरंभ में विश्वनाथ बने कमल के चरित्र का अचानक रूपांतरण भी काफी रोमांचित करता है।
संगीत
फिल्म में संगीत की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। फिल्म के आरंभ में एक गीत सुनने में मधुर लगता है। कई जगह स्क्रीन पर चल रहे दृश्यों के दौरान बैकग्राउंड में सुनाई दे रहे शंकर एहसान लॉय की कंपोजिशन मैच नहीं करती। फिल्म में पंडित बिरजू महाराज का नृत्य निर्देशन है।
क्यों देखें
अगर आप स्पाई थ्रिलर या पॉलिटिकल थ्रिलर पसंद करते हैं। अगर आप कमल हासन के फैन हैं। राहुल बोस के अभिनय को पसंद करते हैं या फिर लंबे समय बाद शेखर कपूर को पर्दे पर देखना चाहते हैं।
क्यों न देखें
अगर आप फिल्म में वायलेंस पसंद नहीं करते या 'पैसा वसूल' टाइप की फिल्म देखने के मूड में हैं।
निर्देशनः कमल हासन
निर्माताः चन्द्र हासन, कमल हासन
लेखनः कमल हासन, अतुल तिवारी
अभिनयः कमल हासन, पूजा कुमार, राहुल बोस, जयदीप अहलावत
संगीतः शंकर एहसान लॉय
छायांकनः सानू वर्गीज
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कमल हासन ने एक दिलचस्प पॉलिटिकल थ्रिलर प्रस्तुत किया है। इसमें विचलित कर देने वाली हिंसा के साथ-साथ हास्य का पुट है। फिल्म के निर्देशक और अभिनेता कमल हासन ही इस फिल्म के लेखक भी हैं; और कहीं भी उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ बेवजह की भाषणबाजी या लंबे-लंबे डॉयलाग नहीं रखे हैं। निर्माण और तकनीकी के स्तर पर फिल्म भव्य है। कमल हासन बेहतर अभिनेता तो हैं मगर कई सिक्वेंस में अपनी निर्देशकीय कौशल से चमत्कृत भी करते हैं।
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कहानी
पूरी फिल्म को दरअसल कन्फ्यूज सी दिखने वाली नायिका पूजा कुमार के नजरिए से प्रस्तुत किया गया है। उसके मन में उठने वाले सवाल समय-समय पर दर्शकों के मन में उठते रहते हैं। 'हे राम!' की तरह कमल इस फिल्म को भी चरित्रों की निजी उलझनों से शुरु करते हैं और जैसे-जैसे हम कहानी के साथ आगे बढ़ते हैं उसका कैनवस बड़ा होता जाता है। फिल्म डा. निरूपमा (पूजा कुमार) की आत्मस्वीकृति से शुरु होती है। जिसने सिर्फ अमेरिका आने के लिए बेमन से अपनी उम्र से बड़े और स्त्रियों जैसा व्यवहार करने वाले कथक नर्तक विश्वनाथ (कमल हासन) से शादी कर ली।
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दोनों के बीच सेक्स संबंध नहीं हैं और लगातार बना रहने वाला अलगाव निरुपमा को विवाहेत्तर संबंधों की तरफ ले जाता है। विश्वनाथ के बारे में और पता लगाने के लिए निरुपमा एक प्राइवेट जासूस की मदद लेती है। डिटेक्टिव विश्वनाथ को नमाज पढ़ते देखकर हैरान रह जाता है। इसके तुरंत बाद डिटेक्टिव को खत्म कर दिया जाता है। यहां से फिल्म में तेजी से एक के बाद एक चौंकाने वाले घटनाक्रम घटते हैं। कमल हासन स्त्रियों जैसे हावभाव वाले डांसर की जगह एक घातक योद्धा के रूप में सामने आता है और कहानी का कैनवस अफगानिस्तान में तालिबानों की ट्रेनिंग से लेकर न्यूयार्क में न्यूक्लियर बम ब्लास्ट तक फैलता जाता है।
अभिनय
कमल हासन के सधे हुए परिवक्व अभिनय के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है। मगर फिल्म के मुख्य खलनायक ओमार की भूमिका में राहुल बोस ने कमाल का अभिनय किया है। कम हाइट और दुबले-पतले दिखने के बावजूद उन्होंने तालिबानियों के सरगना के किरदार को साकार किया है। ओमार के साथ सलीम की भूमिका में जयदीप अहलावत भी दर्शकों को लंबे समय तक याद रहेंगे। पूजा कुमार और एंड्रिया जेरेमिया के पास अभिनय के नाम पर कुछ खास करने को नहीं था। उन्हें सिर्फ फिल्म के नायकों के साथ दौड़ते-भागते रहना था। विशेष भूमिका में शेखर कपूर लंबे समय बाद अभिनय करते दिखे। एक छोटे से इमोशनल दृश्य में उनका अंडरप्ले देखने लायक बन पड़ा है।
निर्देशन
'विश्वरूप' पूरी तरह से निर्देशक कमल हासन की फिल्म है। पटकथा की संरचना और फिल्मांकन की शैली हॉलीवुड की फिल्मों जैसी है। कुछ दृश्यों में कमल अपने निर्देशकीय कौशल की छाप छोड़ जाते हैं। जैसे अफगानिस्तान में तालिबानियों के छोटे से ठिकाने पर बच्चे एक-दूसरे को गोलियां मारने का खेल खेलते नजर आते हैं, एक जगह फ्लैशबैक में सीन फ्रीज़ हो जाने का इस्तेमाल बड़े कौशल से किया गया है और दर्शक पहले देखे गए सारे दृश्यों को फिर एक नए नजरिए से देखता है। फिल्म के आरंभ में विश्वनाथ बने कमल के चरित्र का अचानक रूपांतरण भी काफी रोमांचित करता है।
संगीत
फिल्म में संगीत की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। फिल्म के आरंभ में एक गीत सुनने में मधुर लगता है। कई जगह स्क्रीन पर चल रहे दृश्यों के दौरान बैकग्राउंड में सुनाई दे रहे शंकर एहसान लॉय की कंपोजिशन मैच नहीं करती। फिल्म में पंडित बिरजू महाराज का नृत्य निर्देशन है।
क्यों देखें
अगर आप स्पाई थ्रिलर या पॉलिटिकल थ्रिलर पसंद करते हैं। अगर आप कमल हासन के फैन हैं। राहुल बोस के अभिनय को पसंद करते हैं या फिर लंबे समय बाद शेखर कपूर को पर्दे पर देखना चाहते हैं।
क्यों न देखें
अगर आप फिल्म में वायलेंस पसंद नहीं करते या 'पैसा वसूल' टाइप की फिल्म देखने के मूड में हैं।
निर्देशनः कमल हासन
निर्माताः चन्द्र हासन, कमल हासन
लेखनः कमल हासन, अतुल तिवारी
अभिनयः कमल हासन, पूजा कुमार, राहुल बोस, जयदीप अहलावत
संगीतः शंकर एहसान लॉय
छायांकनः सानू वर्गीज