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Hunkkaar The Roar Review: दमदार विषय मजबूत अभिनय, अनीत-फातिमा और रघुबीर ने संभाली कमान; कहां हुई चूक?
सार
Hunkkaar Review: अनीत पड्डा, फातिमा सना शेख, रघुबीर यादव, राम कपूर, मोहम्मद जीशान अय्यूब और सीम बिस्वास जैसे दमदार कलाकार जब एक सीरीज से जुड़ जाएं तो उससे उम्मीदें काफी बढ़ जाती हैं। चलिए जानते हैं कि वेब सीरीज ‘हुंकार- द रोर’ इन उम्मीदों पर कितनी खरी उतरी है?
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फिल्म हुंकार- द रोर मूवी रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला
Movie Review
हुंकार- द रोर
कलाकार
अनीत पड्डा
,
फातिमा सना शेख
,
रघुबीर यादव
,
मोहम्मद जीशान अय्यूब
,
राम कपूर
,
राजेश शर्मा
और
सीमा बिस्वास
लेखक
निखिल नायर
,
हीराज मरफातिया
और
रविंदर रंधावा
निर्देशक
नित्या मेहरा
और
करण डी कपाड़िया
निर्माता
दीपक सहगल
और
करण डी कपाड़िया
रिलीज डेट
25 सितंबर 2026
रेटिंग
2.5/5
विस्तार
ओटीटी पर ढोंगी बाबाओं और उनके साम्राज्य की कहानियां अब नई नहीं हैं। ‘आश्रम’, ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ और ‘महाराज’ जैसी कहानियों के बाद जब कोई नई सीरीज इसी दुनिया में उतरती है, तो उससे सिर्फ एक सनसनीखेज कहानी की उम्मीद नहीं रहती। यहां यह भी देखा जाता है कि वह इस विषय में नया क्या जोड़ती है। क्या ‘हुंकार’ इस दुनिया में कुछ नया जोड़ पाई़? चलिए जानते हैं…
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हुंकार
- फोटो : सोशल मीडिया
क्या है कहानी ?
फिल्म शुरू होती है 17 साल की मीनू रावत (अनीत पड्डा) से जो प्रभावशाली धर्मगुरु बापजी (रघुबीर यादव) पर यौन शोषण का आरोप लगाती है। मामला साधारण नहीं है इसलिए मीनू की शिकायत के बाद एसीपी जसलीन सिंह सोनी (फातिमा सना शेख) को जांच की जिम्मेदारी मिलती है। इसके बाद शुरू होती है पुलिस, अदालत, मीडिया और उस बाबा के हजारों समर्थकों के बीच लड़ाई।
अब मीनू के आरोप के बाद आगे क्या होगा? कौन उसके साथ खड़ा होगा और बापजी के प्रभाव के सामने जांच कितनी आगे बढ़ पाएगी? यही उत्सुकता कहानी को गति देती है। धीरे-धीरे मामला पुलिस स्टेशन से अदालत तक पहुंचता है और कहानी का दायरा बढ़ने लगता है।
यहां सीरीज सिर्फ अपराध की जांच नहीं करती, बल्कि यह भी दिखाने की कोशिश करती है कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ आवाज उठाना पीड़ित के लिए कितना मुश्किल हो सकता है।
छह एपिसोड की यह सीरीज एक मजबूत सवाल उठाती है, लेकिन उस सवाल की गहराई तक पहुंचते-पहुंचते इसकी कहानी कई दिशाओं में बिखर जाती है।
फिल्म शुरू होती है 17 साल की मीनू रावत (अनीत पड्डा) से जो प्रभावशाली धर्मगुरु बापजी (रघुबीर यादव) पर यौन शोषण का आरोप लगाती है। मामला साधारण नहीं है इसलिए मीनू की शिकायत के बाद एसीपी जसलीन सिंह सोनी (फातिमा सना शेख) को जांच की जिम्मेदारी मिलती है। इसके बाद शुरू होती है पुलिस, अदालत, मीडिया और उस बाबा के हजारों समर्थकों के बीच लड़ाई।
अब मीनू के आरोप के बाद आगे क्या होगा? कौन उसके साथ खड़ा होगा और बापजी के प्रभाव के सामने जांच कितनी आगे बढ़ पाएगी? यही उत्सुकता कहानी को गति देती है। धीरे-धीरे मामला पुलिस स्टेशन से अदालत तक पहुंचता है और कहानी का दायरा बढ़ने लगता है।
यहां सीरीज सिर्फ अपराध की जांच नहीं करती, बल्कि यह भी दिखाने की कोशिश करती है कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ आवाज उठाना पीड़ित के लिए कितना मुश्किल हो सकता है।
छह एपिसोड की यह सीरीज एक मजबूत सवाल उठाती है, लेकिन उस सवाल की गहराई तक पहुंचते-पहुंचते इसकी कहानी कई दिशाओं में बिखर जाती है।
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हुंकार
- फोटो : X
कैसा है अभिनय?
यह इस सीरीज का सबसे मजबूत पक्ष है। अनीत पड्डा का अभिनय सीरीज की सबसे बड़ी ताकत है। ‘सैयारा’ के बाद यहां एक बार फिर वह ऐसे किरदार में हैं, जिसमें भावनात्मक उतार-चढ़ाव काफी हैं। मीनू सिर्फ डरी हुई लड़की नहीं है। वह कई जगह गुस्से में है, कहीं असमंजस में है और कहीं अपने लिए लड़ने का साहस भी दिखाती है। अनीत इन भावनाओं को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाए बिना पर्दे पर उतारती हैं। खासकर कोर्टरूम वाले हिस्सों में उनका अभिनय कहानी को भावनात्मक वजन देता है।
फातिमा सना शेख भी जसलीन के किरदार में संयमित नजर आती हैं। उन्होंने पुलिस अधिकारी को किसी सुपरवुमन की तरह पेश करने के बजाय एक ऐसी अधिकारी के रूप में निभाया है जो धीरे-धीरे केस की गंभीरता और उससे जुड़े दबावों को समझती है।
फातिमा और अनीत के बीच के दृश्य सीरीज के सबसे मजबूत हिस्सों में शामिल हैं। दोनों किरदारों के बीच का भरोसा कहानी को भावनात्मक आधार देता है।
वहीं रघुबीर यादव को ‘पंचायत’ में इतना मासूम किरदार करते देखने के बाद यहां बापजी के रूप में देखना बेहद दिलचस्प है। वह इस किरदार को चीखने-चिल्लाने वाला पारंपरिक खलनायक नहीं बनाते बल्कि, उनका शांत व्यवहार ही किरदार को असहज बनाता है। कभी बेहद स्नेही नजर आने वाला उनका किरदार अगले ही पल डर पैदा करता है। हालांकि समस्या यह है कि इतना प्रभावशाली किरदार होने के बावजूद पटकथा उसके व्यक्तित्व और उसके प्रभाव की जड़ों में ज्यादा गहराई से नहीं जाती।
मोहम्मद जीशान अय्यूब वकील की भूमिका में कोर्टरूम वाले हिस्सों को मजबूती देते हैं। राम कपूर के साथ उनके दृश्य अच्छे हैं। अर्जुन माथुर का पत्रकार वाला ट्रैक कहानी में मीडिया की भूमिका जोड़ता है, लेकिन यह हिस्सा उतनी मजबूती से विकसित नहीं हो पाता। इसी तरह कई सहायक किरदारों को कहानी में जगह तो मिलती है, लेकिन उन्हें पर्याप्त विस्तार नहीं दिया गया।
यह इस सीरीज का सबसे मजबूत पक्ष है। अनीत पड्डा का अभिनय सीरीज की सबसे बड़ी ताकत है। ‘सैयारा’ के बाद यहां एक बार फिर वह ऐसे किरदार में हैं, जिसमें भावनात्मक उतार-चढ़ाव काफी हैं। मीनू सिर्फ डरी हुई लड़की नहीं है। वह कई जगह गुस्से में है, कहीं असमंजस में है और कहीं अपने लिए लड़ने का साहस भी दिखाती है। अनीत इन भावनाओं को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाए बिना पर्दे पर उतारती हैं। खासकर कोर्टरूम वाले हिस्सों में उनका अभिनय कहानी को भावनात्मक वजन देता है।
फातिमा सना शेख भी जसलीन के किरदार में संयमित नजर आती हैं। उन्होंने पुलिस अधिकारी को किसी सुपरवुमन की तरह पेश करने के बजाय एक ऐसी अधिकारी के रूप में निभाया है जो धीरे-धीरे केस की गंभीरता और उससे जुड़े दबावों को समझती है।
फातिमा और अनीत के बीच के दृश्य सीरीज के सबसे मजबूत हिस्सों में शामिल हैं। दोनों किरदारों के बीच का भरोसा कहानी को भावनात्मक आधार देता है।
वहीं रघुबीर यादव को ‘पंचायत’ में इतना मासूम किरदार करते देखने के बाद यहां बापजी के रूप में देखना बेहद दिलचस्प है। वह इस किरदार को चीखने-चिल्लाने वाला पारंपरिक खलनायक नहीं बनाते बल्कि, उनका शांत व्यवहार ही किरदार को असहज बनाता है। कभी बेहद स्नेही नजर आने वाला उनका किरदार अगले ही पल डर पैदा करता है। हालांकि समस्या यह है कि इतना प्रभावशाली किरदार होने के बावजूद पटकथा उसके व्यक्तित्व और उसके प्रभाव की जड़ों में ज्यादा गहराई से नहीं जाती।
मोहम्मद जीशान अय्यूब वकील की भूमिका में कोर्टरूम वाले हिस्सों को मजबूती देते हैं। राम कपूर के साथ उनके दृश्य अच्छे हैं। अर्जुन माथुर का पत्रकार वाला ट्रैक कहानी में मीडिया की भूमिका जोड़ता है, लेकिन यह हिस्सा उतनी मजबूती से विकसित नहीं हो पाता। इसी तरह कई सहायक किरदारों को कहानी में जगह तो मिलती है, लेकिन उन्हें पर्याप्त विस्तार नहीं दिया गया।
हुंकार
- फोटो : X
निर्देशन
करण डी कपाड़िया के निर्देशन में बनी इस सीरीज के पास कहने के लिए कई बातें हैं। आस्था के नाम पर प्रभाव, अनुयायियों की भीड़, पुलिस पर दबाव, गवाहों का डर, मीडिया की भूमिका और अदालत में पीड़ित से बार-बार उसी घटना को दोहराने की अपेक्षा।
लेकिन इन सभी विषयों को एक साथ साधने की कोशिश में कहानी कई बार बिखर जाती है। एक ट्रैक रफ्तार पकड़ता है और तभी दूसरा ट्रैक शुरू हो जाता है। नतीजा यह कि कुछ दिलचस्प सवाल अधूरे रह जाते हैं।
बापजी के हजारों अनुयायी आखिर उसके साथ इतनी मजबूती से क्यों खड़े हैं? लोग आरोपों के बाद भी उस पर विश्वास क्यों करते हैं? सीरीज इन सवालों को सामने तो रखती है, लेकिन उनके जवाब तलाशने में ज्यादा समय नहीं देती। यही वजह है कि मजबूत विषय के बावजूद कहानी कई जगह जानी-पहचानी लगने लगती है।
दूसरी बड़ी समस्या यह है कि शुरुआत से कुछ वक्त तक यह कहानी ‘आश्रम’ की छाया में ही चलती है। आगे जाकर इसमें अपना कुछ टेक आता है।
हालांकि, फिर भी ‘हुंकार’ पूरी तरह निराश नहीं करती। कोर्टरूम के दृश्य कहानी में दोबारा जान डालते हैं। खासकर मीनू का सवाल कि हर बार पीड़ित को ही कटघरे में क्यों खड़ा किया जाता है? सीरीज के मूल भाव को सामने लाता है। शीर्षक भी इसी आवाज का प्रतीक बनकर उभरता है- एक ऐसी लड़की की आवाज, जो अपने साथ हुई घटना को अपनी शर्म मानने से इनकार करती है।
करण डी कपाड़िया के निर्देशन में बनी इस सीरीज के पास कहने के लिए कई बातें हैं। आस्था के नाम पर प्रभाव, अनुयायियों की भीड़, पुलिस पर दबाव, गवाहों का डर, मीडिया की भूमिका और अदालत में पीड़ित से बार-बार उसी घटना को दोहराने की अपेक्षा।
लेकिन इन सभी विषयों को एक साथ साधने की कोशिश में कहानी कई बार बिखर जाती है। एक ट्रैक रफ्तार पकड़ता है और तभी दूसरा ट्रैक शुरू हो जाता है। नतीजा यह कि कुछ दिलचस्प सवाल अधूरे रह जाते हैं।
बापजी के हजारों अनुयायी आखिर उसके साथ इतनी मजबूती से क्यों खड़े हैं? लोग आरोपों के बाद भी उस पर विश्वास क्यों करते हैं? सीरीज इन सवालों को सामने तो रखती है, लेकिन उनके जवाब तलाशने में ज्यादा समय नहीं देती। यही वजह है कि मजबूत विषय के बावजूद कहानी कई जगह जानी-पहचानी लगने लगती है।
दूसरी बड़ी समस्या यह है कि शुरुआत से कुछ वक्त तक यह कहानी ‘आश्रम’ की छाया में ही चलती है। आगे जाकर इसमें अपना कुछ टेक आता है।
हालांकि, फिर भी ‘हुंकार’ पूरी तरह निराश नहीं करती। कोर्टरूम के दृश्य कहानी में दोबारा जान डालते हैं। खासकर मीनू का सवाल कि हर बार पीड़ित को ही कटघरे में क्यों खड़ा किया जाता है? सीरीज के मूल भाव को सामने लाता है। शीर्षक भी इसी आवाज का प्रतीक बनकर उभरता है- एक ऐसी लड़की की आवाज, जो अपने साथ हुई घटना को अपनी शर्म मानने से इनकार करती है।
हुंकार
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देखें या नहीं
कुल मिलाकर, इस सीरीज का विषय मजबूत है, शुरुआत पकड़ बनाती है और कलाकारों का अभिनय इसे संभालता है। लेकिन बिखरी हुई पटकथा और जरूरत से ज्यादा सब-प्लॉट इसकी पकड़ कमजोर कर देते हैं।
कमाल के अभिनय के लिए इसे देखा जा सकता है पर एक और समस्या यह है कि हर एपिसोड तकरीबन 50 मिनट का है। ऐसे में कई जगह लगता है कि इसे जबरन खींचा जा रहा है।
कुल मिलाकर, इस सीरीज का विषय मजबूत है, शुरुआत पकड़ बनाती है और कलाकारों का अभिनय इसे संभालता है। लेकिन बिखरी हुई पटकथा और जरूरत से ज्यादा सब-प्लॉट इसकी पकड़ कमजोर कर देते हैं।
कमाल के अभिनय के लिए इसे देखा जा सकता है पर एक और समस्या यह है कि हर एपिसोड तकरीबन 50 मिनट का है। ऐसे में कई जगह लगता है कि इसे जबरन खींचा जा रहा है।