Virupaksha Hindi: डबिंग ने बिगाड़ दिया साई धर्म तेज का हिंदी में खेल, संयुक्ता के असरदार अभिनय ने मन मोहा
पिछले महीने ही एक तेलुगू फिल्म 'शाकुंतलम' हिंदी में रिलीज हुई थी। फिल्म ने हालांकि अपनी मूल भाषा में भी कोई खास कमाई नहीं की लेकिन दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी के नाम पर जो हिंदी भाषी दर्शक इसे देखने आए भी, उन्हें इसके हिंदी अनुकूलन और हिंदी डबिंग को लेकर बहुत निराशा हुई। इस शुक्रवार हिंदी में डब होकर रिलीज हुई फिल्म ‘विरुपाक्ष’ 1951 में हुई एक घटना से शुरू होती है। और, इसके तार आकर जुड़ते हैं 1970 से। मामला एक ऐसी घटना का है जो फिल्म की शुरुआत में ही दर्शकों को झकझोर कर रख देता है।
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फिल्म ‘विरुपाक्ष’ में सूर्या (साई धर्म तेज) अपनी मां के साथ रुद्रवनम गांव जाता है। यह गांव एक जंगल में बसा हुआ है जिस कारण कई ऐसी चीजें होती है जो अपने आप डरावनी लगने लगती हैं। सूर्या को सरपंच की बेटी नंदिनी से प्यार हो जाता है। फिल्म की कहानी गांव के किसी ऐसे इतिहास से जुड़ी हुई है जो आज भी गांव लोगों की जान ले रहा है। ऐसे में गांव को इस अदृश्य साये से बचाने की जिम्मेदारी सूर्या (साई धर्म तेज) लेता है। लंबे अरसे बाद फिल्मों में वापसी करते ही साई धर्म तेज को तेलुगू में एक बड़ी हिट मिली है। तेलुगू में अच्छा कारोबार करने के बाद अब इसे हिंदी में रिलीज करने का सपना इसके निर्माताओं ने देखा है, हालांकि ये फिल्म हिंदी में डब होकर रिलीज हो रही है, इसकी जानकारी हिंदी भाषी राज्यों के अधिकतर दर्शकों को अब भी नहीं है।
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फिल्म ‘विरुपाक्ष’ में साई धर्म तेज ने हीरो का आवरण ओढ़ने से बचने का आखिर तक प्रयास किया है। वह गांव के लोगों के तरह ही एक आम व्यक्ति दिखने की कोशिश करते हैं। हालांकि हिंदी में उनके संवादों की डबिंग काफी खराब है। इसके चलते कई बार दृश्यों का आपसी सामंजस्य भी डगमगाता है। फिल्म की संयुक्ता को फिल्म में अपने अभिनय के अलग अलग रंग दिखाने का मौका मिला। इंटरवल से पहले और इंटरवल के बाद उनके किरदार नंदिनी का ग्राफ जिस तरह बदलता है, उसमें रमने में संयुक्ता ने काबिले तारीफ काम किया है।
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फिल्म ‘विरुपाक्ष’ का पहला हिस्सा काफी शानदार है क्योंकि शुरुआत में ही कुछ ऐसे दृश्य दिखाए जाते हैं, जिनका अंत जाने बिना दर्शक चैन न लें। लेकिन, असल मुश्किल यहां ये है कि फिल्म की हिंदी रिलीज के बारे में दर्शकों को जानकारी ही नहीं है। इसी का नतीजा है कि इसे देखने वालों की तादाद भी टिकट खिड़की पर अपेक्षित संख्या में नहीं है। फिल्म प्रतिशोध की भावना पर बनी हुई है जिसके चलते फिल्म कई बार क्रूरता की हदें पार कर देती है। फिल्म एक बार देखी जा सकने लायक है लेकिन अगर फिल्म की डबिंग और फिल्म के संगीत का अनुकूलन हिंदी भाषी दर्शकों की भावनाओं के अनुरूप होता तो ये फिल्म बेहतर फिल्म साबित हो सकती थी।
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