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The Sabarmati Report Review: सौ दिन में गोधरा कांड पर दूसरी फिल्म, मैसी की शोहरत को भुनाने की कमजोर कोशिश

Fri, 15 Nov 2024 02:26 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Fri, 15 Nov 2024 02:26 PM IST
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The Sabarmati Report Movie Review by Pankaj Shukla Vikrant Massey Riddhi Dogra Rashi Khanna Ekta Kapoor
The Sabarmati Report Review - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
द साबरमती रिपोर्ट
कलाकार
विक्रांत मैसी , राशि खन्ना , ऋद्धि डोगरा , नाजनीन पाटनी और बरखा सिंह आदि
लेखक
अर्जुन भांडेगांवकर , अविनाश सिंह तोमर , विपिन अग्निहोत्री और धीरज सरना
निर्देशक
धीरज सरना
निर्माता
एकता कपूर, शोभा कपूर आदि
रिलीज:
15 नवंबर 2024
रेटिंग
1.5/5

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आज पुरानी जंजीरों को तोड़ चुके हैं,
क्या देखें उस मंजिल को जो छोड़ चुके हैं
चांद के दर पे जा पहुंचा है आज जमाना
नए जगत से हम भी नाता जोड़ चुके हैं
नया खून है, नई उमंगें
अब है नई जवानी, हम हिंदुस्तानी..

गीतकार प्रेम धवन का लिखा और मुकेश की बजाय मीका का गाया ये गाना फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ में वहां आता है जहा भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में भारत के जीतने के बाद अहमदाबाद की मुस्लिम आबादी में पटाखे छोड़े जा रहे हैं। ये फिल्म गोधरा कांड पर है। अभी जुलाई में एक फिल्म रिलीज हुई ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’। रणवीर शौरी और मनोज जोशी ही फिल्म के दो सबसे नामचीन सितारे थे। फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ देखते समय न सिर्फ इस फिल्म की खूब याद आई बल्कि ये भी समझ आया कि एक ही विषय पर एक ही समय में दो फिल्में बनाना महज संयोग तो नहीं हो सकता। अमिताभ बच्चन के जमाने में एक ही विषय पर ‘तूफान’ और ‘जादूगर’ बनीं। सलमान खान और आमिर खान के समय में ‘दंगल’ और ‘सुल्तान’ बनीं। अभी ‘देवरा’ और ‘कंगुवा’ लोग देख ही रहे हैं और अब ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’ के बाद ‘द साबरमती रिपोर्ट’।

The Sabarmati Report Movie Review by Pankaj Shukla Vikrant Massey Riddhi Dogra Rashi Khanna Ekta Kapoor
The Sabarmati Report Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आईआईएमसी का कैंपस प्लेसमेंट?
फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ एक ऐसे कैमरामैन की कहानी है जिसने भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से पत्रकारिता का कोर्स किया और नौकरी मिली उसे एक बड़े न्यूज़ चैनल में मनोरंजन बीट कवर करने वाले हिंदी पत्रकार की। गोधरा के पास ट्रेन में लगी आग के मामले की कवरेज करने गई स्टार रिपोर्टर के साथ उसे भेजा तो जाता है कैमरामैन बनाकर लेकिन वह ‘मैडम’ की शूटिंग करने के साथ साथ, हादसे के चंद पीड़ितों के ऐसे बयान भी रिकॉर्ड कर लाता है, जो प्रसारित हो जाते तो शायद ये फिल्म बनने की नौबत ही नहीं आती। वो बयान रिकॉर्ड करके लाता है डीवीसी टेप पर। चैनल समय में उल्टी तरफ चल रहा है क्योंकि उसकी लाइब्रेरी इसे ट्रांसफर करके रखती है बीटा टेप पर! ये बीटा टेप बाद में एक नई नई महिला जर्नलिस्ट को मिलता है, वह इस पुराने हिंदी पत्रकार को तलाशने निकल जाती है। हां, यहां आकर फिल्म ये भी बताती है गुजरात पुलिस के हाथ भी पैसे के मामले में खुले रहे हैं।

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The Sabarmati Report Movie Review by Pankaj Shukla Vikrant Massey Riddhi Dogra Rashi Khanna Ekta Kapoor
The Sabarmati Report Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

नौकरी जाने पर जमीर खोता हिंदी पत्रकार?
फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ बताती है कि इस हिंदी पत्रकार की नौकरी जाने पर वह सुबह शाम शराब के नशे में धुत रहता है। घर में काम करने आने वाली सहायिका के पर्स से पैसे चुराता है। घर चलाने के लिए डबिंग का काम करता है और पैसों के लिए ही इस नई पत्रकार के साथ गोधरा जाने को तैयार हो जाता है। ध्यान रहे कि ये हिंदी पत्रकार है। फिल्म बार बार ये दोहराती चलती है कि हिंदी के पत्रकारों की समाज में कोई इज्जत नहीं है। उनकी बात कोई सुनता नहीं है। दरअसल ये सारा सेटअप उस क्लाइमेक्स के लिए होता है जब अंग्रेजी चैनल की रिपोर्टिंग को एक हिंदी चैनल में लौटा यही पत्रकार गलत साबित करता है। नानावटी आयोग की रिपोर्ट, गुजरात हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उद्धरण देती इस फिल्म में भी फिल्म ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’ की तरह दर्शकों को यही याद दिलाने की कोशिश है कि अयोध्या से लौट रहे 59 रामभक्तों को गोधरा में जिंदा जला दिया गया था। उनके नाम भी फिल्म बताने की कोशिश करती है लेकिन 10-12 नाम परदे पर आने के बाद ये सिलसिला भी टूट जाता है।

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The Sabarmati Report Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

धीरज सरना का नाम निर्देशक के तौर पर
निर्देशक अनुराग कश्यप के सहायक रहे राजन चंदेल ने फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ निर्देशित की है। लेकिन, उनकी बनाई फिल्म सेंसर बोर्ड में अटकी तो एकता कपूर ने फिल्म का अधिकतर हिस्सा फिर से शूट करा दिया और अब फिल्म के निर्देशक वह धीरज सरना हैं जो उनके साथ धारावाहिक ‘कहानी घर घर की’ से रहे हैं। उन्होंने ही कपिल शर्मा की बतौर हीरो फिल्म ‘किस किस से प्यार करूं’ भी लिखी है। धीरज सरना ने बतौर निर्देशक पूरी कोशिश की है कि जो भी निर्देश उन्हें मिले हैं, उनके दायरे में रहकर वह एक डॉक्यूड्रामा सरीखी फिल्म बना सकें। अयोध्या से अहमदाबाद जा रही ट्रेन की एस 6 बोगी में साजिशन आग लगाई गई, ये बात अदालत मान चुकी है लेकिन ये बात दर्शकों को याद बनी रहे, यही इस फिल्म का अगर उद्देश्य है तो बतौर एकता कपूर के मुलाजिम धीरज सरना पूरी तरह सफल हैं। बस, दिक्कत यही है कि यही बात फिल्म ‘एक्सीडेंट या कॉन्सपिरेसी गोधरा’ कोई सौ दिन पहले ही इससे बेहतर तरीके से दर्शकों को समझा चुकी है।

The Sabarmati Report Movie Review by Pankaj Shukla Vikrant Massey Riddhi Dogra Rashi Khanna Ekta Kapoor
The Sabarmati Report Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

विक्रांत मैसी की शोहरत भुनाने की कोशिश
फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ पूरी तरह से फिल्म ‘12वीं फेल’ से लाइमलाइट में आए विक्रांत मैसी की शोहरत को भुनाने की कोशिश करती है, लेकिन चूंकि विक्रांत मैसी निर्देशक के कलाकार है, लिहाजा जो काम विधु विनोद चोपड़ा उनसे निकलवा ले गए, वह धीरज सरना के बस में दिखा नहीं। 2002 में शुरू होने वाली ये फिल्म डेढ दशक का सफर तय करती है। इस दौरान विक्रांत मैसी के बालों का रंग बदलने के अलावा उनकी देह भाषा या बोलने के लहजे में खास फर्क दिखता नहीं है। ऋद्धि डोगरा दबंग अंग्रेजी पत्रकार के रूप में हैं और राशि खन्ना एक ऐसी पत्रकार के रूप में जो सच की जीत के लिए लगी हुई है। फिल्म पहले सीन से ही बार बार दोहराती रहती है कि ‘सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित कभी नहीं’। दोनों का अभिनय अपनी अपनी जगह ठीक हैं। जरा देर की भूमिका में दिखीं नाजनीन पाटनी ने भी प्रभावशाली अभिनय किया है।

The Sabarmati Report Movie Review by Pankaj Shukla Vikrant Massey Riddhi Dogra Rashi Khanna Ekta Kapoor
The Sabarmati Report Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

हिंदी फिल्म में हिंदी ही सही नहीं लिखी
फिल्म ‘द साबरमती रिपोर्ट’ का अपना सेट नैरेटिव है और इस नैरेटिव को पसंद करने वाले दर्शकों को ये फिल्म पसंद भी आ सकती है लेकिन चूंकि घटना दो दशक पहले की है और फिल्म खुद दिखाती है कि अब भारत-पाकिस्तान के मैच में भारत के जीतने पर भी नए हिंदुस्तान के मुसलमान खूब पटाखे छोड़ते हैं तो कहीं न कहीं ये फिल्म संतुलन बनाने के चक्कर में लड़खड़ा जाती है। फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइन में बहुत लोचे हैं। गोधरा स्टेशन पर मराठी में टिकट घर लिखा होना अटपटा लगता है। जली हुई ट्रेन के डिब्बों के भीतर के दृश्य भी स्वाभाविक नहीं लगते। फिल्म परदे पर जितनी भी लिखी हुई हिंदी आती है, कभी भी पूरा एक वाक्य सही नहीं लिखा है। और, वो भी उस फिल्म में जो बार बार हिंदी पत्रकारिता की प्रतिष्ठा बढ़ाने का दम भरती नजर आती है।

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