Pyre Movie Review: बुढ़ापे में साथ की अहमियत समझाती पहाड़ों की मार्मिक कहानी, आमा-बुबू के अभिनय ने फूंकी जान
- Pyre Film Review in Hindi: निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ आखिरकार भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है।
- फिल्म इससे पहले दुनियाभर के कई फिल्म समारोह में प्रतिष्ठित अवॉर्ड अपने नाम कर चुकी है।
- इस रिव्यू में जानें कैसी है इस फिल्म की कहानी?
विस्तार
कुछ फिल्मों आपको समाज की एक ऐसी सच्चाई से रूबरू कराती हैं जिसे देखकर आप दंग रह जाते हैं। यह सीधे मुद्दे पर वार नहीं करतीं पर एक ही कहानी में कई ऐसे मुद्दे बयां कर देती हैं कि आप फिल्म खत्म होने के बाद भी उस बारे में सोचते रहते हैं। निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म 'पायर' भले ही दो घंटे से भी कम समय में खत्म हो जाती है पर इसकी कहानी हमेशा के लिए आपके अंदर घर कर जाती है।
इससे पहले कापड़ी ने 2015 में 'मिस तनकपुर हाज़िर हो' से समाज और कानून पर व्यंग्य किया था। फिर दो साल की बच्ची को लेकर फिल्म 'पीहू' शूट की, जिसने हर किसी को डरा-डराकर खूब रुलाया। 2021 में फिल्म '1232 किमी' लेकर आए जो कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान साइकिल से बिहार लौट रहे सात प्रवासी मजदूरों पर आधारित डॉक्यूमेंट्री थी और अब लेकर आए हैं 'पायर'।
'पायर' एक ऐसी संवेदनशील कहानी है, जो उत्तराखंड के पहाड़ों में रहने वाले एक बुजुर्ग दंपती के जरिए बुढ़ापे, अकेलेपन, पलायन और रिश्तों की अहमियत को सामने लाती है। फिल्म आपसे सबसे बड़ा सवाल यह करती है कि जब जिंदगी मुश्किल होने लगे और अपने साथ छोड़ने लगें, तब आपका हाथ थामने वाला कौन होगा? क्या है फिल्म की कहानी और कैसी है यह? जानिए इस रिव्यू में…
वैसे तो पायर की कहानी उत्तराखंड के गांव में रहने वाले आमा (हीरा देवी) और बुबू (पदम सिंह कापड़ी) नाम के बुजुर्ग दंपत्ति की है। फिर भी यह कह सकते हैं कि 'पायर' सिर्फ दो बुजुर्गों की कहानी नहीं है, बल्कि उन तमाम माता-पिता की जिंदगी का आईना है, जिनके बच्चे बेहतर भविष्य की तलाश में शहरों का रुख कर लेते हैं। पीछे छूट जाते हैं खाली होते गांव, पुराने घर, बीते दिनों की यादें और उम्र के उस पड़ाव पर बढ़ती जरूरतें, जब इंसान को सबसे ज्यादा अपनों के साथ की जरूरत होती है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में बसे एक गांव में रहने आमा और बुबू 28 साल से अपने बेटे हरिया के लौटने का इंतजार कर रहे हैं। आमा अक्सर बीमार रहती हैं और उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए बुबू को दो कंधों की जरूरत पड़ती है। गांव के दो लड़के लक्ष्मण (सुभाष चंद्र) और जीवन (शुभम चौधरी) आमा को पहाड़ से नीचे उतरने और वापस लाने में मदद करते हैं।
इस मदद के बदले में बुबू अपनी बकरियां उनको सम्मान स्वरूप देते हैं। बुजुर्ग दंपत्ति का मानना है कि जब तक उनके पास देने के लिए बकरियां हैं, वह तब तक ही जिंदा रह सकते हैं। इसके बाद उनकी मदद करने कोई नहीं आएगा। इसी बीच जीवन की नौकरी लग जाती है और वह मुंबई चला जाता है। वहीं दूसरी तरफ लक्ष्मण भी अपने परिवार के साथ गांव छोड़ देता है।
एक दिन डाकिया बिशन (सादाब खान) आमा-बुबू के बेटे हरिया की चिट्ठी लेकर आता है। इस चिट्ठी में लिखा होता है कि कुछ दिनों बाद हरिया गांव वापस लाैटने वाला है। यह सुनकर आमा-बुबू खुश हो जाते हैं पर हरिया तय तारीख पर वापस नहीं आता।
अब आमा-बुबू को इस बात की चिंता सताने लगती है कि गांव खाली होने के बाद उनका साथ या उनकी मदद के लिए कौन आएगा? आगे क्या होगा? क्या हरिया गांव वापस लौटेगा? इन सवालों का जवाब पाने के लिए आप यह फिल्म देख सकते हैं।
कहानी का दर्द इस बात में भी है कि यहां किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराना आसान नहीं। बच्चे रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में दूर चले जाते हैं। वहीं पीछे रह जाने वाले माता-पिता को अपनी चिंता सताने लगती है क्योंकि उनका भविष्य अनिश्चित हो जाता है। फिल्म इसी दूरी और उससे पैदा होने वाले भावनात्मक खालीपन को बारीकी से पकड़ती है।
अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके मुख्य कलाकार पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी ही हैं। हैरत होती है यह जानकर की दोनों पेशेवर अभिनेता नहीं हैं पर कैमरे पर यह इतने सहज और स्वाभाविक हैं कि कुछ पल के लिए आप भी भूल जाते हैं कि फिल्म देख रहे हैं। दोनों के बीच की केमिस्ट्री भी कमाल ही है।
वे एक-दूसरे से नोंक-झोंक करते हैं, छोटी-छोटी बातों पर नाराज होते हैं और कभी एक-दूसरे का मजाक भी उड़ाते हैं। पर जब बात एक-दूसरे के लिए खड़े रहने की हो तो पीछे नहीं हटते। दोनों की खामोशी भी फिल्म का खास बनाती है। उनका रिश्ता किसी आदर्श प्रेम कहानी जैसा नहीं, बल्कि बरसों साथ बिताने वाले पति-पत्नी जैसा है।
बुबू के किरदार में पदम सिंह कापड़ी अपनी मौजूदगी से यह एहसास दिलाते हैं कि जब तक वो हैं आमा को कुछ नहीं होगा। फिर एक वक्त बाद जब गांव खाली होने लगता है तो उनकी लाचारी देखकर आपका दिल भर आता है। कुछ दृश्यों में वह इतने स्वाभाविक नजर आते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं कि वह अभिनय कर रहे हैं।
वहीं आमा के किरदार में हीरा देवी अपने तानों से आपके चेहरे पर मुस्कान लाते हैं। वह बुबू से जितना प्यार करती हैं, उतना ही उन्हें परेशान भी करती हैं। पूरी फिल्म में दोनों अपने प्रेम का इजहार बड़े संवादों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी जिम्मेदारियों से करते हैं।
बाकी कलाकारों ने अपना किरदार बेहद संजीदगी से निभाया है। इस क्षेत्र में फिल्म में कोई कमी नहीं हैं।
निर्देशन
अपनी पुरानी फिल्मों की तरह विनोद कापड़ी ने इस फिल्म को भी सरल और स्वाभाविक रखा है। इसमें हर एक छोटे सीन का बड़ा महत्व है।
उन्होंने एक कहानी और करीबन दो घंटे की एक फिल्म में हर तरह का इमोशन पेश किया है। कहानी के जरिए वह जिंदगी के कई पहलुओं को छूने में सफल होते हैं। सिनेमैटोग्राफी फिल्म के भावनात्मक प्रभाव को बढ़ाती है। पहाड़ों और फैली हुई वादियों को बड़े फ्रेम में दिखाया गया है। इन विशाल पहाड़ों के बीच दो बुजुर्ग किरदार बेहद छोटे दिखाई देते हैं।
यह दृश्यात्मक विरोधाभास उनके अकेलेपन को बिना कुछ कहे व्यक्त करता है। बीजीएम कहानी के मुताबिक चलता है। बारिश की आवाज और आसपास के प्राकृतिक वातावरण की ध्वनियां दर्शकों को उस गांव की दुनिया में ले जाती हैं। ठंड, सन्नाटा और लंबे होते दिन सब कुछ महसूस होता है।
'पायर' की सबसे बड़ी दिक्कत इसकी धीमी रफ्तार है। आम दर्शक इस फिल्म में डूबने में वक्त ले सकते हैं। हो सकता है कि उनके सब्र का इम्तिहान लिया जाए। कुछ हिस्सों में संपादन ज्यादा चुस्त होता, तो फिल्म का प्रभाव और बेहतर हो सकता था।
देखें या नहीं?
'पायर' उन फिल्मों में है, जो मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों को अपने जीवन और रिश्तों पर सोचने का मौका देती हैं। यह बुढ़ापे की चुनौतियों, गांवों से पलायन और परिवारों के बीच बढ़ती दूरी को एक बुजुर्ग दंपती की कहानी में पिरोती है।
अगर आप मार्मिक और गहरे अर्थ वाला सिनेमा देखना पसंद करते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है। पर अगर आप सिर्फ एंटरटेनमेंट ढूंढ रहे हैं तो यह ऑप्शन आपके लिए नहीं है।
हां यह जरूर है कि फिल्म देखने के बाद यकीनन आप अपने माता-पिता या दादा-दादी को फोन करने और उनके साथ कुछ वक्त बिताना चाहेंगे।