Mujib Review: बेनेगल ने पर्दे पर दिखाई बांग्लादेश की अद्भुत जन्मकथा, अरिफिन शुवू का चकित कर देने वाला अभिनय
फिल्म 'मुजीब: द मेकिंग ऑफ ए नेशन' बांग्लादेश के संस्थापक कहे जाने वाले शेख मुजीबुर रहमान की बायोपिक है। बांग्लादेश के राष्ट्रपिता का दर्जा पाने वाले मुजीब ने ही पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में देश की अगुवाई की और उसके बाद पाकिस्तान से अलग होकर ही बांग्लादेश बना। फिल्म ‘मुजीब’ का निर्माण भारत के राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) और बांग्लादेश फिल्म विकास निगम (बीएफडीसी) ने मिलकर किया है। भारत और बांग्लादेश के सहयोग से बनी यह दूसरी फिल्म है। इससे पहले दोनों देशों के सहयोग से ऋत्विक घटक साल 1973 में बांग्ला फिल्म 'तिताश एकती नादिर नाम' का निर्माण कर चुके हैं।
फिल्म ‘मुजीब’ की कहानी शेख मुजीबुर रहमान के बचपन से शुरू होती है और बांग्लादेश के उस सैन्य तख्तापलट पर आकर खत्म हो जाती हैं जहां उनके पूरे परिवार की हत्या कर दी गई थी। ये सारी घटनाएं चूंकि ऐतिहासिक हैं और मुजीब के बारे में सबको पता है लिहाजा फिल्म देखते समय इनकी जानकारी पहले से होना दर्शकों के लिए लाजिमी ही है। बांग्लादेश की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी बहन उस कत्लेआम में इसलिए बच गईं क्योंकि उस वक्त दोनो जर्मनी में थी। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के भीतर अपनी अलग सांस्कृतिक विरासत को लेकर जो छटपटाहट शुरू से रही, वह इस फिल्म की अंतर्धारा है। पश्चिमी पाकिस्तान के हुक्मरान की जोर जबर्दस्ती के चलते यहां के लोगों के मान सम्मान के साथ लगातार खिलवाड़ हुआ और इसी का नतीजा बना पाकिस्तान का बंटवारा। स्वतंत्र बांग्लादेश बनाने में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अहम भूमिका रही।
शेख मुजीबुर रहमान की उपलब्धियों के साथ-साथ उनके व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन को भी दिखाती फिल्म ‘मुजीब’ में इस बात पर खासा जोर है कि वह देश कल्याण की भावना के साथ-साथ अपने परिवार का भी ध्यान रखते थे। मुजीब को एक पारिवारिक शख्सियत के तौर पर प्रदर्शित करने में ही श्याम बेनेगल के निर्देशन कौशल की असल बानगी मिलती है। श्याम बाबू को इतिहास को मानवीय नजरिये से दिखाने में जो महारत हासिल है, उसकी परंपरा उनके चाहने वाले ‘भारत एक खोज’ से पहचानते आ रहे हैं। भारतीय सिनेमा की जीती जागती किंवदंती बन चुके श्याम बेनेगल को इस फिल्म के लिए भी तमाम पुरस्कार जरूर मिलेंगे और 88 साल की उम्र में भी उनकी सक्रियता तमाम फिल्मकारों के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है।
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फिल्म ‘मुजीब’ को इसके सिनेमैटोग्राफर आकाशदीप पांडे ने बड़ी भव्यता के साथ शूट किया गया है। श्याम बाबू की बेटी पिया फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइनर हैं और उनकी कुशलता फिल्म के हर कलाकार की वेशभूषा में झलकती है। आर्ट डायरेक्टर शुक्राचार्य घोष, नीतीश रॉय और विष्णु निषाद ने उस दौर के माहौल को जीवंत करने के लिए बहुत ही शानदार सेट डिजाइन किए गए है जो वास्तविक लगते हैं। फिल्म में इसके एडिटर असीम सिन्हा ने ऐतिहासिक महत्व के फुटेज का अच्छा प्रयोग किया है जो फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। फिल्म ‘मुजीब’ की शूटिंग बांग्ला और हिंदी दोनों भाषाओं में हुई है। फिल्म का कालखंड समझाने में शांतनु मोइत्रा बैकग्राउंड काफी मदद करता है।
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शेख मुजीबुर रहमान की भूमिका फिल्म ‘मुजीब’ में बांग्लादेश के लोकप्रिय अभिनेता अरिफिन शुव ने निभाई है और अपनी भूमिका के साथ पूरी तरह से न्याय करने की कोशिश की है। दृढ़ इच्छाशक्ति, अटल विश्वास के साथ साथ एक जटिल राजनीतिक की भूमिका में वह पूरी तरह से खरे उतरे हैं। शेख मुजीबुर रहमान की पत्नी की भूमिका में नुसरत इमरोज तिशा भी बांग्लादेशी फिल्मों की अभिनेत्री और निर्माता है। इस फिल्म में उन्होंने अपने अभिनय से अच्छा प्रभाव छोड़ा है। इनके अलावा महात्मा गांधी की भूमिका में दीपक अंतानी, खोंडेकर मुश्ताक अहमद की भूमिका में फजलुर्रहमान बाबू, शेख हसीना के किरदार में नुसरत फारिया, जुल्फिकार अली भुट्टो के किरदार में रजित कपूर, शेख लुटफर रहमान की भूमिका में चंचल चौधरी, जनरल अयूब खान की भूमिका में मिशा सावदागोर आदि का अभिनय सराहनीय रहा। इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों को ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए।
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