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'स्पेशल 26': मजेदार है नकली सीबीआई की लूट
रोहित मिश्र
Updated Fri, 08 Feb 2013 03:40 PM IST
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'स्पेशल 26' कुछ सच्ची घटनाओं से प्रेरित होकर बनायी गयी फिल्म है। फिल्म एक ऐसे गिरोह की वारदातों की कहानी है जो नकली सीबीआई बनकर भ्रष्ट अफसरों और बड़े दुकानदारों के यहां छापे डालकर उन्हें लूटता है। इस नकली सीबीआई गिरोह को पकड़ने असली सीबीआई भी है। तो यहां पर दो कहानियां हैं। एक नकली सीबीआई की लूट वारदातों की और दूसरी असली वर्सेज नकली सीबीआई के बीच होने वाली आंख मिचौली की। यह फिल्म अस्सी के दौर में नकली सीबीआई द्वारा एक बड़ी दुकान पर लूट की असली घटना पर आधारित है।
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फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि सत्य घटना पर आधारित इस फिल्म को एक फिल्म की तरह बनाया गया है। वह सारा सामान जो किसी फिल्म को मनोरंजक और पैसा वसूल बनाता है आपको इस फिल्म में जरूरी मात्रा में मिल जाएगा। सही-गलत के उबाऊ और रुटीन हो चले भाषणो से अलग यह फिल्म नकली सीबीआई के पकड़े जाने या उनके प्रायश्चित करने के बजाय उन्हें विनर अंदाज में जाने देती हैं। फिल्म का ताना-बाना कसा हुआ है और संवाद चुटीले हैं। दर्शक को नकली लूट में भी मजा आता है और असली सीबीआई के धोखा खाने पर। यह मुख्य धारा की फिल्म लगे इसलिए इसमें एक ट्रैक मोहब्बत का भी रखा गया है। पर उसे उतना ही खींचा गया जितना की वह मूल कहानी को प्रभावित न करने लगे।
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कहानी
एक नकली सीबीआई गिरोह है। अजय कुमार (अक्षय कुमार) और पीके शर्मा (अनुपम खेर) इस नकली गिरोह को लीड करते हैं। दिल्ली में एक मंत्री के यहां रेड डालने में यह लोग दिल्ली पुलिस के एक इंस्पेक्टर रणवीर सिंह (जिम्मी शेरगिल) की मदद लेते हैं। छापे और लूट के बाद जब रणवीर सिंह को इस नकली वारदात का पता चलता है। सस्पेंड हो चुके रणवीर सिंह नकली सीबीआई अधिकारी वसीम खान (मनोज बाजपेई) के साथ मिलकर उन लोगों को पकड़ने की साजिश रचता है। वसीम खान उन्हें रंगे हाथों पकड़ना चाहता है। इसके लिए नकली सीबीआई गिरोह के सदस्यों के फोन टेप किए जाते हैं। मुंबई के ओपेरा हाऊस स्थिति एक बड़ी ज्वेलरी शॉप पर नकली सीबीआई को छापा डालकर लूट करनी होती है। इस बात का पता असली सीबीआई को होता है। असली सीबीआई उन्हें पकड़ने के लिए पूरा जाल बिछाती है। क्लाइमेक्स में कुछ ऐसा होता है कि असली सीबीआई के होश उड़ जाते हैं। नकली सीबीआई कैसे, असली सीबाआई को चकमा देती है यही 'स्पेशल 26' की कहानी है। फिल्म का नाम 'स्पेशल 26' इसलिए है क्योंकि अंतिम वारदात को अंजाम देने के लिए 26 स्पेशल सीबीआई अधिकारियों की नियुक्ति नकली सीबीआई अधिकारियों द्वारा की जाती है।
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अभिनय
पूरी फिल्म अक्षय कुमार और अनुपम खेर के इर्द-गिर्द घूमती है। लुटेरे होते हुए भी यही फिल्म के हीरो हैं। इन दोनों को ही अभिनय में कुछ साबित करने के लिए बचा नहीं है। 'स्पेशल 26' इनके द्वारा निभाए गए दर्जनों किरदार में से एक ही है। यहां कुछ अलग ऐक्टिंग की कोशिश नहीं की गयी है। कई दृश्यों को देखकर लगता है कि अक्षय कुमार कुछ अनमने ढंग से फिल्म कर रहे हैं। अनुपम खेर हमेशा की तरह रोल के मुफीद हैं। जिम्मी शेरगिल के किरदार के पास न तो वजन है और न ही ज्यादा संवाद। फिल्म में असली सीबीआई अधिकारी की भूमिका निभा रहे मनोज बाजपेई अच्छे लगे हैं। ज्यादातर अच्छे संवाद उन्हीं के हिस्से आए हैं। लगातार दूसरी हिंदी फिल्म में काजल अग्रवाल को सलवार-शूट पहना दिया गया। सिंघम में तो वह कहानी का थोड़ा-बहुत हिस्सा थीं यहां उनके लिए नायक का इंतजार करने और उसको देख कर रही मर-मर जाने के अलावा उनके पास और कोई काम नहीं हैं। सुंदर तो वह हैं हीं इस फिल्म में और भी ज्यादा लगी हैं।
निर्देशन
'स्पेशल 26' निर्देशित करने वाले नीरज पांडेय ने इसके पहले एकमात्र फिल्म 'ए वेडनसडे' बनायी है। फिल्म बिरादरी के अलावा आम दर्शकों को भी यह फिल्म रास आयी थी। 'ए वेनडसडे' के साथ ऑफबीट का जो एक टैग लगा हुआ था, अपनी दूसरी फिल्म से नीरज पांडेय ने इस टैग को हटाने की पूरी कोशिश की है। यह कोशिश अक्षय कुमार और काजल अग्रवाल जैसे कलाकारों को फिल्म में लेकर है, वरना इस कहानी को तो स्टार की जरूरत ही नहीं थी। फिल्म मुख्य धारा की लगे इसलिए फिल्म में रोमांस का एक ट्रैक है। कुछ गाने और मौके-मौके पर थोड़ी बहुत कॉमेडी है। यह फिल्म का कमजोर हिस्सा है। नीरज इसे समझते भी हैं, इसलिए उन्होंने अपना पूरा फोकस मुख्य कहानी पर ही लगाकर रखा है। नीरज की कोशिश रही है कि फिल्म का ताना-बाना अस्सी के दशक का लगे। 2013 में जो चीजें आसानी से ट्रैप हो सकती हैं या जिन्हें दर्शक समझ सकते हैं उन्हें उस दौर को देखते हुए कठिन बनाकर पेश किया गया है। शायद ज्यादातर दर्शक यह बात उस दौर में जाकर सोचने की कोशिश न करें और उन्हें यह फिल्म अंडर स्मार्ट लगे। उन्हें रेस जैसी ओवर स्मार्ट फिल्मों की लत लग चुकी है। हिंदी फिल्मों में आमतौर पर गलत को गलत साबित करके ऐसा करने वालों से प्रायश्चित कराया जाता है। इस फिल्म में चोर करने के बाद लूट को अंजाम देने वाले आराम से एक क्रिकेट मैच देख रहे होते हैं और फिल्म खत्म हो जाती है। यह बात कुछ जज्बाती दर्शकों को अखर सकती है।
संगीत
फिल्म में संगीत को कोई खास जगह थी नहीं, इसलिए जबरन गानों को ठूंसा नहीं गया है। 'मुझमें तू' गाना जिसका मुखड़ा अक्षय कुमार ने गाया को सुनना अच्छा लगता है। बप्पी लहरी की आवाज में गाया गया 'धरपकड़' गाना फिल्म के आख्रिरी में है। मजेदार लाइनों वाला यह गाना यदि फिल्म के बीच में होता तो बेहतर होता। एक रूटीन सा पंजाबी गाना भी है। फिल्म अपने संगीत के लिए शायद ही याद रखी जाए।
क्यों देखें
एक ऐसी फिल्म के लिए जो आपको बांधकर रखती है। इसके अलावा नकली सीबीआई की स्मार्ट चोरी और सीनाजोरी के लिए।
क्यों न देखें
यदि आप फिल्म को 100 ग्राम का मानते हैं। और उसे 20 ग्राम रोमांस, 15 ग्राम एक्शन, 25 ग्राम ड्रामा, 15 ग्राम कॉमेडी, 10 ग्राम ओवर ऐक्टिंग और 15 ग्राम फिल्म के लोकशन और गानों वाले गणित से देखते हों।