Movie Review: ना रोमांस-ना मैसेज, फ्यूज रही ये 'ट्यूबलाइट'

रवि बुले Updated Fri, 23 Jun 2017 03:12 PM IST
ट्यूबलाइट
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-निर्माताः सलमा खान/सलमान खान
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-निर्देशकः कबीर खान

-सितारेः सलमान खान, सोहेल खान, जूजू, जीशान अयूब, ओम पुरी, मातिन रे तंगु, शाहरुख खान

रेटिंग- **

कॉम्पेक्ट फ्लोरोसेंट लाइट उर्फ सीएफएल बल्ब के जमाने में ट्यूबलाइट यानी 2017 में 1962 की कहानी। यह ट्यूबलाइट नाम के अनुरूप शुरू से अंत तक लपक-झपक करती है। आप कहते रहते हैं, जल जा... जल जा... जल जा... परंतु वह पूरी तरह रोशन नहीं होती।

हल्के रोशनीदार मनोरंजन में आप खुश हो सकते हैं कि ट्यूबलाइट पर सलमान खान ब्रांड चिपका है तो फिल्म से काम चला लें। वर्ना इसे देखने की ठोस वजह नहीं है। बजरंगी भाईजान में सशक्त कहानी लाने वाले निर्देशक कबीर खान यहां कमाल नहीं करते। मैदान-ए- जंग में इमोशन जगाना उनकी खूबी है, परंतु वह जादू यहां गायब है। 


कबीर जादू दिखाने के लिए शाहरुख खान को लाए हैं लेकिन वह फीके रहे। वह फिल्म में टीवी धारावाहिक में गेस्ट अपीयरेंस करने वाले ऐक्टर जैसे दिखे हैं। हां, ओम पुरी को देख कर जरूर खुशी मिलती है। जीशान अयूब छोटे-छोटे मौकों पर तेवर दिखाते हैं।

जूजू कम मौकों के बावजूद उपस्थित हैं। बालक मातिन भी ठीक हैं लेकिन सलमान के जिन कंधों पर दारोमदार था, उन्हें डायरेक्टर ने कमजोर कर दिया। ट्यूबलाइट नहीं जली। सलमान को रिलीज के बाद एहसास होगा कि कबीर ने चीटिंग की क्योंकि दर्शकों को यही लगता है। यह वह सलमान नहीं, जो सुपरस्टार है। 

1962 में चीन के साथ हुए युद्ध की कहानी

ट्यूबलाइट
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कबीर ने 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध की पृष्ठभूमि में कहानी कही। कम उम्र में मां-पिता को खो देने वाले लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान) और भरत सिंह बिष्ट (सोहेल खान) पहाड़ों में चीन की सीमा से लगे जगतपुरा में रहते हैं। युद्ध के दौरान सैनिकों की भर्ती होती है तो मंदबुद्धि लक्ष्मण पीछे रह जाता है। भरत सेना में जाता है।

बुरी खबरें आती हैं। चीनी मूल के मां-बेटे (जुजु-मातिन) कलकत्ता से जगतपुरा रहने आते हैं। उनके पुरखे चार पुश्त पहले हिंदुस्तान में आ बसे थे। दोनों खुद को हिंदुस्तानी कहते हैं जिस पर लक्ष्मण भरोसा करता है लेकिन बाकी लोग उस जैसे भोले नहीं हैं। बुरी खबरों के बीच लक्ष्मण को यकीन है कि भाई जरूर लौटेगा।

फिल्म में इंसानी यकीन पर ढेर सारी बातें है। जादूगर लक्ष्मण को यकीन दिलाता है कि उसने मंच पर टेबल पर रखी कांच की बोतल सिर्फ अपने यकीन से खिसका दी। लक्ष्मण यह जादू जगतपुरावासियों के सामने फिर आजमाता है कि वह सिर्फ यकीन से सामने खड़े पहाड़ की चट्टान हिला सकता है। उसी पल भूकंप आ जाता है। युद्ध रोकने के लिए लक्ष्मण अपना यकीन आजमाता है और युद्ध रुकने की खबर आ जाती है! लेकिन क्या भरत लौटेगा?

चीनियों की कैद से भागते हुए वह गोली खा चुका है। इसमें संदेह नहीं कि अमेरिकी फिल्म लिटिल बॉय (2015) के हिंदी रूपांतरण में निर्माता- निर्देशक-सितारे के इरादे नेक हैं। मगर फिल्म से कनेक्ट होने से पहले सलमान से जुड़ाव की समस्या है। वह मंदबुद्धि हीरो के रूप में नहीं जमते। 

न रोमांस, न कॉमेडी और न ऐक्शन

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लोकप्रिय छवि के विपरीत वह न रोमांस करते हैं, न कॉमेडी और न ऐक्शन। जीशान अयूब उन्हें जब-तब थप्पड़ मारते हैं। पिटते सलमान के लिए तेरे नाम जैसी संवेदनाएं नहीं जागती। न मतिन के लिए बजरंगी वाली मुन्नी जैसे भाव उमड़ते हैं।

चीन के साथ युद्ध में भी पाकिस्तान वाली भावनाएं पैदा नहीं होतीं। फिल्म में न देश प्रेम की ऊंची लहरें हैं और न फैन्स के लिए ठोस संदेश। जैसा सलमान की पिछली फिल्मों में दिखा है। म्यूजिक ठीक है। कुल जमा फिल्म सलमान के उन फैन्स के लिए है जो आंख मूंद कर उनके स्टारडम पर यकीन करते हैं।
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