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12 रुपये में कोई क्या ‘इसक’ करे?
रवि बुले
Updated Fri, 26 Jul 2013 11:47 AM IST
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फिल्म ‘इसक’ के हीरो प्रतीक के सांसद पिता राज बब्बर का कहना है कि मुंबई जैसे महानगर में तक मात्र 12 रुपये में कोई भी आदमी पेट भर भोजन कर सकता है। कोई उनसे पूछे कि योजना आयोग की खींची 33 रुपये की ‘अमीरी रेखा’ में से अगर दो वक्त के 12-12 रुपये निकाल दिए जाएं तो क्या ‘इसक’ का टिकट आ सकता है?
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अगर यह संभव है तो बाकी पैसे से आप जरूर यह फिल्म देखें। हकीकत यह है कि सरकार में ऐसे मंत्री भी मौजूद हैं जो मानते हैं कि पब्लिक अंधेरे में अपना मनोरंजन आप करना जानती है। उसे ऐसे एंटरटेनमेंट की जरूरत ही नहीं जिसमें बिजली-पानी का खर्चा बैठता हो।
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यही कारण है कि योजना आयोग जब आम आदमी की जरूरतें गिनता है तो वह रोटी पर ही ठहरा रहता है। जबकि आम आदमी के लिए दो जून की थाली कमाना ‘इक आग का दरिया है और डूब के जाना है’ जैसा मुश्किल है।
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‘इसक’ की फिलॉसफी भी कुछ आग के दरिया जैसी है। दो प्रेमी। दो परिवार। दुश्मनी की दो पीढिय़ां। अगर किसी नौसिखिए को भी इस लाइन पर कहानी लिखने को कहा जाए तो वह बॉलीवुड की मसाला फिल्म लिख मारेगा। हर दूसरे डायरेक्टर की जेब में यहां ऐसी कहानी पड़ी है। फिर ‘इसक’ में नया क्या है? कुछ नहीं।
बनारस के गंगा घाट को भी लोग फिल्मों में खूब देख चुके हैं। रह गए प्रतीक, तो वह कुछ फिल्म पुराने हो चुके हैं। अमायरा दस्तूर नई हैं। वे खूबसूरत हैं।
‘इसक’ में निर्देशक मनीष तिवारी ने बनारस की पृष्ठभूमि में रेत के ठेकों की आड़ में चलने वाली दो माफियाओं की दुश्मनी की कहानी कही है। एक तरफ है हीरो का मिश्रा परिवार और दूसरी तरफ है हीरोइन का कश्यप परिवार।
कुछ नयापन देने के लिए यहां ‘लाल सलाम’ को सिर उठाते दिखाया गया है। वह दोनों परिवारों को खत्म करके खुद रेत माफिया बनना चाहता है। राहुल (प्रतीक) ने कसम खाई है कि वह सुधर जाएगा, गैंगवार का हिस्सा नहीं बनेगा।
जबकि बच्ची (अमायरा) हॉस्टल से पढ़ कर घर लौटी है। उसका ब्याह होना है। जैसा कि फिल्मों में होता है, हीरो हथियार को हाथ न लगाने की कसम खा लेता है तो लोग उसे फिर से खून की होली खेलने को मजबूर कर देते हैं। हीरोइन पूरी मासूमियत से फरार हुए हीरो का इंतजार करती रहती है। एकाध बार जान देने की भी कोशिश करती है...।
‘इसक’ इन्हीं रास्तों से होकर गुजरती है। गैंगवार। चोरी-छुपे प्यार। मंदिर में शादी। एक राज छुपाने वाली अम्मा। क्रूर मामा। चालाक या सौतेली मां। बीमार पिता।
निर्देशक ने शेक्सपीयर के रोमियो एंड जूलियट को अपनी कहानी का आधार बनाया है। फिल्म का अंत तो त्रासद है ही, दर्शक के लिए भी फिल्म किसी त्रासदी से कम साबित नहीं होती। पहले हिस्से में फिल्म जहां रफ्तार से बिना दाएं-बाएं देखे दौड़ती जाती है, वहीं दूसरे हिस्से में उसकी गति मंथर हो जाती है। धक्का दे-दे कर उसे बढ़ाया जाता है।
विपरीत परिस्थितियों में कसमें, वादे, प्यार, वफा...। ऐसी फिल्में बॉलीवुड में खूब बनी हैं। अगर आपने अभी तक ऐसी फिल्म न देखी हो तो ‘इसक’ एंटरटेनर है। प्रतीक के कैरियर में इस फिल्म से कुछ खास नहीं जुडऩे वाला।
अमायरा को अगली फिल्म में नए सिरे से शुरुआत करनी होगी। मनीष तिवारी ‘दिल दोस्ती एटसेट्रा’ के करीब पांच साल बाद अपनी दूसरी फिल्म लाए, लेकिन हर लिहाज से इसमें नवीनता गायब है।