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Film Review: एक प्रेरक जिंदगी है 'पूर्णा'
रवि बुले
Updated Fri, 31 Mar 2017 05:26 PM IST
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मूवी रिव्यू
-निर्माता-निर्देशकः राहुल बोस
-सितारेः अदिति ईनामदार, राहुल बोस, हीबा शाह, धृतिमान चटर्जी, एस.मारिया
रेटिंग ***
एक आईपीएस अफसर जब गरीब-वंचित बच्चों पर विश्वास व्यक्त करते हुए उन्हें कामयाब पर्वतारोही बनाना चाहता है तो उससे वरिष्ठ अधिकारी प्रश्न करती है, ‘क्या तुम स्लमडॉग माउंटेनियर बनाना चाहते हो?’ निर्माता-निर्देशक राहुल बोस पूर्णा में वह अधिकारी हैं जो विदेश से पढ़ कर लौटने के बाद समाज कल्याण विभाग में काम करता है।
वहीं उसकी मुलाकात सरकारी आवासीय स्कूल छोड़ कर भागने वाली पूर्णा मलावत से होती है। जिससे पुरानी स्कूल का मास्टर इसलिए हर वक्त झाड़ू लगवाता था कि उसके पिता ने फीस नहीं भरी। फिल्म सरकारी शिक्षा व्यवस्था, उसकी वास्तविक स्थिति, ग्रामीण पिछड़े इलाकों में लड़कियों की शिक्षा, बाल विवाह और पूरे तंत्र में बुने भ्रष्टाचार को सामने लाती है। पूर्णा बायोपिक है।
वर्तमान तेलंगना राज्य के निजामाबाद जिले के ग्रामीण इलाके में जन्मी-पली पूर्णा मलावत की। जिसने 2014 में मात्र 13 साल 11 महीने की उम्र में दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी एवरेस्ट पर पहुंचने का करिश्मा किया था। इस उम्र में एवरेस्ट का शिखर छूने वाली वह सबसे कम उम्र की लड़की है।
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-सितारेः अदिति ईनामदार, राहुल बोस, हीबा शाह, धृतिमान चटर्जी, एस.मारिया
रेटिंग ***
एक आईपीएस अफसर जब गरीब-वंचित बच्चों पर विश्वास व्यक्त करते हुए उन्हें कामयाब पर्वतारोही बनाना चाहता है तो उससे वरिष्ठ अधिकारी प्रश्न करती है, ‘क्या तुम स्लमडॉग माउंटेनियर बनाना चाहते हो?’ निर्माता-निर्देशक राहुल बोस पूर्णा में वह अधिकारी हैं जो विदेश से पढ़ कर लौटने के बाद समाज कल्याण विभाग में काम करता है।
वहीं उसकी मुलाकात सरकारी आवासीय स्कूल छोड़ कर भागने वाली पूर्णा मलावत से होती है। जिससे पुरानी स्कूल का मास्टर इसलिए हर वक्त झाड़ू लगवाता था कि उसके पिता ने फीस नहीं भरी। फिल्म सरकारी शिक्षा व्यवस्था, उसकी वास्तविक स्थिति, ग्रामीण पिछड़े इलाकों में लड़कियों की शिक्षा, बाल विवाह और पूरे तंत्र में बुने भ्रष्टाचार को सामने लाती है। पूर्णा बायोपिक है।
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वर्तमान तेलंगना राज्य के निजामाबाद जिले के ग्रामीण इलाके में जन्मी-पली पूर्णा मलावत की। जिसने 2014 में मात्र 13 साल 11 महीने की उम्र में दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी एवरेस्ट पर पहुंचने का करिश्मा किया था। इस उम्र में एवरेस्ट का शिखर छूने वाली वह सबसे कम उम्र की लड़की है।
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आदिवासी लड़की के संघर्षों की कहानी
मूवी रिव्यू
राहुल बोस ने इस आदिवासी लड़की के संघर्षों की कहानी को बिना ग्लैमर या अतिरंजना के पर्दे पर उतारा है। वह सहज मानवीय नजरिये से हर बात को देखते और फिल्माते हैं। पूर्णा प्रेरक कहानी की तरह समाने आती है। बोस ने भले ही ‘लड़कियां कुछ भी कर सकती हैं’ जैसी टैग लाइन फिल्म के टाइटल से जोड़ी मगर वह जिंदगी के और भी पाठ पढ़ाती है।
फिल्म की खूबसूरती इसमें है कि इसे सच्चाई के बेहद नजदीक रखा गया है। यह एक साथ कई स्तरों पर बात करती है। चूंकि पर्वतारोहण एक धीमी और कठिन प्रक्रिया है, जिसमें कोई प्रतियोगिता नहीं है और एक साथ सभी जीतते हैं, इसलिए फिल्म में प्रतिस्पर्द्धा का रोमांच गायब है। फिर भी दुविधा के कुछ पल आते हैं जब चोटी के नजदीक पहुंची पूर्णा अस्वस्थ होती है और सरकारी अधिकारी सोच में पड़ते हैं कि इस कमसिन बच्ची को कुछ हो गया तो समाज और मीडिया के सवालों का जवाब कैसे देंगे। फिल्म को सादगी से और कुछ डॉक्युड्रामा के अंदाज में शूट किया गया।
अतः इसे देखना थोड़े धैर्य की भी अपेक्षा करता है। बोस ने पर्दे पर और इससे पीछे अपनी भूमिकाओं को बढ़िया ढंग से निभाया है। वह संतुलन बनाए रखते हैं। फिल्म शुरू से अंत तक एक टोन में चलती है। पूर्णा की भूमिका में अदिति ईनामदार का अभिनय अच्छा है। फिल्मी लटकों-झटकों के अभाव में भी पूर्णा एक सुखद अनुभव है।
फिल्म की खूबसूरती इसमें है कि इसे सच्चाई के बेहद नजदीक रखा गया है। यह एक साथ कई स्तरों पर बात करती है। चूंकि पर्वतारोहण एक धीमी और कठिन प्रक्रिया है, जिसमें कोई प्रतियोगिता नहीं है और एक साथ सभी जीतते हैं, इसलिए फिल्म में प्रतिस्पर्द्धा का रोमांच गायब है। फिर भी दुविधा के कुछ पल आते हैं जब चोटी के नजदीक पहुंची पूर्णा अस्वस्थ होती है और सरकारी अधिकारी सोच में पड़ते हैं कि इस कमसिन बच्ची को कुछ हो गया तो समाज और मीडिया के सवालों का जवाब कैसे देंगे। फिल्म को सादगी से और कुछ डॉक्युड्रामा के अंदाज में शूट किया गया।
अतः इसे देखना थोड़े धैर्य की भी अपेक्षा करता है। बोस ने पर्दे पर और इससे पीछे अपनी भूमिकाओं को बढ़िया ढंग से निभाया है। वह संतुलन बनाए रखते हैं। फिल्म शुरू से अंत तक एक टोन में चलती है। पूर्णा की भूमिका में अदिति ईनामदार का अभिनय अच्छा है। फिल्मी लटकों-झटकों के अभाव में भी पूर्णा एक सुखद अनुभव है।