Chhipkali Review: यशपाल शर्मा के कंधे पर टिकी ‘छिपकली’, लीक से इतर कथा पर चौंकाने वाली फिल्म बनाने की कोशिश
अपनी फिल्म ‘दादा लखमी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके यशपाल शर्मा की बतौर अभिनेता नई फिल्म 'छिपकली' सीमित संसाधनों से बनी और सीमित सिनेमाघरों में ही रिलीज होने वाली फिल्म है। यशपाल शर्मा मानते है कि इस फिल्म में उनका निभाया किरदार अब तक की फिल्मों में निभाए गए किरदार से काफी अलग है। उनके मुताबिक, चाहे कोई भी अभिनेता हो उसे अपने जीवन में इस तरह का किरदार जरूर निभाना चाहिए। देखा जाए तो पिछले कुछ समय से सिनेमा में काफी बदलाव आया भी है, अब ऐसी कहानियां पर बनी फिल्में आ रही हैं, जिसमे किसी स्टार को नहीं बल्कि रदार को प्रमुखता दी जा रही है। यशपाल शर्मा की फिल्म 'छिपकली' ऐसी ही एक फिल्म है, जिसकी ज्यादातर कहानी सिर्फ दो पात्रों के ही इर्द गिर्द घूमती है।
'छिपकली' नाम से पहले भी फारसी में एक फिल्म बन चुकी है, जो साल 2004 में ईरान में रिलीज हुई थी। यह फिल्म पादरी, धर्म, ईरानी समाज और सामान्य रूप से जीवन पर व्यंग्य करती है, लेकिन यशपाल शर्मा की फिल्म 'छिपकली' की कहानी उस फिल्म से काफी अलग है। यह फिल्म दुनिया के बारे में हमारी सीमित समझ और जीवन के बारे में हमारी उन गलत धारणाओं पर सवाल उठाती है, जो सीधे तौर पर हम देखते हैं। यह रूढ़िबद्ध यथार्थवाद से परे देखने की हमारी अक्षमता को उजागर करती है। फिल्म की कहानी की शुरुआत एक लेखक आलोक चतुर्वेदी से होती है, जिसे अदालत ने अपनी पत्नी और बेटे की संदिग्ध हत्याओं से जुड़े एक मामले में बरी कर दिया है। एक जासूस रुद्राक्ष रॉय उसके घर आता है और नए सिरे से केस की तहकीकात करता है, इससे पहले दर्शकों को लगता है कि आलोक चतुर्वेदी ने ही अपनी पत्नी और बेटे की हत्या की होगी तभी कहानी में एक नया टविस्ट आता है।
आम तौर पर इंसान जो गलतियां करता है, उसे लगता है कि उसकी उन गलतियों को कोई नहीं देख रहा है। लेकिन हम जो गलतियां या कर्म करते हैं, उसे कोई तीसरा जरूर देख रहा है और हमें आभास भी होने लगता है कि हमारे साथ कुछ गलत होने वाला है। इस फिल्म में छिपकली को एक प्रतीक तौर पर दिखाया गया है। फिल्म की कहानी के मुताबिक घरों में रहने वाली छिपकली सबकी बातें सुनती है और आपके कर्मों के हिसाब से सावधान भी करती रहती है। फिल्म की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, इसीलिए फिल्म का नाम 'छिपकली' रखा गया है। फिल्म कहीं ना कहीं इस बात को उजागर करती है कि जब दो लोग पूरी तरह से एक दूसरे से अलग हैं, समाज के प्रति उनका दृष्टिकोण भी अलग है और जब एक दूसरे से टकराते हैं तो क्या होता है?
फिल्म 'छिपकली' में आलोक चतुर्वेदी का किरदार यशपाल शर्मा ने निभाया है। देखा जाए तो यह पूरी फिल्म यशपाल शर्मा के ही कंधे पर टिकी हुई है। अपने किरदार के साथ उन्होंने पूरी तरह से न्याय भी किया है। एक संघर्षरत लेखक के किरदार को उन्होंने परदे पर बड़ी ही सहजता से जीवंत किया है। रुद्राक्ष रॉय के किरदार में योगेश भारद्वाज ने काफी हद तक अपने किरदार को निभाने की अच्छी कोशिश की है। तन्निष्ठा बिस्वास कई बांग्ला फिल्मों में काम कर चुकी हैं। इस फिल्म के जरिए वह हिंदी सिनेमा में डेब्यू कर रही हैं। हालांकि फिल्म में उन्हें ज्यादा स्क्रीन स्पेस नहीं मिला है, फिर भी उनके हिस्से में जितना भी काम आया है, उसे पूरी तरह से निभाने की कोशिश की है।
कम संसाधन और सीमित बजट में फिल्म बनाना किसी भी निर्देशक के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता है। इस फिल्म के निर्देशक कौशिक कर 'छिपकली' से पहले बांग्ला फिल्म 'पॉर्नोमोची' का निर्देशन कर चुके है। 'छिपकली' की शूटिंग उन्होंने महज 10 दिनों में पूरी कर ली, इस लिहाज से देखा जाए तो उन्होंने 'छिपकली' के रूप में एक बेहतरीन कहानी कहने की कोशिश की है लेकिन उन्हें फिल्म की पटकथा पर थोड़ी सी और मेहनत करने की जरूरत थी। इस फिल्म में तीन गाने हैं, जिसके संगीतकार फिल्म के निर्माता मीमो खुद ही है। निर्माता के रूप में मीमो और स्वर्णदीप विश्वकर्मा की यह पहली हिंदी फिल्म है। पहली फिल्म के हिसाब से देखा जाए फिल्म में प्रोडक्शन वैल्यू नजर आती है। मीमो इस फिल्म से पहले संगीतकार के तौर पर 'जकेर धन', 'अलीनगरेर' जैसी बंगला फिल्मों में संगीत दे चुके हैं। इस फिल्म में शान का गाया गीत 'जिंदा हूं मैं' कर्णप्रिय है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी और संपादन ठीक ठाक है।