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Dara Singh: अखाड़े से अभिनय तक, हर मोर्चे पर रामायण के ‘हनुमान’ ने बिखेरी चमक; राजनीति में भी चमकी किस्मत
Sat, 12 Jul 2025 08:40 AM IST
हिमांशु सोनी
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: हिमांशु सोनी
Updated Sat, 12 Jul 2025 08:40 AM IST
सार
Dara Singh Death Anniversary: पहलवान से अभिनेता बने दारा सिंह ने आज ही के दिन दुनिया को अलविदा कहा था। 12 जुलाई 2012 के दिन उनका निधन हो गया था। ऐसे में उनसे जुड़ी कुछ अहम बातें आपको बताते हैं।
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दारा सिंह
- फोटो : एक्स
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विस्तार
दारा सिंह- एक ऐसा नाम, जो सिर्फ पहलवानी तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने अखाड़े में एक के बाद एक कई जीत हासिल की, सिनेमा में आए तो यहां भी छा गए, राजनीति में कदम रखा तो यहां भी अपनी चमक बिखेर दी और अपनी आत्मकथा तक उन्होंने लिख डाली। 19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर जिले के धरमूचक गांव में जन्मे दीदार सिंह रंधावा उर्फ दारा सिंह का नाम भारतीय इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। आज दारा सिंह की 13वीं पुण्यतिथी है। उन्होंने 12 जुलाई 2012 को अंतिम सांस ली थी।
दारा सिंह का बचपन
दारा सिंह का जन्म एक जाट सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुरजीत सिंह रंधावा और माता का नाम बलवंत कौर था। उनका परिवार एक सामान्य किसान परिवार था और उनके माता-पिता खेती-बाड़ी करते थे। दारा सिंह का बचपन गांव के माहौल में ही बीता, जहां उन्होंने कम उम्र से ही मेहनत करना शुरू कर दिया। शिक्षा के मामले में उन्होंने स्कूल की पढ़ाई सिर्फ 6वीं कक्षा तक ही की थी। पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते उन्हें आगे की पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वो खेतों में काम करने लगे।
दारा सिंह का पहलवानी का सफर
बचपन से ही दारा सिंह को कुश्ती का शौक था। उनके शुरुआती दिन अखाड़ों में बीते। साल 1947 में वो सिंगापुर पहुंचे और वहां मलेशियाई चैंपियन को हराकर पहली बार अंतरराष्ट्रीय धरती पर छा गए। उन्होंने 500 से ज्यादा कुश्तियां लड़ीं और एक भी मुकाबला नहीं हारे। ये अपने आप में ही बड़े कमाल का रिकॉर्ड है।
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इसके बाद वो 1954 में वो भारतीय कुश्ती चैंपियन बने और फिर कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप भी जीती। साल 1968 में उन्होंने अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को हराकर विश्व फ्रीस्टाइल कुश्ती चैंपियन का खिताब अपने नाम किया। यही वो जीत थी जिसने उन्हें दुनिया का पहला भारतीय विश्व चैंपियन बना दिया।
किंग कॉन्ग से टक्कर
साल 1956 में ऑस्ट्रेलियाई पहलवान किंग कॉन्ग के साथ दारा सिंह की ऐतिहासिक लड़ाई हुई। 130 किलो वजनी दारा सिंह 200 किलो के किंग कॉन्ग को रिंग से बाहर फेंककर रातोंरात सुर्खियों में आ गए और वहीं से शुरू हुआ दारा सिंह के सुपरस्टार बनने का सफर। इस जीत ने उन्हें 'रुस्तम-ए-हिंद' और 'रुस्तम-ए-पंजाब' जैसे खिताब दिलाए।
दारा सिंह का फिल्मी सफर
साल 1952 में फिल्म ‘संगदिल’ से उन्होंने बॉलीवुड में एंट्री की। शुरुआत धीमी रही, लेकिन 1962 में आई ‘किंग कॉन्ग’ फिल्म ने उन्हें स्टार बना दिया। इसके बाद उन्होंने ‘फौलाद’, ‘शेर दिल’, ‘रुस्तम-ए-हिंद’, ‘बजरंगबली’, ‘मर्द’, ‘धर्मात्मा’, ‘राम भरोसे’, और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी हिट फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने करीब 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और 16 फिल्में मुमताज के साथ कीं, जिनमें से 10 सुपरहिट रहीं। इन दोनों के अफेयर की भी खूब चर्चा रही, लेकिन समय के साथ ये रिश्ता फीका पड़ गया।
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दारा सिंह का बचपन
दारा सिंह का जन्म एक जाट सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुरजीत सिंह रंधावा और माता का नाम बलवंत कौर था। उनका परिवार एक सामान्य किसान परिवार था और उनके माता-पिता खेती-बाड़ी करते थे। दारा सिंह का बचपन गांव के माहौल में ही बीता, जहां उन्होंने कम उम्र से ही मेहनत करना शुरू कर दिया। शिक्षा के मामले में उन्होंने स्कूल की पढ़ाई सिर्फ 6वीं कक्षा तक ही की थी। पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते उन्हें आगे की पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वो खेतों में काम करने लगे।
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दारा सिंह का पहलवानी का सफर
बचपन से ही दारा सिंह को कुश्ती का शौक था। उनके शुरुआती दिन अखाड़ों में बीते। साल 1947 में वो सिंगापुर पहुंचे और वहां मलेशियाई चैंपियन को हराकर पहली बार अंतरराष्ट्रीय धरती पर छा गए। उन्होंने 500 से ज्यादा कुश्तियां लड़ीं और एक भी मुकाबला नहीं हारे। ये अपने आप में ही बड़े कमाल का रिकॉर्ड है।
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इसके बाद वो 1954 में वो भारतीय कुश्ती चैंपियन बने और फिर कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप भी जीती। साल 1968 में उन्होंने अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को हराकर विश्व फ्रीस्टाइल कुश्ती चैंपियन का खिताब अपने नाम किया। यही वो जीत थी जिसने उन्हें दुनिया का पहला भारतीय विश्व चैंपियन बना दिया।
किंग कॉन्ग से टक्कर
साल 1956 में ऑस्ट्रेलियाई पहलवान किंग कॉन्ग के साथ दारा सिंह की ऐतिहासिक लड़ाई हुई। 130 किलो वजनी दारा सिंह 200 किलो के किंग कॉन्ग को रिंग से बाहर फेंककर रातोंरात सुर्खियों में आ गए और वहीं से शुरू हुआ दारा सिंह के सुपरस्टार बनने का सफर। इस जीत ने उन्हें 'रुस्तम-ए-हिंद' और 'रुस्तम-ए-पंजाब' जैसे खिताब दिलाए।
दारा सिंह का फिल्मी सफर
साल 1952 में फिल्म ‘संगदिल’ से उन्होंने बॉलीवुड में एंट्री की। शुरुआत धीमी रही, लेकिन 1962 में आई ‘किंग कॉन्ग’ फिल्म ने उन्हें स्टार बना दिया। इसके बाद उन्होंने ‘फौलाद’, ‘शेर दिल’, ‘रुस्तम-ए-हिंद’, ‘बजरंगबली’, ‘मर्द’, ‘धर्मात्मा’, ‘राम भरोसे’, और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी हिट फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने करीब 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और 16 फिल्में मुमताज के साथ कीं, जिनमें से 10 सुपरहिट रहीं। इन दोनों के अफेयर की भी खूब चर्चा रही, लेकिन समय के साथ ये रिश्ता फीका पड़ गया।
दारा सिंह
- फोटो : एक्स
'हनुमान' बन घर-घर में पूजे गए
दारा सिंह को रामानंद सागर के पौराणिक धारावाहिक ‘रामायण’ में हनुमान जी का किरदार निभाकर ऐसी लोकप्रियता मिली कि उन्हें लोग पूजने लगे। इस किरदार के लिए उन्होंने मांसाहार तक छोड़ दिया था। ये रोल भारतीय टेलीविजन इतिहास में अमर हो गया और हनुमान के रोल में हमेशा दारा सिंह को ही देखा जाने लगा।
पर्दे के पीछे भी दिखाया हुनर
बहुत कम लोग जानते हैं कि एक्टर होने के साथ-साथ दारा सिंह एक सफल निर्देशक और लेखक भी रहे। उन्होंने पंजाबी और हिंदी में कई फिल्मों का निर्देशन किया, जिनमें ‘नानक दुखिया सब संसार’, ‘मेरा देश मेरा धर्म’, ‘रुस्तम’, ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं’ जैसी फिल्में शामिल हैं। साल 1989 में उन्होंने ‘मेरी आत्मकथा’ नामक आत्मकथा लिखी, जो 1993 में हिंदी में प्रकाशित हुई।
राजनीति में भी रखा कदम
साल 1998 में दारा सिंह ने बीजेपी जॉइन की और 2003 से 2009 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। वो पहले खिलाड़ी थे, जिन्हें राज्यसभा के लिए नामांकित किया गया था। इसके अलावा वे जाट महासभा के अध्यक्ष भी रहे हैं।
दारा सिंह को रामानंद सागर के पौराणिक धारावाहिक ‘रामायण’ में हनुमान जी का किरदार निभाकर ऐसी लोकप्रियता मिली कि उन्हें लोग पूजने लगे। इस किरदार के लिए उन्होंने मांसाहार तक छोड़ दिया था। ये रोल भारतीय टेलीविजन इतिहास में अमर हो गया और हनुमान के रोल में हमेशा दारा सिंह को ही देखा जाने लगा।
पर्दे के पीछे भी दिखाया हुनर
बहुत कम लोग जानते हैं कि एक्टर होने के साथ-साथ दारा सिंह एक सफल निर्देशक और लेखक भी रहे। उन्होंने पंजाबी और हिंदी में कई फिल्मों का निर्देशन किया, जिनमें ‘नानक दुखिया सब संसार’, ‘मेरा देश मेरा धर्म’, ‘रुस्तम’, ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं’ जैसी फिल्में शामिल हैं। साल 1989 में उन्होंने ‘मेरी आत्मकथा’ नामक आत्मकथा लिखी, जो 1993 में हिंदी में प्रकाशित हुई।
राजनीति में भी रखा कदम
साल 1998 में दारा सिंह ने बीजेपी जॉइन की और 2003 से 2009 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। वो पहले खिलाड़ी थे, जिन्हें राज्यसभा के लिए नामांकित किया गया था। इसके अलावा वे जाट महासभा के अध्यक्ष भी रहे हैं।
दारा सिंह की शादी
दारा सिंह की पहली शादी महज 14 साल की उम्र में बचनो कौर से हुई थीं। वो 17 साल की उम्र में ही पिता बन गए थे। बचनो के साथ दारा सिंह के एक बेटे प्रद्युमन सिंह रंधावा ने जन्म लिया। उनके कुल 6 बच्चे थे- इनमें तीन बेटे और तीन बेटियां शामिल हैं।
दारा सिंह की दूसरी शादी साल 1961 में सुरजीत कौर से हुई थी। ये एक पारंपरिक अरेंज मैरिज थी। इसी शादी से उनके बेटे विंदू दारा सिंह भी हुए, जो कि एक मशहूर अभिनेता हैं और उन्होंने भी रेसलिंग और अभिनय की दुनिया में कदम रखा।
ये खबर भी पढ़ें: Pran: फिल्मों में प्राण ने निभाया ऐसा रोल कि असल में डरने लगे लोग, जानें बतौर विलेन उनके 10 किरदार
दारा सिंह की पहली शादी महज 14 साल की उम्र में बचनो कौर से हुई थीं। वो 17 साल की उम्र में ही पिता बन गए थे। बचनो के साथ दारा सिंह के एक बेटे प्रद्युमन सिंह रंधावा ने जन्म लिया। उनके कुल 6 बच्चे थे- इनमें तीन बेटे और तीन बेटियां शामिल हैं।
दारा सिंह की दूसरी शादी साल 1961 में सुरजीत कौर से हुई थी। ये एक पारंपरिक अरेंज मैरिज थी। इसी शादी से उनके बेटे विंदू दारा सिंह भी हुए, जो कि एक मशहूर अभिनेता हैं और उन्होंने भी रेसलिंग और अभिनय की दुनिया में कदम रखा।
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दारा सिंह
- फोटो : एक्स
जिंदगी की आखिरी लड़ाई
7 जुलाई 2012 को दारा सिंह को दिल का दौरा पड़ा। उन्हें कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल, मुंबई में भर्ती कराया गया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। परिवार उन्हें घर ले आया और 12 जुलाई 2012 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
एक अमिट छवि जो दिलों में आज भी जिंदा है
दारा सिंह एक ऐसे विरले व्यक्तित्व थे जिन्होंने खेल, सिनेमा, साहित्य और राजनीति- चारों क्षेत्रों में सफलता पाई। उनकी जीवनगाथा आज भी प्रेरणा देती है कि सच्ची मेहनत और लगन से कोई भी इंसान हर मुकाम हासिल कर सकता है।
7 जुलाई 2012 को दारा सिंह को दिल का दौरा पड़ा। उन्हें कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल, मुंबई में भर्ती कराया गया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। परिवार उन्हें घर ले आया और 12 जुलाई 2012 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
एक अमिट छवि जो दिलों में आज भी जिंदा है
दारा सिंह एक ऐसे विरले व्यक्तित्व थे जिन्होंने खेल, सिनेमा, साहित्य और राजनीति- चारों क्षेत्रों में सफलता पाई। उनकी जीवनगाथा आज भी प्रेरणा देती है कि सच्ची मेहनत और लगन से कोई भी इंसान हर मुकाम हासिल कर सकता है।