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'युवाओं की नब्ज पर हाथ रख लिखी रोमांस की इबारत'

Mon, 22 Oct 2012 01:37 AM IST
नई दिल्ली/अवनीश पाठक
नई दिल्ली/अवनीश पाठक Updated Mon, 22 Oct 2012 01:37 AM IST
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yash wrote meaning of romance puting hand on the pulse of youth

यश चोपड़ा को बॉलीवुड का किंग ऑफ रोमांस यूं ही नहीं कहा जाता। उन्होंने युवाओं की नब्ज पर हाथ रखकर अपनी फिल्मों में रोमांस की इबारत लिखी। समाज में प्रेम ने जैसे-जैसे रूप बदले यश चोपड़ा ने अपनी फिल्मों में उन्हें रंग दिया। उन्होंने हिंदी सिनेमा को दाग, कभी-कभी, सिलसिला, चांदनी, लम्हें, दिल तो पागल है और वीर-जारा जैसी यादगार फिल्में दी।

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1959 में राजेंद्र कुमार और माला सिन्हा अभिनीत 'धूल का फूल' उनके निर्देशन करियर की पहली फिल्म थी। साहिर के गीत 'न तू हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा' ने इस फिल्म को ऐसी पहचान दी, जिसकी यादें फिल्म प्रेमियों के दिलों में आज भी ताजा है। यश दरअसल युवाओं की नब्ज पहचानते थे। उन्होंने अपनी फिल्मों में प्रेम दृश्यों को इतनी गहराई और स्वाभाविकता के साथ उतारा कि कई बार तो वह दर्शकों को अपनी कहानी लगे। दिलचस्प यह रहा कि हर दौर के दर्शकों ने यश द्वारा गढ़ी गई प्रेम की परिभाषा को स्वीकार किया। कभी-कभी का शायर भी दर्शकों को अपने बीच का ही लगा और दिल तो पागल है का डांसर भी।
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यश चोपड़ा को उनकी फिल्मों के लिए कई बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2005 में उन्हें पद्म भूषण से भी नवाजा गया। उन्हें विदेशों में भी कई पुरस्कार मिले। फिल्म इंडस्ट्री में यश के एक अच्छे इंसान होने के किस्से भी मशहूर हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि सिलसिला फिल्म के लिए उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ स्मिता पाटिल और परवीन बाबी को साइन किया था। स्मिता पाटिल को जया बच्चन की भूमिका निभानी थी और परवीन बाबी को रेखा की।
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जब वह अमिताभ के पास गए और उन्हें स्मिता पाटिल और परवीन बाबी के बारे में बताया, तो उन्होंने असहजता जाहिर की। यश चोपड़ा ने अमिताभ के कहने पर जया बच्चन और रेखा को फिल्म में ले लिया। उन्होंने स्मिता पाटिल को फिल्म से हटा दिया था। लेकिन उनके अंदर इसकी कसक बनी रही। इसलिए उन्होंने स्मिता पाटिल को यह संदेश खुद नहीं दिया बल्कि उनके अच्छे दोस्त शशि कपूर को यह जिम्मा सौंपा।

यश चोपड़ा ने संवेदताशीलता और मानवीय स्वभाव को अपने फिल्में सहज तरीके से इस्तेमाल किया। उनकी फिल्मों में सभी पात्र संवेदनाओं से लबरेज रहे, लेकिन कभी भी उनमें बनावटीपन नजर नहीं आया। मानवीय स्वभाव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति यश की खासियत थी। उनका मानना था कि इंसान सही और गलत, एक साथ दोनों हो सकता है। इसलिए ही उन्होंने 'लार्जर दैन लाईफ' कैरेक्टर नहीं गढ़े।

यश चोपडा अपनी दरियादिली के लिए भी उतने ही प्रसिद्ध रहे। वह किसी की भी भूल को तुरंत माफ कर देते थे। उन्होंने 1970 में पामेला चोपड़ा से शादी की और पम्मी से उनका प्यार जगजाहिर था। अपने एक साक्षात्कार में भी उन्होंने यही कहा था कि बहुत दिन काम कर लिया। अब पत्नी शिकायत करती है इसलिए फिल्में नहीं बनाऊंगा।  सिलसिला फिल्म में रेखा और जया बच्चन ने पामेला चोपड़ा के ही गहने पहने थे।


यश चोपड़ा ने अपने करियर में कई फिल्में बनायीं। भले ही उनकी फिल्में अलग-अलग विषय पर बनी थीं, लेकिन उन सब फिल्मों में एक ही बात समान थी। और वह बात थी प्रेम और रोमांस। उनका रोमांस किसी सीमा में बंधा हुआ नहीं था। उनकी फिल्मों में प्रेम आसमान पर उड़ते परिंदे की तरह था जिसे बस आजादी ही दिखाई देती है।

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