सिनेमा में साइंस फिक्शन: हॉलीवुड में झक्कास, बॉलीवुड ने किया निराश
भारतीय सिनेमा आज के वक्त में पूरे विश्व में अपनी जगह बना रहा है। बात चाहें रोमांस की हो या फिर एक्शन की, भारतीय सिनेमा अपनी छाप छोड़ता नजर आ रहा है। बायोपिक का बढ़ता चलन भी सिनेमा के लिए एक अच्छा संकेत है। लेकिन इन सब के बाद भी पिछले 100 सालों से अधिक पुराने इतिहास में एक बात हमें मात देती है। दरअसल इतने लंबे वक्त के बाद भी आज भारतीय सिनेमा साइंस फिक्शन में अपनी पकड़ नहीं जमा पा रहा है। कई फिल्में आईं और गईं लेकिन एक भी ऐसी फिल्म नहीं आई जो दर्शकों को 'वाह' कहने पर मजूबर कर दे। हालांकि इस कैटेगरी में कई ऐसी फिल्में आईं जिस पर दर्शकों ने सीट पर खड़े होकर सीटी भी बजाई। लेकिन एक भी नाम ऐसा नहीं जो जेहन में घर कर जाए।
साइंस फिक्शन में पीछे बॉलीवुड ?
क्या यह सवाल बाजिब है, अगर आपका जवाब नहीं है तो आपको कम से कम दस बेहतरीन साइंस फिक्शन के नाम पता होने चाहिए। जो हॉलीवुड, कोरियन, चीन सहित अन्य देशों के सिनेमा के सामने मजबूती से खड़ा हो सके। उम्मीद है कि अब सवाल आपको भी जायज लगने लगेगा। दरअसल साइंस फिक्शन एक ऐसी कैटेगरी है जिसमें स्टोरी, एक्टिंग, डायरेक्शन जैसी तमाम चीजों के साथ जो सबसे जरूरी चीज होती है वो है- जानदार, दमदार और शानदार ग्राफिक्स। आसान शब्दों में कहा जाए तो साइंस फिक्शन फिल्मों के लिए ग्राफिक्स, रीढ़ की हड्डी की तरह है। जिसके बिना व्यक्ति मरता नहीं है लेकिन जिंदा भी नहीं कहा जाता। जब भारतीय सिनेमा बाकी सभी कैटेगरी में झंडा लहरा रहा है तो आखिर ऐसी क्या वजह है कि साइंस फिक्शन में भारतीय सिनेमा अपनी पकड़ नहीं बना पा रहा है।
- बड़ा बजट: साइंस फिक्शन में पीछे होने का एक कारण बड़ा बजट हो सकता है। हालांकि यह कहना बहुत पुख्ता नहीं होगा लेकिन यह भी एक बड़ी वजह मानी जा सकती है। दरअसल उम्दा ग्राफिक्स के लिए बड़े बजट की जरूरत होती है। ऐसे में यह एक बड़ी समस्या बन जाती है। जिसके दो नतीजे सामने आते हैं, या तो कम पैसे में सस्ते ग्राफिक्स का इस्तेमाल या फिर प्रोजेक्ट ड्रॉप।
- हाई क्वालिटी इफेक्ट्स: कई बार बड़ा पैसा खर्च करने के बाद भी वो हाई इफेक्ट क्वालिटी सामने नहीं आती है जिसकी चाह होती है। ऐसे में न सिर्फ प्रोड्यूसर का पैसा खत्म होता है जबकि साथ ही बॉक्स ऑफिस पर फिल्म वैसा कमाल भी नहीं कर पाती है। जिससे प्रोड्यूसर अगली बार एक्सपेरिमेंट में भी डरता है।
- रिस्क एलिमेंट: बड़े बजट और हाई क्वालिटी इफेक्ट्स मिल भी जाएं तो भी एक रिस्क एलिमेंट बना रहता है। चूंकि हाई ग्राफिक्स इस बात की गारंटी नहीं होते कि फिल्म लागत से ज्यादा कमा कर फायदे का सौदा बनेगी। ऐसे में तकरीबन हर कोई रिस्क लेने से डरता है। वहीं इस रिस्क को बढ़ाने का काम किया है छोटे बजट की फिल्मों की सफलता और बड़े बजट की फ्लॉप होती फिल्मों ने। दरअसल पिछले कुछ सालों में गौर किया जाए तो छोटी बजट की फिल्मों ने अच्छा कलेक्शन किया है। वहीं बड़े बजट और बड़े स्टार्स की भी फिल्में औंधे मुंह जमीन पर गिरी हैं।
भारतीय सिनेमा की बेस्ट साइंस फिक्शन फिल्में
दरअसल यह कहना भी गलत होगा कि भारतीय सिनेमा ने साइंस फिक्शन में कोशिश नहीं की। इस कैटेगरी में कई फिल्मों ने अच्छा प्रदर्शन किया और नाम कमाया। 2.0, रा-वन, रोबोट, कार्बन और कृष जैसी कुछ फिल्मों ने साइंस फिक्शन में भारतीय सिनेमा के लिए उम्मीद जताई है। रजनीकांत, ऋतिक रोशन और शाहरुख खान जैसे सेलेब्स ने न सिर्फ साइंस फिक्शन के लिए कोशिश की बल्कि कामयाबी भी हासिल की।
नाकामयाब हुईं कोशिश
दरअसल भारतीय सिनेमा की कुछ कामयाब साइंस फिक्शन नामों के पीछे कुछ नाकामयाब कोशिशें भी हैं। साइंस फिक्शन की नाकामयाब कोशिश में लव स्टोरी 2050, मिस्टर एक्स, आ देखें जरा,श्री और 24 जैसी कुछ फिल्में भी शामिल हैं। किसी न किसी वजह से जनता को यह फिल्में पसंद नहीं आईं और बड़े पर्दे पर धड़ाम हो गईं।
बॉलीवुड में हॉलीवुड का श्रेय
इंटरस्टेलर, द मार्शियन, ब्लेड रनर, अराइवल, एक्स मशीना, एज ऑफ टुमॉरो, ग्रेविटी, अवतार, इंसेप्शन, द मेट्रिक्स, टर्मिनेटर, द डे अर्थ स्टुड स्टिल, रोबो कॉप सहित मार्वेल सीरीज की कई फिल्में साइंस फिक्शन का बेहतरीन उदाहरण हैं। इन फिल्मों में न सिर्फ दमदार स्क्रिप्ट और एक्टिंग का जलवा दिखा बल्कि इसके साथ ही जोरदार ग्राफिक्स ने 'सोने पर सुहागा' का काम किया। इसके साथ ही ऐसा कहना भी गलत होगा कि हॉलीवुड ने कुछ वक्त पहले ही साइंस फिक्शन पर अच्छा काम किया है चूंकि पहले बताए गए नामों में से तो कुछ फिल्में 1950 के वक्त की हैं और जो आज भी बॉलीवुड की साइंस फिक्शन फिल्मों को टक्कर देती हैं। ऐसे में बड़ा सवाल जो उठता है वो ये कि आखिर क्यों हॉलीवुड साइंस फिक्शन में हम से आगे है ? जवाब शायद वहीं हैं कि बड़ा बजट और रिस्क एलिमेंट सभी के बस की बात नहीं। वहीं जिन भारतीय सिनेमा की साइंस फिक्शन फिल्मों ने अच्छा नाम कमाया उनमें भी विदेशी आर्टिस्ट्स ने काम किया और ग्राफिक्स सहित अन्य टेक्निकल चीजें संभाली। बात चाहें 2.0 की हो या फिर कृष की, तकरीबन हर बेहतरीन बॉलीवुड साइंस फिक्शन में विदेशी आर्टिस्ट्स की मेहनत है।
साइंस की राह पर बॉलीवुड
बॉलीवुड भी अब साइंस की राह पर तेजी से भाग रहा है। हॉलीवुड में 1902 में एक साइंस पर आधारित फिल्म बनी थी, नाम था- 'ए ट्रिप 2 द मून'। उसके अलावा नोबल पुरस्कार से सम्मानित गणितज्ञ जॉन नैश के जीवन पर ‘ए ब्यूटीफुल माइंड’ फिल्म बन चुकी है। जिसने ऑस्कर जीता था। इसके बाद स्टीफन हॉकिंस के जीवन पर 1991 में एरोल मॉरिस के निर्देशन में ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ और 2014 में ‘द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’ बनी। 2016 में गणितज्ञ कैथरिन जॉनसन के जीवन पर ‘हिडन फिगर्स’ बनी। हॉलीवुड के बाद अब बॉलीवुड भी साइंस की राह पर चल रहा है और साइंटिस्ट्स पर फिल्म बना रहा है। बता दें कि स्पेस साइंटिस्ट नंबी नारायण पर फिल्म बनाई जा रही है जिसमें आर माधवन लीड रोल में नजर आएंगे। वहीं भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा की बायोपिक को लेकर भी सुर्खियां जारी हैं।