रिदम कला महोत्सव: डॉ ज्योतिष जोशी, ओम कटारे और किशोर कुमार ने कला पर रखे अपने विचार, कहा- शैक्षिक पाठ्यक्रमों में मिले कलाओं को जगह
माया कुलश्रेष्ठ ने बताया कि रिदम महोत्सव कला और कल्चर का समारोह है। इसके तहत 45 दिन यह महोत्सव ऑनलाइन आयोजित किया जा रहा है। जिसके बाद इस महोत्सव को ऑफलाइन भी आयोजित किया जाएगा।
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अंजना वेलफेयर सोसायटी के सहयोग से रिदम कला महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव के दौरान संगीत एवं नृत्य की कार्यशाला आयोजित की जा रही है। 26 जनवरी से शुरू हुआ यह कला महोत्सव 45 दिन तक आयोजित किया जाएगा। यह कला महोत्सव बीते 8 सालों से आयोजित किया जा रहा है और आगे भी ऐसे ही आयोजित किया जाएगा। इस महोत्सव का मकसद युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ना है। इस महोत्सव के तहत हर सप्ताहांत में कला के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इस महोत्सव के तहत आयोजित होने वाली कार्यशाला का हिस्सा बनते हैं।
महोत्सव के तहत इस सप्ताह आयोजित हुई कार्यशाला में आईएफसीएआई यूनिवर्सिटी देहरादून के कुलपति डॉ राम करण सिंह, 30 से ज्यादा किताबें लिखने वाले और ललित कला अकैडमी के संपादक के रूप में काम करने वाले डाक्टर ज्योतिष जोशी, अभिनेता और निर्देशक ओम कटारे और डिपार्टमेंट ऑफ हिस्ट्री के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ किशोर कुमार बतौर अतिथि नजर आए। इस दौरान माया कुलश्रेष्ठ ने बताया कि रिदम महोत्सव कला और कल्चर का समारोह है। इसके तहत 45 दिन यह महोत्सव ऑनलाइन आयोजित किया जा रहा है। जिसके बाद इस महोत्सव को ऑफलाइन भी आयोजित किया जाएगा।
इस दौरान अपने विचार रखते हुए ओम कटारे ने कहा कि मुंबई शहर में थिएटर एक संस्कार के रूप में है। यहां सालों से मराठी थिएटर हो रहा है, जिसे लोग बहुत सम्मान से देखते हैं। यही वजह है कि यहां थिएटर को दूसरे प्रांतों की तुलना में अधिक महत्व दिया जाता है। दूसरे प्रांतों में लोग थिएटर तो जरूर कर रहे हैं, लेकिन वह उनके जीवन का हिस्सा नहीं बन पा रहा है। ऐसे में शिक्षा के माध्यम से थिएटर को पढ़ाया जाए और इसे समझाया जाए, जिससे यह उनके जीवन का हिस्सा बन जाए। साथ ही सरकार को कला को शिक्षा से जोड़कर इसे आगे बढ़ाना चाहिए, ताकि लोग इसे करियर के तौर पर चुन सके।
वहीं, डॉक्टर ज्योतिष जोशी ने कहा कि जब तक भारतीय जनता और खास तौर पर हिंदी जनता कलाओं को अपनी संस्कृति का हिस्सा नहीं बनाती और अपने संस्कार में उसे शामिल नहीं करती। तब तक कला का व्यापक तौर पर विकास संभव नहीं है। मौजूदा समय में सारी कलाओं का हाल यह है कि सब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। आज यह स्थिति है कि रंगमंच ने भी कोई राष्ट्रीय स्वरूप नहीं बनाया। हालांकि यह बात भी सत्य है कि संगीत और नृत्य ने कई परेशानियों के बावजूद भी अपने शुद्धता को बनाए रखा है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस बात में कोई दो राय नहीं कि हमें शैक्षिक पाठ्यक्रमों में कलाओं को जगह देनी चाहिए। शैक्षिक पाठ्यक्रम में इन कलाओं को जोड़ने से समाज में जो अराजकता और अनुशासनहीनता है, उसे रोकने में मदद मिलेगी। क्योंकि संगीत और नृत्य जैसी कलाएं मधुरता देती है और व्यक्ति को अनुशासन में बांधती है। उन्होंने कहा कि बिना लय के बिना ही कोई समाज होता है और ना ही कोई संसार चलता है।
वहीं, कार्यशाला में बतौर मेहमान नजर आए डॉक्टर किशोर कुमार ने कहा कि अगर कोई कलाकार खुद को एक स्ट्रक्चर में बांधकर रखेगा तो उसकी नैसर्गिक प्रतिभा को चुनौती मिलती है। अगर हम किसी कलाकार को औपचारिकता में बहुत ज्यादा बांध देंगे तो बहुत दिक्कत होगी। कलाकार और समाज से जुड़ी समस्याओं के बारे में सुझाव देते हुए डॉक्टर किशोर ने कहा कि इसके लिए लोगों को जागरुक करने की जरूरत है।
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