सिनेमा अब सर्कस नहीं रहा:इरफान खान
शानदार ऐक्टर इरफान अपनी फिल्म मदारी के साथ आज बॉक्स ऑफिस पर आ रहे हैं। कुछ जरूरी सवाल उठाने वाली इस फिल्म की निर्माण प्रक्रिया में भी वह जुड़े रहे। फिल्म राजनीतिक और सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करने के प्रयास करती है। इरफान से बातचीत की रवि बुले ने।
आजकल आपके केश कुछ लंबे हैं और छोटी-सी पोनी टेल भी है। कोई खास वजह... किसी फिल्म के लिए?
हम सब यहां बहुरूपिया बनने आए थे फिल्म इंडस्ट्री में और अब मौका मिला है कुछ करने का तो कर रहे हैं। यहां रूप बदलते रहना चाहिए आपका। यह लोगों को पसंद आता है। आप भी अपने लुक से बोर हो जाते हैं। कभी किरदार की जरूरत भी होती है।
देश सो रहा है... मदारी टाइटल के साथ यह टैग लगा है!
यह सिर्फ एक कमेंट नहीं है। फिल्म देखेंगे तो साफ होगा। लेकिन इससे कुछ अंदाजा तो लगा सकते हैं देश के बारे में। हम उम्मीद करके चलते हैं कि किसी को राजा मान लिया तो वह खुद-ब-खुद हमारे हालात सुधार देगा। ऐसा होता नहीं। आम इंसान को सजग और सतर्क रहना जरूरी है कि सिस्टम लोगों के लिए है। लोग सिस्टम के लिए नहीं हैं। सिर्फ अधिकार मांगने से भी कुछ नहीं होगा क्योंकि ड्यूटी भी तय हैं। तभी समाज सही दिशा में बढ़ सकता है।
सिस्टम ने फिल्मकारों का साथ नहीं दिया
क्या सिनेमा वाकई यह सब समझा सकता है लोगों को?
इसकी एक सीमा है। तब्दीलियों में सिनेमा का योगदान होता है।
क्या कलाकार की अपनी कोई विचारधारा होनी चाहिए?
हमारे नाट्यशास्त्र के हिसाब से तो होनी चाहिए। मगर आज यह कलाकार की पर्सनल चॉइस है। इस जमाने में तो यही है कि नाचिए-गाइए। परंतु किसी को जरूरी लगता है तो उसकी अपनी आइडियोलॉजी होती है। यह कलाकार की चॉइस है कि वह आइडियोलॉजी को अपने सिनेमा में लाए या न लाए।
क्या ऐसा इसलिए है कि आप जो काम कर रहे है, उसमें सत्ता या शासन की तरफ से कोई मुश्किलें न आएं?
बिल्कुल ऐसा है। मगर हॉलीवुड में या अन्य देशों में यह नहीं है। आदमी खुल कर अपनी बात कह सकता है। लेकिन हमारे यहां जब भी सिनेमाघर पर अटैक हुए हैं उसे सिस्टम ने रोका नहीं। छुट्टा छोड़ दिया है। समाज का जो शरारती तबका है, उसका डंडा सरकार ने छीना नहीं। कोई आदमी अपने मुख्य काम से समझौता नहीं करता। इसी से आप तय करते हैं कि कौन आपको बढ़ावा दे रहा है आजाद होने का और कौन संकीर्ण कर रहा है।
सिनेमा से उम्मीदें बढ़ गई हैं
सरकारें आई गईं मगर यह शिकायत हमेशा रही कि वह सिनेमा के साथ नहीं खड़ी होतीं!
उन्हें सिनेमा से इतना टैक्स जाता है कि उनका उत्तरदायित्व बनता है, उसकी रक्षा करें।
सिनेमा क्या अब भी ढाई-तीन घंटे का मनोरंजन है? लोग देखते हैं और लौट आते हैं कि ऐसा सिर्फ पर्दे पर होता है?
हर सिनेमा ऐसा नहीं होता। किसी खास तरह का सिनेमा जरूर टाइमपास की गारंटी देता है। सिनेमा भावनाएं जगाता है। आप जानते हैं कि सत्ता का विरोध, प्रेम या बदला जो कुछ देखा वह सच नहीं है परंतु उस दौरान जो भावनाएं जागती हैं वह अच्छी लगती हैं। कुछ सिनेमा ऐसा भी होता है जो आपके भीतर सवाल छोड़ जाता है। सोचने पर मजबूर करता है। जो याद रहता है। सिनेमा अब एक जैसा नहीं रह गया और यह उसके विकास की निशानी है। आने वाले समय में सिनेमा में नए-नए आयाम आएंगे। नए देखने वाले आ गए हैं। सिनेमा से उम्मीदें बढ़ गई हैं। वह सिर्फ सर्कस नहीं रह गया है।
मदारी में आपकी पत्नी प्रोड्यूसर हैं। क्या भविष्य में भी आप उनकी फिल्मों में जुड़ेंगे?
वह प्रोड्यूसर के रूप में बढ़ रही हैं और यह उनका स्वतंत्र चुनाव है। उनकी अगली फिल्म की शुरुआत भी हो चुकी है मगर उसमें मैं नहीं रहूंगा। मैं चाहता हूं कि उनकी अलग पहचान हों। वह आजाद विचार की महिला हैं। उनका सरनाम भी अपना है। वह पिता का सरनेम इस्तेमाल करती हैं तो मुझे गर्व होता है।
मैं हॉलीवुड के लोगों की तरह काम करता हूं
विश्व में बॉलीवुड सिनेमा की लोकप्रियता बढ़ने के बावजूद हमारे अन्य ऐक्टरों के सामने वैसे प्रस्ताव नहीं आए, जैसे आपको मिले। क्या वजह मानते हैं?
मुझे लगता है कि आने वाले समय में उधर और भी हमारे लोगों की जरूरत पड़ेगी। मुझे मालूम है कि अभिषेक बच्चन को नेमसेक (2006, मीरा नायर) ऑफर हुई थी। और भी ऐक्टरों को अन्य फिल्में ऑफर की गईं। परंतु कई बार चीजें वर्कआउट नहीं हो पातीं।
क्या इसलिए कि हमारे स्टार वहां भी सिर्फ स्टार बनना चाहते हैं? जबकि सिनेमा पर उनका नजरिया और काम करने का ढंग अलग है!
दूसरों की चीजे क्यों वर्कआउट नहीं हुई इसकी मुख्य वजह तो मुझे मालूम नहीं, मगर इतना जरूर है कि उनका काम करने का ढंग बिल्कुल जुदा है। मेरे काम करने का तरीका भी उन लोगों के तरीके से भिन्न नहीं है, इसलिए मुझे लगता है कि वहां मुझे काम मिल जाता है। उनके तरीके में कहानी अहम होती है, स्टार नहीं। वहां स्टार आएगा भी तो सरप्राइज की तरह क्योंकि वह ऐसा काम करेगा जो उसने पहले नहीं किया। वहां स्टार कहानी के प्रति समर्पित होता है। वह अगली फिल्म में वही नहीं करेगा, जो पिछली फिल्म में कर चुका है।