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Good Bad Girl Review: सोनी लिव की एमएक्स प्लेयर बनने की सस्ती कोशिश, झूठ का मायाजाल फैलाती विकास बहल की सीरीज

Sat, 15 Oct 2022 03:17 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sat, 15 Oct 2022 03:17 PM IST
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Good Bad Girl Review in Hindi by Pankaj Shukla Sony Liv Vikas Behl Abhishek Sengupta Samridhi Dewan Gul Panag
गुड बैड गर्ल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Movie Review
गुड बैड गर्ल
कलाकार
समृद्धि दीवान , गुल पनाग , वैभव राज गुप्ता , जैन खान , सोहम मजूमदार , राजेन्द्र सेठी , राजेश शर्मा और शीबा चड्ढा आदि
लेखक
ताहिरा नाथ और निखिल अरोड़ा
निर्देशक
अभिषेक सेनगुप्ता
निर्माता
विकास बहल और अनुराग श्रीवास्तव
ओटीटी
सोनी लिव
रेटिंग
1/5

ये संयोग ही हो सकता है कि जिस दिन देश की सर्वोच्च अदालत ने भारत सरकार से पद्मश्री पुरस्कार पा चुकीं और मुंबई में खुद को ‘कॉन्टेंट क्वीन’ का तमगा देकर इतराने वाली एकता कपूर को उनकी ट्रिपल एक्स सीरीज के लिए आईना दिखाया, उसी दिन मैंने सोनी लिव की वेब सीरीज ‘गुड बैड गर्ल’ देखनी शुरू की। फिल्म ‘सुपर 30’ बनाकर जो कुछ विकास बहल ने बतौर फिल्मकार कमाया था, उसे वह ऐसी सीरीज बनाकर गंवा रहे हैं। इस सीरीज को देखने के बाद अगर दिमाग में पहला सवाल ये आए कि ‘अपराधी कौन?’ तो इस सवाल का एक ही जवाब है विकास बहल। अपने ओटीटी ग्राहकों से साल भर की अग्रिम धनराशि वसूल कर लेने वाले ओटीटी संचालकों पर ऐसी सीरीज बनाने के लिए उपभोक्ता अदालत में मामला भी चलना चाहिए। ‘सिर्फ वयस्कों के लिए’ का ठप्पा लगाकर भी इतनी घटिया सीरीज ग्राहकों को बेचने का किसी ओटीटी को अधिकार नहीं होना चाहिए।

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Good Bad Girl Review in Hindi by Pankaj Shukla Sony Liv Vikas Behl Abhishek Sengupta Samridhi Dewan Gul Panag
गुड बैड गर्ल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

झूठ का महिमामंडन
सोनी लिव की छवि एक संतुलित ओटीटी की ही रही है। लेकिन, इधर हाल के दिनों में इसे भी एमएक्स प्लेयर बनने की हूक उठी है। अखबारों के मास्टहेड बदलकर उनके कलेवर से छेड़छाड़ करने की कोशिशें इसके क्रिएटिव टीम की सोच का परिचय पहले ही दे चुकी हैं। अब बारी है एक ऐसी कहानी अपने ग्राहकों को परोसने की जिसका मूल विचार कम से कम दो विदेशी कहानियों से चुराया हुआ है। ये विचार है झूठ के सहारे जीती एक लड़की को महिमामंडित करने का। वेब सीरीज ‘गुड बैड गर्ल’ एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसने बचपन से ही अपनी मासूमियत को इस्तेमाल करना सीख लिया है। सीरीज की कहानी का सिरा शुरू से पकड़ें तो इसमें दोष इसके घरवालों का है क्योंकि उसके शुरुआती मासूम सवालों का उनके पास जवाब ही नहीं।

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Good Bad Girl Review in Hindi by Pankaj Shukla Sony Liv Vikas Behl Abhishek Sengupta Samridhi Dewan Gul Panag
गुड बैड गर्ल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

महिला वकीलों की छवि पर आघात
वेब सीरीज ‘गुड बैड गर्ल’ वकालत करने वाली माया आहूजा की कहानी है। हिंदी सिनेमा में माया नाम अब एक उपमा की तरह इस्तेमाल होता है। और, ऐसे नाम वाले किरदारों का चरित्र चित्रण ‘माया मेमसाब’ से लेकर ‘गुड बैड गर्ल’ तक बदला नहीं है। माया आहूजा पेशे से वकील है। रूटीन कैंसर टेस्ट में बायोप्सी की सलाह मिलने से परेशान ये लड़की अपने काम के चलते जब नौकरी से निकाली जा रही होती है तो ‘विक्टिम कार्ड’ खेल देती है। अब कंपनी वाले उस पर मेहरबान इसलिए हैं कि उन्हें अपनी कंपनी को कर्मचारियों का सबसे बड़ा हितैषी बनकर दिखाना है और दूसरों को बुद्धू बनाकर अपना काम निकालने वाली इस लड़की के ऐसे ऐसे रूप सामने आने लगते हैं कि सीरीज देखते समय खीझ आने लगती है। लेकिन, क्या किया जाए, रिव्यू लिखना है तो सीरीज कैसी भी हो, देखनी तो पड़ती है।

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गुड बैड गर्ल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

गालियों में शोहरत तलाशती नायिकाएं
समझ में ये नहीं आता कि ऐसी कहानी पर सीरीज बनाने की, उनमें पैसा लगाने की और उसे प्रसारित करने से पहले समीक्षकों पर जल्दी से जल्दी इसका ‘अच्छा’ रिव्यू लिखने के लिए दबाव बनाने की भी हिम्मत कहां से आती है? सीरीज ‘फ्लीबैग’ की हीरोइन जैसी मिलती जुलती शक्ल वाली अदाकारा समृद्धि दीवान ढूंढ लेना ही इस सीरीज को बनाने वालों की सबसे बड़ी कामयाबी है क्योंकि गलती से भी अगर आपने ये सीरीज घर के स्मार्ट टेलीविजन पर देखने की हिमाकत कर डाली तो आपको अपने इस फैसले पर गुस्सा ही आएगा। समृद्धि की सबसे बड़ी उपलब्धि इस सीरीज की यही है कि वह मां की गाली चेहरे पर बिना कोई भाव लाए अपनी आवाज के सबसे ऊंचे सुर में दे सकती हैं। और, गुल पनाग? इनको क्या हुआ? गाली देने से महिला किरदार ‘कूल’ नहीं हो जाते, ये बात इन अभिनेत्रियों को समझनी चाहिए और मौका मिले तो ‘दिल्ली क्राइम’ जैसी एक दो सीरीज जरूर देख लेनी चाहिए।

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गुड बैड गर्ल रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

क्या यही है ओटीटी की आजादी?
ओटीटी आने के बाद से अभिनेत्रियों को वह सब कुछ करने को मिल रहा है, जो शायद वह परंपरागत फिल्मों व धारावाहिकों में नहीं कर पा रही थीं। स्त्री विमर्श लेकिन इस बात पर होना चाहिए कि मनपसंद किरदारों को करने की ओटीटी ने इन अभिनेत्रियों को जो आजादी दी है, क्या वह यही है? शातिर, चालाक, हिंसक, यौनसंबंधों की वर्जनाओं से आजाद और यहां तक कि कातिल हसीनाओं की कहानियां बनाने में भी कोई दिक्कत नहीं है लेकिन माया आहूजा जैसे किरदार? ऐसी कहानियां बनाकर सोनी लिव क्या दिखाना चाहता है, ये तो पता नहीं लेकिन जिस तरह का कथा विस्तार वेब सीरीज ‘गुड बैड गर्ल’ में है, वह इसे सिर्फ एमएक्स प्लेयर की पायदान पर लाकर खड़ा कर देता है।

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