GP Sippy: इनका नाम लेते हुए लड़खड़ाती थी अंग्रेजों की जुबान, गोपालदास परमानंद सिपाहीमलानी कैसे बने जीपी सिप्पी
G P Sippy Death Anniversary: लोकप्रिय निर्मता निर्देशक जिपी सिप्पी की आज पुण्यतिथि है। जानते हैं उनके बारे में
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सिनेमा के शौकीनों को 'शोले' जैसी एंटरटेनिंग फिल्म देने वाले निर्माता-निर्देशक जीपी सिप्पी अब इस दुनिया में नहीं। मगर, उनका बनाया सिनेमा तो है। उनका सिनेमा है तो उनसे जुड़े तमाम किस्से भी हैं। ऐसा ही एक किस्सा उनके नाम से जुड़ा है। आज 25 दिसंबर को जीपी सिप्पी की पुण्यतिथि है। आइए जानते हैं...
निर्माता नहीं, वकील बनने का था इरादा
बहुत कम लोग यह जानते हैं कि जी पी सिनेमा की दुनिया में नहीं बल्कि वकालत के पेशे में जाना चाहते थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो भारत पाकिस्तान बंटवारे के समय दो दोस्तों ने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में वकील बनने के इरादे से मुंबई में कदम रखा था। दोनों ने पुलिस प्रॉसिक्यूटर के लिए आवेदन किया। इनमें से एक का चयन हो गया। इस पद के लिए जिसका चयन हुआ वह राम जेठमलानी थे। आगे चलकर जेठमलानी देश के सबसे बड़े वकील के तौर पर उभर कर सामने आए। वहीं, जिसका चयन न हो सका वो जी पी सिप्पी थे।
इन फिल्मों का किया निर्माण
जी पी सिप्पी वकील के तौर पर तो अपने पांव नहीं जमा सके, लेकिन आगे चलकर वह देश के सबसे सफल निर्माताओं में शुमार किए गए। जी पी सिप्पी के फिल्मी करियर की बात करें तो उन्होंने अपनी शुरुआत साल 1951 से की थी। बतौर निर्माता उनकी पहली फिल्म का नाम सजा था। इसके बाद उन्होंने ब्रह्मचारी,सीता और गीता, शान, सागर, पत्थर के फूल और राजू बन गया जैंटलमैन जैसी फिल्में प्रोड्यूस कीं। हालांकि, उनके करियर की सबसे यादगार फिल्म शोले रही। इस फिल्म के निर्माण के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है। यह फिल्म इतनी बड़ी हिट साबित हुई कि जी पी सिप्पी का नाम इतिहास में दर्ज हो गया। फिल्मों के निर्माण के अलावा जी पी सिप्पी ने कुछ चुनिंदा फिल्मों का निर्देशन भी किया है। इनमें मरीन ड्राइव, श्रीमती 420, भाई बहन और मिस्टर इंडिया जैसी फिल्में शामिल हैं।
कैसे पड़ा जीपी सिप्पी नाम?
जी पी सिप्पी का असली नाम गोपालदास परमानंद सिपाहीमलानी था। इनके सरनेम से जुड़ा एक किस्सा है। जीपी सिप्पी उस दौर के थे, जब अंग्रेजों का राज भारत में हुआ करता था। कहा जाता है कि अंग्रेजों को उनका पूरा सरनेम बोलने में दिक्कत होती थी, इसलिए उन्होंने सिपाहीमलानी को सिप्पी कर दिया। और फिर गोपालदास परमानंद सिप्पी से वे जीपी सिप्पी हो गए।