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रणवीर-दीपिका-भंसाली पर हाईकोर्ट में मुकदमा, कौन है मस्तानी

Thu, 26 Nov 2015 09:55 AM IST
Updated Thu, 26 Nov 2015 09:55 AM IST
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FIR against Bajirao Mastani makers in High Court

फिल्म बाजीराव मस्तानी को लेकर संजय लीला भंसाली की मुश्किलें आने वाले दिनों में बढ़ सकती हैं। मस्तानी के वंशजों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। वह चाहते हैं कि भंसाली उनका पक्ष सुनें और रिलीज से पहले उन्हें फिल्म दिखाएं। इन वंशजों को डर है कि फिल्म में मस्तानी को अपमानित करने वाला चित्रण न हो क्योंकि वह एक राजकुमारी और रानी थी, न कि नाचने वाली। जैसी आम धारणा है।

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फिल्म बाजीराव-मस्तानी की रिलीज जैसे-जैसे नजदीक आ रही है इसे लेकर विवाद बढ़ रहे हैं। निर्देशक संजय लीला भंसाली विवादों को लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं। लेकिन आने वाले दिनों में उन्होंने अदालती कागजात के जवाब देने पड़ सकते हैं।
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मस्तानी के वंशजों ने फिल्म को लेकर मध्य प्रदेश की जबलपुर हाईकोर्ट में मामला दर्ज कराया है और जल्द ही इसमें कुछ निर्णायक बातें सामने आ सकती हैं। जबलपुर से लगभग 31 किलोमीटर दूर सिहोरा के रहने वाले बाजीराव-मस्तानी की सातवीं की पीढ़ी के तमकीन अली बहादुर ने भंसाली के विरुद्ध केस किया है।

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'मैंने कहा कि हम स्क्रिप्ट देखना चाहते हैं'

FIR against Bajirao Mastani makers in High Court

अमर उजाला से बातचीत में तमकीन ने बताया कि उन्हें 2014 में फिल्म के निर्माण की जानकारी मिली थी। तब उन्होंने भंसाली के दफ्तर में न केवल एक पत्र भेजा बल्कि बाजीराव-मस्तानी का संक्षिप्त इतिहास भी लिख कर दिया। तमकीन के अनुसार, इसका उन्हें लिखित जवाब तो नहीं मिला लेकिन भंसाली के दफ्तर से एक युवती का फोन आया और उन्होंने पूछा कि आप क्या चाहते हैं। तमकीन कहते हैं, ‘मैंने कहा कि हम स्क्रिप्ट देखना चाहते हैं। मस्तानी बेगम का रोल किस प्रकार से रचा गया है क्योंकि इससे पहले कुछ टीवी सीरियल आए थे जिसमें उन्हें नाचनेवाली दिखा दिया गया था। जबकि यह बात बिल्कुल गलत है।’ तमकीन से कहा गया कि स्क्रिप्ट तैयार है। वह स्वयं आकर देख सकते हैं। दो-चार दिनों में बता दें कि कब आ रहे हैं।

तमकीन के अनुसार इसके बाद कोई फोन नहीं आया और फिर आठ-दस दिन में बाद कॉल आया तो उनकी बात एक वकील से कराई गई। वकील ने कहा कि स्क्रिप्ट तैयार नहीं है। तब तमकीन ने कहा कि हम सिर्फ चाहते हैं कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर गलत ढंग से न दिखाया जाए। इसके बाद भंसाली के दफ्तर की तरफ से उनसे कोई संपर्क नहीं किया गया। अंततः जब टीजर रिलीज हुआ तो तमकीन और उनके परिवार ने हाईकोर्ट में केस लगाया और वही मांगें रखी जो भंसाली के दफ्तर से बातचीत के दौरान रखी थीं।

... तो छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव से मदद मांगी

FIR against Bajirao Mastani makers in High Court

तमकीन चिंतित हैं कि जिस तरह से फिल्म का एक डांस सामने आया है, उसका संदर्भ जानना जरूरी है। मस्तानी को भंसाली ने क्या किरदार दिया है? तमकीन कहते हैं कि मस्तानी पेशवा बाजीराव की दूसरी पत्नी थीं और हमें डर है कि कहीं उन्हें नाचने वाली न दिखा दिया गया हो। वह पारिवारिक इतिहास बताते हुए कहते हैं कि बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल की एक पत्नी ईरानी-मुस्लिम थीं। वही मस्तानी की मां थीं। मस्तानी बेगम महाराज छत्रसाल की बेटी थीं। 1727-1728 में जब इलाहाबाद के मुगल शासक मोहम्मद खान बंगश ने महाराजा छत्रसाल के राज्य पर हमला किया तो छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव से मदद मांगी। बाजीराव ने संकट में फंसे महाराजा की मदद की और बंगश की सेना को हराया। तब छत्रसाल ने बाजीराव को पुत्र की तरह स्वीकार किया और मस्तानी का विवाह उनसे करते हुए, राज्य का एक-तिहाई हिस्सा तथा कई लाख सोने की मुहरें ईनाम में दीं।

इतिहास बताता है कि पेशवा बाजीराव और मस्तानी की एक संतान हुई। पेशवा का परिवार उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था। इससे परिवार में संघर्ष हुआ। तमकीन कहते हैं कि यह संघर्ष कोई तत्कालिक या आकस्मिक घटना नहीं थी। बाजीराव ने अपने बेटे का नाम कृष्णराव रखा और जब वह नौ साल के हुए तो जनेऊ की रस्म पर विवाद हुआ। काशीबाई के दो बेटों के साथ कृष्णराव का भी जनेऊ होना था। राज परिवार के पंडितों को यह बात नागवार गुजरी कि एक मुस्लिम स्त्री से जन्मी संतान का ब्राह्मण संस्कारों के अनुसार जनेऊ हो। उन्होंने तब विद्रोह कर दिया।

किताब से ज्यादा फिल्म का असर

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तमकीन कहते हैं कि पूरे परिवार का विवाद यहीं से शुरू हुआ वर्ना तो काशीबाई और मस्तानी बेगम के साथ बाजीराव आराम से रह थे। कोई समस्या नहीं थी। मस्तानी आखिरी समय (1740) तक पेशवा के साथ रहीं और उन्होंने कई सैन्य कार्रवाइयों में भी हिस्सा लिया। वह तलवारबाजी और घुड़सवारी की माहिर थीं। डांसर भी अच्छी थीं। तमकीन के अनुसार जनेऊ विवाद के अतिरिक्त मस्तानी को लेकर किसी प्रकार का विरोध बाजीराव के परिवार या समय में नहीं था। असल में इतिहास को न जानने वालों की धारणा है कि मस्तानी के प्यार में डूब कर बाजीराव अपना परिवार और पेशवाई गंवा बैठे। जबकि वर्ष 1800 के बाद इस परिवार की पेशवाई खत्म हुई जब बाजीराव द्वितीय अंग्रेजों से परास्त हुए। अतः सही इतिहास जानना सबके लिए जरूरी है।

-तमकीन अली बहादुर के एडवोकेट अहादुल्ला उस्मानी की कहना है कि इतिहास का किताब में लिखा जाना अलग बात है। लेकिन किसी बात को फिल्माया जाए तो उसका ज्यादा असर होता है। इसमें अगर लोकप्रियता या पैसे कमाने के लिए एक रानी को ऐसे रूप या कपड़ों में दिखाएं, जिसके बारे में कोई सोच नहीं सकता तो रानी का अपमान होगा। हमने याचिका में कहा है कि फिल्म में ऐसिहासिक तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा न जाए। रॉयल्टी भी वंशजों को देने की बात हमने कही। यह राशि वह मस्तानी से संबंधित स्मारकों और जगहों को सुरक्षित, सुंदर और लोकप्रिय बनाने में लगाना चाहते हैं।

-जबलपुर हाईकोर्ट ने तमकीन अली बहादुर से कहा है कि वह सेंसर बोर्ड से फिल्म के संबंध में उचित कार्यवाही करने को कहें। तमकीन रिलीज से पहले फिल्म देखना चाहते हैं ताकि देख सकें कि इसमें कुछ आपत्तिजनक तो नहीं है। वह कोर्ट का आदेश संलग्न करते हुए तीन पत्र सेंसर बोर्ड को लिख चुके हैं परंतु अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है। तमकीन कहते हैं कि पत्रों का जवाब न देकर सेंसर बोर्ड कोर्ट के आदेश की अवमानना कर रहा है।

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