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बीमारियों को कैश कराता बॉलीवुड

Anuradha Goel

Anuradha Goel

Updated Sat, 28 Jul 2012 05:28 PM IST
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जल्‍द रीलिज होने वाली फिल्‍म 'बर्फी' में प्रियंका चोपड़ा एक ऐसी लड़की का किरदार निभा रही हैं जो ऑटिज्‍म से पीडि़त है। ऑटिज्‍म एक किस्म की मानसिक अक्षमता है। इसी फिल्‍म में रणबीर कपूर गूंगे-बहरे लड़के की भूमिका निभा रहे हैं। यानी फिल्म के नायक एक बार फिर शारीरिक रुप से अक्षम हैं। यह ट्रेंड नया नहीं है क्योंकि इससे पहले भी कई फिल्‍में बीमारियों पर फोकस थी। यह ट्रेंड ना सिर्फ अक्षमताओं के बारे में जानकारी देता है बल्कि फिल्म को हिट कराने का भी फंडा बनता जा है। सवाल यह है बड़े परदे पर बीमारियों या शारीरिक अक्षमताओं को ग्लोरीफाइ किया जाना दर्शकों को कब और क्‍यों रास आता है?
'गुजारिश' फिल्‍म में क्वाड्रोप्लेजिया से पीडि़त थे ऋतिक रोशन
फिल्म 'गुजारिश'  क्वाड्रोप्लेजिया (पैरालिसिस) यानी शरीर के निचले हिस्से में लकवा मारने जैसे विषय पर आधारित थी। इस फिल्म में ऋतिक रोशन ने एक जादूगर की भूमिका निभाई थी जो अपने जादू के दौरान दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाता है और उसके शरीर के निचले हिस्से को लकवा मार जाता है। वह 12 साल तक तो इस गंभीर बीमारी के साथ जीता है लेकिन उसके बाद अपनी इस जिंदगी से तंग आकर इच्छामृत्यु की मांग करता है।

बिग बी प्रोजेरिया और खान बने एस्परगर सिंड्रोम के शिकार 
फिल्म 'पा' में ओरो बने अमिताभ बच्चन प्रोजेरिया नामक बीमारी से ग्रस्त थे, जो उम्र में तो 13 साल का ही है लेकिन शारीरिक तौर पर वह 60 साल का दिखाई पड़ता है। उसका शरीर भी 60 साल के व्यक्ति की तरह शिथिल है। फिल्म 'माय नेम इज खान' में शाहरूख खान एस्परगर सिंड्रोम नामक बीमारी से पीडि़त थे जो दिमागी रूप से बहुत तेज है। लेकिन वह सामान्य बच्चों जैसा नहीं है। उसे किसी भी चीज को समझने के लिए थोड़ा सा समय चाहिए। लेकिन तकनीकों को जानने के मामले में वह अन्य बच्चों से चार गुना आगे है।



डिप्रेशन और कैंसर जैसी प्राब्लम्स भी हैं पॉपुलर
फिल्म 'कार्तिक कॉलिंग कार्तिक' में फरहान अख्तर पोर्टरेयिंग शिजोफ्रेनिया नामक बीमारी से ग्रस्त है जिसमें हीन भावना और आत्मविश्वास की भरपूर कमी है। उसके अंदर के मन का डर ही उसके लिए जानलेवा बन जाता है। ठीक यही बीमारी फिल्म 'वो लम्हे' में कंगना रानाउत में दिखाई गई है। फिल्म 'झूठा ही सही' में पाखी टायरवाला (मिशका) डिप्रेशन में आकर कई बार आत्महत्या करने की कोशिश करती है। फिल्म 'वी आर फैमिली' में काजोल टर्मिनल कैंसर से पीडि़त है जिसे पता है कि कुछ समय बात ही उसकी मृत्यु हो जाएगी।

'यू मी और हम' और 'गजनी' में है भूलने की बीमारी
फिल्म 'यू मी और हम' में काजोल अल्जाइमर से ग्रसित दिखाया है जो कि कुछ ही देर में अपनी चीजें रखकर भूल जाती है। यहां तक कि अपने आपको भी भूल जाती है। फिल्म 'गजनी' में आमिर खान एंटीरोग्रेड एम्नेसिया नामक बीमारी से ग्रस्त हैं हर पंद्रह मिनट बाद पिछली बातें भूल जाता है।


डिस्लेसिया और एड्स को भी भुनाया है बॉलीवुड ने
फिल्म 'तारे जमीं पर' में दर्शील सफारी को डिस्लेसिया नामक बीमारी है जो है तो अन्य बच्चों की तरह सामान्य लेकिन उसे चीजों की समझ नहीं है। वह जल्दी से चीजों को पहचान नहीं पाता। लेकिन अपनी बातों को एक्सप्रेस करने के लिए उसके पास चित्रकारी जैसा माध्यम है। फिल्म 'फिर मिलेंगे' और 'माइ ब्रदर निखिल' में एचआईवी एड्स जैसी बीमारी को हाईलाइट किया गया है।

इसी तरह से फिल्म 'अजब प्रेम की गजब' कहानी और 'कमीने' के कलाकारों को हकलाते हुए दिखाया है। जो कभी तो सामान्य बात करते हैं और कभी अचानक से हकलाने लगते हैं। फिल्म 'दीवानगी' और 'अपरिचित' जैसी ‌कितनी ही ‌फिल्मों में मल्टीपल डिसआर्डर, स्‍प्‍लिट पर्सनेलिटी डिसऑर्डर दिखाया गया है। जिसमें नायिक या नायिका एक साथ दो-तीन लाइफ जीते हैं और उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं होता कि ऐसा उनके साथ हो रहा है।

इसी तरह से कई और फिल्मों में मेटंली चैलेंज्ड, हार्ट ट्रांसप्लांट, मल्टीपल पर्सनेलिटी, कोर्नियर ट्रांसप्लांट, पैरानोइया जैसी बीमारियों को दिखाया गया है।


सत्तर से अस्सी के दशक की फिल्‍में 
सत्तर से अस्सी के दशक के दौर में दिलचस्‍प रूप से अमिताभ की हिट होने वाली अनेक फिल्में ऐसी थी जिसका मुख्य किरदार किसी न किसी असाध्य बीमारी से पीडि़त था। 'रेशमा और शेरा' (1971) में अमिताभ गूंगे-बहरे बने थे। इसी दौर में तमाम फिल्‍मों में बीमारियों को ही फोकस किया गया। 1971 में फिल्म 'आनंद' के राजेश खन्ना पेट के कैंसर से जूझते हैं। 1972 में आई सुपरहिट फिल्म 'कोशिश' के नायक संजीव कुमार और नायिका जया भादुरी दोनों ही गूंगे-बहरे थे।

साई परांजपे की नेत्रहीनों पर बनी फिल्म 'स्पर्श' भी इसी श्रेणी की फिल्म है। 1973 में बनी 'धुंध' फिल्म में डैनी ने एक ऐसे लकवाग्रस्त व्यक्ति का किरदार निभाया था जिसके शरीर का निचला हिस्सा बेकार हो चुका है। यह फिल्म भी सुपरहिट फिल्मों की श्रेणी में आती है। संजीव कुमार 'खिलौना' विक्षिप्त बने थे और राजेश खन्ना ने खामोशी में कैंसर पीड़ित का रोल अदा किया। जिन्हें दर्शकों ने भी काफी पसंद किया।

बीमारियों का ग्‍लैमराइजेशन     
गुजरे दौर और आज के दौर दोनों दौर में अमूमन फिल्में बीमारियों पर बनी और हिट भी रहीं। लेकिन दोनों ही दशकों में एक बात खासी हैरान करती है कि जैसे-जैसे दशक बदले, फिल्मों का ट्रेंड और विषय बदले- वैसे-वैसे फिल्मों में दिखाई जाने वाली बीमारियां या बीमारियों से संबंधित विषयों में भी परिवर्तन होने लगा। दोनों ही दौर की फिल्मों में विषय वही रहा लेकिन मूल चीज बीमारियों में बदलाव हो गया। पहले के दौर में जहां कैंसर, अंधापन, पागलपन, गूंगापन या बहरापन जैसी बीमारियों को अधिक हाईलाइट किया गया, वहीं आज के दौर में प्रोजेरिया, क्वाड्रो प्लेजिया, ऑस्टिम, शिजोफ्रेनिया, एचआईवी एड्स, डिस्लेसिया, एंट्रोग्रेड एमनेसिया जैसी बीमारियों को ज्यादा हाईलाइट किया जाता है।


आ रही हैं नई बीमारियां

मसलन, ये कहा जाए कि आज के दौर में समाज में नई-नई बीमारियां जन्म ले रही हैं और उन पर जमकर फिल्में भी बन रही है और फिल्में हिट भी हो रही हैं। इन विषयों पर बनी फिल्मों के हिट होने से एक बात सामने आती है कि लोग नई-नई बीमारियों को जानने में रूचि ले रहे हैं। आखिर घिसे-पिटे और बासी विषयों पर फिल्म देखने से शायद आज का दर्शक चाहता है कि उसे न केवल नई चीजों की जानकारी प्राप्त कर वह अपने ज्ञान को बढ़ाए बल्कि बीमारियों के ताने-बाने में बनी फिल्म से उसका मनोरंजन भी हो। ऐसा नहीं है कि जिन बीमारियों को बॉलीवुड कैश कर रहा है वो पहले नहीं थीं... पहले भी थीं लेकिन तब विज्ञान इन बीमारियों को पहचान नहीं पाया था। जैसे-जैसे बीमारियों का पता चला वैसे-वैसे बॉलीवुड उसे भुनाता चला गया। इतना ही नहीं बॉलीवुड में बीमारियों पर बनी ऐसी फिल्‍में ज्‍यादा हिट हो रही हैं जिनमें नई बीमारी के साथ-साथ है इमोशन, ड्रामा, तनाव भरे माहौल की रियैलिटी।           


क्‍या फिल्‍मों में बीमारियों को गंभीरता से चित्रि‍त किया जाता है ?


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