Connect Review: कनेक्ट नहीं करती नयनतारा की नई फिल्म, अनुपम खेर को पादरी के भेष में देख चौंके हिंदीभाषी दर्शक
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साल के आखिरी शुक्रवार को तमिल फिल्म 'कनेक्ट' हिंदी में डब होकर रिलीज हुई है। फिल्म का निर्माण नयनतारा के पति विग्नेश शिवम ने किया है।फिल्म की कहानी कोरोना में लगे पहले लॉक डाउन के इर्द गिर्द बुनी गई है। और, इसमें हॉरर का तड़का लगाया गया है। हिंदीभाषी दर्शकों को भूत प्रेतों की कहानी में ब्रह्म राक्षस, डाकिनी, चुड़ैल को झाड़ फूंक तो समझ आती है पर एक्सॉर्सिज्म उनके लिए अब भी एक एलियन जैसा विषय है। फिल्म में अनुपम खेर को शायद इसे अखिल भारतीय पहुंच दिलाने के लिए ही लिया गया लेकिन उनका एक पादरी का किरदार करना इसे हिंदीभाषी दर्शकों से कतई कनेक्ट नहीं करता। कोरोना संक्रमण काल अपने आप में लोगों के लिए किसी हॉरर से कम नहीं है, ऊपर से उसमें भूतों की कहानी बुनकर अश्विन सरवनन ने लगता है सेल्फ गोल कर लिया है।
फिल्म 'कनेक्ट' की कहानी अनु के संगीत प्रेम से सिरा पकड़ती है। वह संगीत सीखने लंदन जाना चाहती है। पिता जोसेफ बिनाय डॉक्टर हैं। घर में इसे लेकर वार्तालाप चल ही रहा होता कि देश में कोरोना वायरस फैल जाता है। जोसेफ बिनॉय मरीजों का इलाज करते करते दम तोड़ देते हैं। बेटी अपने पिता की मौत से सदमे में हैं और पिता की आत्मा से बात करने के पारंपरिक जतन करती है। लेकिन, मामला उल्टा पड़ जाता है। लोगों को लगता है वह पिता की मौत की वजह से सदमे में हैं लेकिन उसके नाना को समझ आता है कि बात वह नहीं है जो सब समझ रहे हैं। कहानी में चर्च के फादर की एंट्री होती है और हॉरर का हल्ला धीरे धीरे अपना असर दिखाने की कोशिश करने लगता है।
फिल्म 'कनेक्ट' कोविड संक्रमण के दौरान पहले लॉकडाउन पर केंद्रित है इसलिए फिल्म के सारे किरदार वीडियो कॉल के जरिये ही मिलते हैं। फिल्म देखने के दौरान बार बार यही सवाल सामने आता है कि आखिर कनेक्ट में ऐसा नया क्या है जो हिंदी दर्शको को कनेक्ट करेगी। फिल्म में जिस तरह का ट्रीटमेंट दिखाया गया है, वैसा ट्रीटमेंट दर्शक विक्रम भट्ट की कई फिल्मों में देख चुके हैं। हॉरर फिल्में देखते वक्त अगर दर्शकों को डर ना लगे तो ऐसी फिल्म देखने का मजा नहीं आता है। लेकिन यह फिल्म ना तो डराती है और ना ही रोमांच पैदा करती है। लेकिन 'कनेक्ट' में ऐसा कोई सीन नहीं जिससे दर्शक कनेक्ट हो सके। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग सिर्फ दो कमरों में ही हुई हैं। जिन दृश्यों में आत्मा शरीर छोड़ती है उन्हें अच्छे तरीके से फिल्माया गया है। लेकिन फिल्म में ऐसी बहुत सारी बातें खटकती है, जिसको स्पष्ट नहीं किया गया है। मसलन, एक लड़की अपने पिता की आत्मा से बात करने का फैसला क्यों करती है? जिसकी आत्मा वास्तव में उसके शरीर में प्रवेश करती है, उसकी कहानी क्या है?
कलाकारों में हानिया नफीसा ने अपना 100 प्रतिशत देने की पूरी कोशिश की है। सुजैन की भूमिका में नयनतारा ने अपना प्रभाव छोड़ा है लेकिन कुछ अलग से करने की गुंजाइश उनके लिए नहीं थी। 'बाहुबली' के कटप्पा यानी कि अभिनेता सत्यराज यहां नयनतारा के पिता आर्थर सैमुअल की भूमिका में ठीक रहे। फादर की भूमिका में अनुपम खेर ने प्रभाव छोड़ने की पूरी कोशिश की है लेकिन सोशल मीडिया पर उनका जैसा आभामंडल बन चुका है, उस लिहाज से उनके उत्तर भारतीय प्रशंसकों को उनका ये किरदार हजम नहीं होता। डॉक्टर जोसेफ बेनॉय की भूमिका में विनय राय ने भी दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है।
निर्देशक अश्विन सरवनन साउथ में 'माया’ और ‘गेम ओवर’ जैसी फिल्में बना चुके हैं। उनकी नई फिल्म तमिल में रिलीज हो चुकी है। दक्षिण में औसत रही इस फिल्म का भविष्य हिंदी में भी उज्ज्वल नहीं है। पूरी फिल्म देखने के बाद ऐसा लगता है कि जैसे अलग अलग फिल्मों के दृश्य लेकर एक फिल्म बना दी गई है। कहानी के भावनात्मक पक्ष को अश्विन सरवनन अच्छी तरह से दिखा सकते थे, लेकिन वह यहां भी चूक गए। तकनीकी रूप से फिल्म अच्छी बनी है खासकर फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक। मणिकांतन कृष्णमचारी की सिनेमैटोग्राफी और रिचर्ड केविन का संपादन भी अच्छा है।