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बहुत कठिन हो गई है फिल्म रिलीज से पहले प्रमोशन की जंग

Fri, 15 Jan 2016 07:53 PM IST
Updated Fri, 15 Jan 2016 07:53 PM IST
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Challenges of a movie release

एक फिल्म बनाना अपने आप में चुनौती है। लेकिन मौजूदा हालातों में एक बनी-बनी फिल्म को रिलीज करना उससे ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। निर्देशक अनुराग कश्यप कहते हैं कि एक बड़ी फिल्म रिलीज करने को इतनी तैयारियां की जाती हैं, जितनी कोई राजैनैतिक पार्टी लोकसभा चुनाव की तैयारियां नहीं करती।

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ये वो दौर है, जब फिल्म निर्माण से पहले उसके प्रचार का बजट बना लिया जाता है। दिमाग में महज एक विचार आने पर विधिवत समारोह करके बताया जाता है कि फलां-फलां निर्माता कंपनी, निर्देशक-अभिनेता का अनुबंध हो गया है, जल्द ही कोई फिल्म बनने वाली है।
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इसका हालिया उदाहरण निर्देशिका गौरी शिंदे की बनने वाली एक फिल्म है, जिसमें अभी बस ये तय हो पाया है कि अभिनेता शाहरुख खान और अभिनेत्री आलिया भट्ट होंगी। इसको लेकर शाहरुख-आलिया एक मंच पर आ चुके हैं। आलिया भट्ट ने अभी से बयानबाजी शुरू कर दी है।
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क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस फिल्म के रिलीज होने से पहले इसके बारे में आपको क्या-क्या दिखाया-बताया जाएगा? इसमें हर लम्हें पर पीआर के माध्यम से खबर फैलाई जाएगी। जरूरत पड़ी तो शाहरुख-आलिया खुद ट्विटर पर जानकारियां फैलाएंगे।

फिल्म रिलीज करने से पहले फिल्म का नाम तय होने, फिल्म के दूसरे कलाकार तय होने, मुहूर्त शॉट, शूटिंग के दौरान सेट की तस्वीरें, फर्स्टलुक पोस्टर (केवल नाम लिखा हुआ), पोस्टर, टीजर, ट्रेलर, गाने, कुछ दृश्यों की मेकिंग वीडियो, फिल्म देखने की अपील वाले वीडियो तक जारी किए जाएंगे।

लेकिन बात इतने से नहीं बनती। बीच-बीच में पोस्टर, टीजर, ट्रेलर और गाने लॉन्च करने के दौरान भव्य समारोह किए जाएंगे। ट्विटर पर ट्रेंड चलेगा #फलनाफिल्मट्रेलरडे। इसके बाद तमाम संचार माध्यमों (समाचार चैनलों, टीआरपी वाले टीवी धारावाहिकों, एफएम चैनलों, अखबारों में साक्षात्कार) पर अभिनेता-अभिनेत्री, निर्देशक स्वयं जाकर आपसे रूबरू होंगे। फिर इसके बाद कहीं, फिल्म रिलीज का अवसर आएगा। पर इतनी कवायद क्यों?

फर्स्टलुक पोस्टर

फिल्म रिलीज से पहले इतनी कवायद क्यों?

Challenges of a movie release

फिल्म रिलीज से पहले अगर उपरोक्त कवायदों को नकार दें, तो आंकड़े बताते हैं- फिल्म को वितरक नहीं मिलेंगे, मल्टीप्लेक्‍ट में स्क्रीन नहीं मिलेगी। हालिया रिलीज, 'एक्सः पास्ट इज प्रेजेंट', 'तितली', 'मसान' जैसी फिल्‍में कमतर प्रचार की मारी हैं। यहां 'पिपली लाइव' का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है। वह भी एक ऐसी ही फिल्म थी, लेकिन जैसी ही आमिर खान ने इसके प्रमोशन का जिम्मा संभाला फिल्म बड़ी हो गई। इसलिए अब कम बजट और नए अभिनेताओं की फिल्में 'सनम रे', 'लवशुदा' भी प्रचार के सारे हथकंडे अपना रही हैं।

असल में फिल्‍म जगत के सामने प्रत्यक्ष उदाहरण मौजूद हैं। 'शानदार', 'प्रेम रतन धन पायो', 'हेट स्टोरी 3', 'दिलवाले' जैसी स्तरीय फिल्मों ने प्रचार के दम पर करोड़ों की कमाई की। प्रचार की प्रतियोग‌िता को समझने के लिए हाल ही में एक बेहतरीन उदाहरण सामने आया। फिल्म बाजीराव मस्तानी और दिलवाले को एक ही दिन रिलीज होना था।

दोनों में प्रचार की होड़ इस स्तर की थी कि शाहरुख खान टीम ने 'फिल्‍म के क्लाइमेक्स' की शूटिंग का वीडियो पहले ही रिलीज कर दी। इसी समय बाजीराव मस्तानी के कुछ कैरीकेचर वाले वीडियो रिलीज कर दिए गए। इसमें बाजीराव के बहादुरी के किस्से थे। ये 2-2 मिनट के वीडियो थे, जिनमें बाजीराव के पराक्रम का गुणगान हो रहा था।

फिर बारी गानों की। शाहरुख का गाना गेरुआ जबर्दस्त हिट हुआ। इसको पछाड़ने के लिए बाजीराव मस्तानी का सबसे सुंदर गाना 'मस्तानी हो गई' रिलीज कर दिया गया। जैसे शाहरुख टीम प्रचार में पिछड़ी, उसने चर्चा में आए गाने 'गेरुआ' की शू‌टिंग का एक विधिवत वीडियो बनाकर रिलीज कर दिया।

शायद ही हेट स्टोरी 3 से पहले ऐसा कोई वीडियो रिलीज किया गया हो, जब एक बोल्ड सीन के शूटिंग में हीरोइनों को क्या परेशानी हुई, इसके बारे में खुद हीरोइनें बता रही हों। जरीन खान, डेजी शाह और करण सिंह ग्रोवर का जिस तरह का वीडियो हेट स्टोरी 3 के रिलीज से पहले जारी किया गया, फिल्‍म प्रमोशन के तरीकों के सारे पैमाने बदल गए। अंदाजा लगा सकते हैं कि एक फिल्म के प्रमोशन पर आज कितने करोड़ रुपये खर्च होते हैं।

नीचे के पोस्टर में देख सकते हैं कैसे उन व्यक्तियों से अपनी फिल्मों के पोस्टर रिलीज कराए जाते हैं, जिनके ट्विटर पर फॉलोवर ज्यादा हों।


फिल्‍म प्रमोशन पर कितने रुपये खर्च किए जा रहे हैं

Challenges of a movie release

फिल्मों का प्रचार फिल्‍म निर्माण का आज सबसे अहम ‌‌हिस्सा है। इसके लिए बायकदा अभिनेताओं से फिल्म साइन कराते वक्त ही अनुबंध कर लिया जाता है। यानि कि फिल्‍म में अभिनय करने के साथ अभिनेता को उसके प्रचार के भी दिन-तारीख, पैसे तय करने होते हैं।

हालिया रिलीज बाजीराव मस्तानी के‌ निर्माण में निर्माता कंपनी की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार कुल 100 करोड़ रुपये के खर्च आए। लेकिन इसके बाद 20 करोड़ रुपये फिल्म के प्रचार/विज्ञापन खर्च करने पड़े। दिलवाले को बनाने में महज 85 करोड़ रुपये का खर्च आया। लेकिन इसके बाद एक चौथाई से भी ज्यादा 25 करोड़ रुपये प्रमोशन पर खर्च कर दिए गए।

इसी तरह सलमान की आखिरी रिलीज 'प्रेम रतन धन पायो' को बनाने में महज 80 करोड़ खर्च किए गए थे। लेकिन इसके प्रचार में सूरज बड़जात्या टीम ने 30 करोड़ खर्च कर डाले। आपको जानकर हैरानी होगी कि जहां 'प्रेम रतन धन पायो' के प्रचार का बजट 30 करोड़ था; वहीं 'हेट स्टोरी 3' का कुल बजट महज 24 करोड़ था। लेकिन उसको बनाने में भी महज 17 करोड़ खर्च किए गए थे, बाकी के सात करोड़ प्रचार पर।

इस साल की आने वाली महत्वकांक्षी फिल्मों की बात करें तो 'फैन', 'रईस', 'सुल्तान', 'दंगल', 'शिवाय' हैं। अगर आप ध्यान से समाचार माध्यमों को देखें तो हर रोज इन फिल्मों को लेकर कुछ न कुछ खबरें दिख जाएंगी। अब जरा कुछ समय पहले (1980-90) तक के प्रचार के बारे में जानिए, अगली स्लाइड में।

पहले कैसे होते थे फिल्म प्रमोशन

Challenges of a movie release

कुछ सालों पहले तक प्रचार के सामान्य तरीके थे। फिल्म आने के पहले टीवी पर प्रोमो आने लगते थे। सिनेमाघरों में ट्रेलर चलते थे। रिलीज के एक हफ्ते पहले से शहरों की दीवारों पर फिल्म के पोस्टर नजर आने लगते थे। मीडिया के साथ फिल्म यूनिट के सदस्यों की बातचीत रहती थी, जिसमें फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताया जाता था।

फिल्म सिनेमाघरों में लगती थी। कंटेंट और क्वालिटी के दम पर फिल्म कभी गोल्डन जुबली तो कभी सिल्वर जुबली मना लेती थी। कुछ फिल्में डायमंड जुबली तक भी पहुंचती थीं। तब कोई नहीं पूछता और जानता था कि फिल्म का कलेक्शन कैसा रहा? सभी यही देखते थे कि फिल्म कितने दिन और हफ्ते चली। फिर एक समय आया कि 100 दिनों के सफल प्रदर्शन के पोस्टर लगने लगे। समय बदला तो प्रचार के तरीके भी बदले।

आपको याद होगा 15 साल पहले तक रिक्‍शा-ऑटो रिक्‍शा को चारों तरफ से फिल्म के कपड़े अथवा कागज के पोस्टर से ढक कर फिल्म का प्रचार किया जाता है। उसमें एक ऊंची ध्वनि वाला ‌स्पीकर लगाते थे और गाने बजाते थे, बीच-बीच में फिल्म के बारे में थोड़ी-बहुत बाते बताते थे।

लेकिन आज फिल्म आने के दो-दो साल पहले से ही माहौल तैयार किया जाने लगता है। अभी सारा जोर जानकारी से अधिक जिज्ञासा पर रहता है। माना जाता है कि दर्शकों की क्यूरोसिटी बढ़ेगी तो वे सिनेमाघरों में आएंगे। क्यूरोसिटी बढ़ाने के लिए कतई जरूरी नहीं है कि फिल्म की बात की जाए।

यह काम किसी भी प्रकार की एक्टिविटी से किया जा सकता है। धार्मिक स्थानों में मत्था टेकने से लेकर नाचने-गाने तक के आयोजन किए जा सकते हैं। हमेशा कोशिश यही रहती है कि चर्चा हो। अखबारों और चैनलों में बगैर पैसे खर्च किए फिल्म,फिल्म के कलाकारों और उनसे संबंधित बातें होती रहें।

कई बार तो नकारात्मक प्रचार को भी फिल्म के लिए कराया जाता है। हाल ही जानबूझ कर मीडिया में ये खबर फैलाई गई कि 'क्या कूल हैं हम 3' के लिए तुषार कपूर बैंकाक के वेश्यालयों में गए थे। आपको याद हो तो आमिर की फिल्म पीके के पोस्टर पर बेहिसाब बवाल हो चुका है।

कुछ आलोचकों को लगता है कि पीके की टीम ने अश्लीलता का सहारा लिया है। उसके पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं,इस बहसबाजी से पीके चर्चा के केंद्र में आ गई है। इन सब के बावजूद फिल्मों का प्रचार निरंतर महंगा होता जा रहा है। निश्चित तौर पर इससे फिल्मों के बॉक्स ऑफिस कलेक्‍शन को फायदा पहुंचा रहा है। लेकिन कलाकारों का ध्यान अभिनय के बजाय प्रचार पर केंद्र‌ित होता जा रहा है।

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