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सेंसर बोर्ड: पैरिस त्रासदी के बाद बना कानून जिसने बदली भारतीय सिनेमा की तस्वीर, क्या है सीबीएफसी और इसके नियम?

Thu, 17 Sep 2026 07:43 AM IST
गोधूलि श्रीवास्तव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: गोधूलि श्रीवास्तव Updated Thu, 17 Sep 2026 07:43 AM IST
सार

History of Central Board of Film Certification: कभी सिनेमाघरों के अंदर दर्शकों के संरक्षण के लिए एक नियम बनाया गया। फिल्मों के बढ़ते जादू के साथ ही धीरे-धीरे इस नियम ने भी पनपना शुरू हुआ। पैरिस से उठी नियम की एक चिंगारी ने कैसे भारत में उठाया अधिनियमों का धुआं? जानिए इस खबर में...

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CBFC History Explained Film Bans Laws From 1921 to 1952 Act and what is censor board Jana Nayagan
कहानी सीबीएफसी की - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत सरकार ने बुधवार को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) का पुनर्गठन किया है।  गठित किए गए नए बोर्ड में कुल 18 सदस्य हैं। इनमें अभिनेता पंकज त्रिपाठी, सुनील शेट्टी, मनोज जोशी, प्रोसेंजीत चटर्जी, अभिनेत्री प्रीति जिंटा, रूपाली गांगुली और पल्लवी जोशी समेत कई बड़े नाम शामिल हैं।
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हाल ही के दिनों में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड तमिलनाडु सीएम थलापति विजय की आखिरी फिल्म 'जन नायकन' और दिलजीज दोसांझ की ओटीटी पर रिलीज हुई 'सतलुज' को लेकर भी चर्चा में रहा। इस खबर के पहले भाग में समझिए क्या है सेंसर बोर्ड और कहां से शुरू हुई इसकी कहानी?
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चित्र में लोगों के त्रासदी के दौरान भागने की कोशिश में मची अफरा-तफरी और भगदड़ को दर्शाया गया है। - फोटो : बिब्लियोथेक नेशनेल डी फ्रांस
1897 में पेरिस के थिएटर में लगी वो आग जिसे सेंसरशिप नियम का बीज माना जाता है। वो हादसा जिसे फिल्म सेंसरशिप और सुरक्षा नियमों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। पेरिस से हुई शुरूआत धीरे-धीरे भारतीय सिनेमा तक पहुंची। मगर आज भी सिनेमाघरों में फिल्म देखते हुए दर्शकों में से ज्यादातर इसके नियमों व कार्य प्रणाली से अंजान हैं। जानिए कब बने यह नियम और कब तय की गई सीमाएं?

क्या थी 'बाजार डे ला चैरिटी' की वो त्रासदी?
साल 1897 में पैरिस में एक चैरिटी समारोह चल रहा था। वहीं बाहर लकड़ी की एक संरचना रखी हुई थी। इसके पास ही ज्वलनशील कैनवास का पर्दा लगा हुआ था, जिसके पास ही एक सिनेमाटोग्राफ भी रखा हुआ था। इस सिनेमाटोग्राफ के अत्यधिक ज्वलनशील नाइट्रेट फिल्म ने आग पकड़ ली। आस-पास लकड़ियां होने के चलते यह आग फैल गई और इस हादसे में 126 लोगों की जलकर मौत हो गई। इस त्रासदी के बाद सुरक्षा को देखते हुए सिनेमाटोग्राफ कानून बनाया गया।

कहां बना पहला सिनेमाटोग्राफ कानून?
  • 'बाजार डे ला चैरिटी' में लगी उस आग के बाद भी लगभग एक दशक बाद तक हादसे बंद नहीं हुए।
  • ऐसे माहौल में जन्म हुआ दुनिया के पहले सिनेमाटोग्राफ कानून का।
  • 1909 में जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था तब यह कानून बना।
  • दुनिया का पहला प्राथमिक सिनेमेटोग्राफी कानून यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) की संसद द्वारा बनाया गया था।
  • इसे सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1909 कहा जाता है।
  • यह फिल्म उद्योग को विनियमित करने वाला दुनिया का पहला कानून था।
  • इस कानून ने ब्रिटेन में फिल्म सेंसरशिप का कानूनी आधार तैयार किया।

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उस दौर में शूटिंग करते फिल्ममेकर्स - फोटो : सोशल मीडिया
कानून में क्या था खास?
  • 1909 के सिनेमाटोग्राफ अधिनियम के तहत फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए लाइसेंस अनिवार्य कर दिया गया।
  • फिल्म की कहानी और विषयवस्तु पर भी नियंत्रण रखा जाने लगा।
  • नियम इतने सख्त थे कि इन्हें तोड़ने पर भारी हर्जाना देना पड़ता।

कहां थी इस कानून में चूक?
  • स्थानिय आधिकारियों के लाइसेंसिंग शक्तियों के जरिए अपने अलग नियम बनाने से भ्रम की स्थिती पैदा हुई।
  • अधिनियम की मूल रूप से दर्शकों की सुरक्षा के लिए था मगर इसे अधिकारियों ने फिल्म को सेंसर करने और प्रदर्शन के दिनों को नियंत्रित करने के लिए किया।
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ब्रिटेन के सिनेमाटोग्राफ थिएटर की तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
कब हुआ ब्रिटिश सेंसर बोर्ड का गठन?
1909 में बने इस कानून की त्रुटियां दूर करने के लिए 1912 में ब्रिटिश सेंसर बोर्ड बनाया गया। इस कमेटी को बनाने का मूल उद्देश्य सरकार के हाथों से कमान वापस लेना था, जिससे किसी तरह का कोई भी भेदभाव न हो।

क्या था ब्रिटिश सेंसर बोर्ड में खास?
  • प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण को खत्म करना साथ ही स्थानीय अधिकारियों की मनमानी रोकना।
  • सिनेमाटोग्राफ निर्माता संघ से वित्तय सहायता।
  • जी.ए. रेडफोर्ड को बोर्ड का पहला अध्यक्ष बनाया गया।
  • सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेट का प्रावधान की शुरूआत हुई।
  • फिल्म को 'यू' ( फैमिली )और 'ए' (वयस्क) रेटिंग्स दी गईं।

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फिल्म 'कर्मा' - फोटो : सोशल मीडिया
भारत में कब हुई फिल्मों की शुरुआत?
1912 के बाद का वक्त ऐसा था जिसमें अब भारतीय दर्शक सिर्फ फिल्म देख नहीं रहे थे, फिल्में बनाना भी चाहते थे। दर्जनों लघु फिल्में बनी मगर दादा साहब फाल्के ने पहली फुल लेंथ भारतीय फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाई। फिल्म को 1913 में रिलीज किया गया।

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फिल्म 'भक्त विदुर' - फोटो : सोशल मीडिया
क्या था 1918 का सिनेमाटोग्राफ अधिनियम?
भारतीय फिल्मी दुनिमा में 1918 में सेंसर बोर्ड का गठन किया गया। सिनेमा को लेकर कानून बनाए गए। भारत में पहले पांच शहरों में बोर्ड की स्थापना की गई। ये बाॅम्बे, कलकत्ता, मद्रास, रंगून और लाहौर में बनाए गए। मगर इस बार उद्देश्य सिर्फ संरक्षण नहीं था।
ब्रिटिश शासक चाहते थे कि भारतीय स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ कोई भी कंटेंट न दिखाया जाए। 1927-28 में भारतीय सिनेमा समिति (आईसीसी) का गठन हुआ। भारत के लोगों में सिनेमा को लेकर प्रेम बढ़ता जा रहा था, जिसके परिणाम स्वरूप 250 सिनेमाघरों बनकर खड़े हो गए।

इन फिल्मों पर सबसे पहले चली सेंसर बोर्ड की कैंची
  • फिल्म 'भक्त विधुर ' भारत की पहली सेंसर बोर्ड द्वारा बैन होने वाली फिल्म थी। जिसे राजनैतिक कारणों के चलते बैन किया गया।
  • 1933 में फिल्म 'कर्मा' की इतिहास में अपनी एक जगह है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अभिनेत्री देविका रानी का वो 1 मिनिट लंबा किसिंग सीन था। जिसपर भारत में फिल्म का जमकर विरोध हुआ और फिल्म विवादों का हिस्सा रही। 
  • फिल्म 'त्यागभूमि' 1929 में रिलीज हुई दूसरी ऐसी फिल्म थी जिसपर सेंसर में विवाद हुआ था, क्योंकि फिल्म का लीड रोल शंभू शास्त्री का किरदार गांधी जी से मेल खाता था।
  • फिल्म में ब्रिटिश मूल के लोगों को बुरा दिखाने पर प्रतिबंध था। जिस वजह से उमाजी नायक,  स्वराज तोरण जैसी ऐतिहासिक फिल्मों में अन्य आक्रममणकारी शक्तियों को दिखाया गया।

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फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' - फोटो : सोशल मीडिया
1940 में कितना बदला सेंसर बोर्ड का स्वरूप?
  • अब सेंसर बोर्ड के नियमों के मुताबिक किसी भी फिल्म को सिर्फ एक बोर्ड से नहीं बल्कि पांचों बोर्ड से प्रमाणिकता की जरूरत थी।
  • इन पांचो बोर्ड के नियम अलग-अलग थे।
  • फिल्मकारों को इन पांचों के नियमों का पालन करना पड़ता था।
  • फिल्मों में चुंबन दृश्यों पर पाबंदी लगा दी गई।

क्या था 1952 का सिनेमाटोग्राफ अधिनियम?
सिनेमाटोग्राफ अधिनियम, 1952 (अधिनियम 37 ऑफ 1952) ने भारत में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए फिल्मों के प्रमाणीकरण हेतु ढांचा स्थापित किया और केंद्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड (सीबीएफसी) को इसके अंतर्गत शासित किया। इसके तहत सभी व्यावसायिक फिल्मों की जांच और प्रमाणीकरण बोर्ड द्वारा अनिवार्य की गईं, जिसे पहले केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के नाम से जाना जाता था।
  • भारत में  सिनेमाटोग्राफ अधिनियम  के तहत सीबीएफसी की स्थापना हुई, जिसके बाद फिल्मों को सर्टिफिकेट मिलने लगा
  • प्रमाणीकरण के बाद ही फिल्मों को प्रदर्शन की अनुमति दी जाती थी।
  • पायरेसी और अनधिकृत रिकॉर्डिंग करने पर तीन साल तक की जेल या 3 लाख से लेकर उत्पादन लागत के 5% तक का जुर्माना सजा के तौर पर भुगतने का प्रावधान लागू हुआ।
  • फिल्मों के यू/ यू/अ जैसी श्रेणियों में बांटा जाने लगा। 

CBFC History Explained Film Bans Laws From 1921 to 1952 Act and what is censor board Jana Nayagan
फिल्ममेकर अहमद अब्बास - फोटो : सोशल मीडिया
1982 में सिनेमाटोग्राफ अधिनियम में क्या बदलाव हुए?
साल 1982 में सीबीएफसी में बड़ा बदलाव किया गया। 1952 में बने सिनेमाटोग्राफ अधिनियम में संशोधन कर इसमें से "सेंसरशिप" शब्द हटा दिया गया। हालांकि फिर भी इसे आम लोगों के बीच सेंसर बोर्ड को नाम से ही जाना जाने लगा।

सीबीएफसी 1983 अधिनियम में क्या खास?
  • 1983 में आधिकारिक बोर्ड के नाम से "सेंसरशिप" शब्द को आधिकारिक तौर पर हटा दिया गया और फिल्म सेंसर बोर्ड का नाम बदलकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) कर दिया गया।
  • अधिनियम में बोर्ड की भूमिका साफ कर दी गई। यह स्पष्ट रूप से बताया गया केवल सामग्री को सेंसर करने की नहीं बल्कि उपयुक्त दर्शकों के लिए फिल्मों का वर्गीकरण करना है।
  • फिल्म में हिंसा, असामाजिक गतिविधियों, अश्लीलता, अभद्रता और महिलाओं की मानहानि को बढ़ावा देने पर कनून सख्त किए गए।  
  • सीबीएफसी के कानून भारत की संस्कृति और समाजिकता को देख कर बनाए गए।

आज पहली किश्त में हमने जाना कि भारत में सेंसर बोर्ड की शुरुआत कहां और कैसे हुई...

कल दूसरी किश्त में उन फिल्मों का जिक्र करेंगे जिनकी आग सेंसर बोर्ड के टेबल से लेकर देश की सड़कों तक फैल गई।

 
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