सीएसआईआर: रबर सेक्टर के लिए एनआईआईएसटी और आरआरआईआई ने मिलाया हाथ, समस्याओं का कैसे होगा समाधान? जानें डिटेल
रबर सेक्टर की तकनीकी चुनौतियों और नई जरूरतों को पूरा करने के लिए एनआईआईएसटी और आरआरआईआई ने साथ काम करने का फैसला किया है। दोनों संस्थान रिसर्च और डेवलपमेंट के जरिए रबर उद्योग के लिए समाधान विकसित करेंगे।
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एनआईआईएसटी ने सोमवार को बताया कि वह रबर सेक्टर की प्रमुख तकनीकी समस्याओं और नई जरूरतों को पूरा करने के लिए रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (RRII) के साथ मिलकर काम करेगा। दोनों संस्थान रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) के जरिए रबर उद्योग से जुड़ी समस्याओं के समाधान पर काम करेंगे।
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरडिसिप्लिनरी साइंस एंड टेक्नोलॉजी (NIIST), काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) की एक रिसर्च लैब है। वहीं, रबर रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (RRII), कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री के तहत आने वाले रबर बोर्ड का हिस्सा है।
रबर सेक्टर की समस्याओं का कैसे होगा समाधान?
- सहयोग पर चर्चा: सोमवार को तिरुवनंतपुरम स्थित CSIR-NIIST में इस प्रस्तावित सहयोग पर चर्चा हुई। इसमें RRII, NIIST, रबर बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी और दोनों संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल हुए।
- NIIST-ITE हब के तहत होगा काम: यह सहयोग थोन्नक्कल स्थित बायो 360 लाइफ साइंस पार्क में बने NIIST इनोवेशन, टेक्नोलॉजी एंड एंटरप्रेन्योरशिप हब (NIIST-ITE हब) के तहत किया जाएगा।
- रबर सेक्टर को मिलेगा सपोर्ट: हब का उद्देश्य केरल में रबर और उससे जुड़े उद्योगों को रिसर्च, ट्रेनिंग, नए कारोबार शुरू करने और विज्ञान-तकनीक से जुड़ी मदद देना है।
- देश में ही केमिकल तैयार करना: आयात पर निर्भरता कम करने के लिए देश में ही नए केमिकल और सिंथेटिक रिएजेंट विकसित किए जाएंगे।
- रीसाइक्लिंग पर काम: रबर को दोबारा इस्तेमाल करने के लिए नई रीसाइक्लिंग तकनीक विकसित की जाएगी।
- प्रदूषण कम करने पर जोर: रबर बनाने के दौरान निकलने वाले कचरे और गंदे पानी का माइक्रोबियल ट्रीटमेंट किया जाएगा, ताकि प्रदूषण कम हो।
- बदबू की समस्या का समाधान: रबर प्रोसेसिंग के दौरान आने वाली बदबू को कम करने के लिए NIIST की तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।
- पुराने रबर को फिर उपयोगी बनाना: रबर उत्पादों से दोबारा इस्तेमाल योग्य सामग्री बनाने के लिए डी-वल्केनाइजेशन की नई तकनीक विकसित की जाएगी।
- बेहतर और ज्यादा मूल्य वाले उत्पाद: टिकाऊ कारोबार को बढ़ावा देने के लिए हाई-परफॉर्मेंस और ज्यादा कीमत वाले रबर उत्पाद विकसित किए जाएंगे।
रबर सेक्टर के लिए देश में बनी टिकाऊ तकनीक क्यों जरूरी?
CSIR-NIIST के डायरेक्टर डॉ. सी. आनंदरामकृष्णन ने बातचीत के दौरान कहा कि रबर सेक्टर केरल के औद्योगिक और आर्थिक इकोसिस्टम का एक अहम हिस्सा है, और इसके सामने आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए देश में बने, टिकाऊ और टेक्नोलॉजी के लिहाज से एडवांस्ड समाधानों की बहुत जरूरत है।
उन्होंने कहा, "CSIR-NIIST के पास मटीरियल, केमिकल, बायोलॉजिकल और प्रोसेस टेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में मल्टी-डिसिप्लिनरी (कई विषयों की) विशेषज्ञता है, जबकि RRII के पास रबर सेक्टर की गहरी जानकारी और उससे करीबी जुड़ाव है। यह सहयोग वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावहारिक टेक्नोलॉजी में बदलने के लिए एक मजबूत मंच प्रदान करेगा, जिससे रबर उद्योग, उद्यमियों और अन्य स्टेकहोल्डर्स को फायदा होगा।"
स्टार्टअप्स और रिसर्चर्स को भी मिलेगा फायदा
इस मौके पर रबर बोर्ड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर वसंतगेसन (IRS) ने भी बात की। उन्होंने कहा कि NIIST और रबर बोर्ड के बीच का यह सहयोग इन दोनों संस्थानों तक ही सीमित नहीं रहेगा।
उन्होंने कहा, "यह सहयोग सिर्फ सीएसआईआर-एनआईआईएसटी और रबर बोर्ड के बीच ही नहीं रहेगा। इससे पूरे रबर सेक्टर को फायदा होगा, जिसमें अपस्ट्रीम, मिडस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम स्तर के स्टेकहोल्डर्स, और खासकर रबर किसान शामिल हैं।"
प्रेस रिलीज के अनुसार, इस सहयोगी कार्यक्रम से रबर-आधारित उद्योगों, स्टार्ट-अप्स, उद्यमियों और रिसर्च स्कॉलर्स के कर्मचारियों में S&T (साइंस और टेक्नोलॉजी) स्किल्स के विकास में भी मदद मिलने की उम्मीद है। यह कार्यक्रम सीएसआईआर-एनआईआईएसटी और आरआरआईआई की एक-दूसरे की पूरक और मल्टी-डिसिप्लिनरी विशेषज्ञता का लाभ उठाएगा और साथ ही भारतीय रबर सेक्टर की खास जरूरतों को पूरा करेगा, जिसमें केरल के संदर्भ में विशेष महत्व होगा।
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