NCERT: एनसीईआरटी ने बदला कक्षा 7वीं का इतिहास पाठ्यक्रम, नई किताब में जोड़े गए कई बिसरे राजवंश
NCERT Class 7: एनसीईआरटी ने कक्षा 7 के लिए सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक जारी की है, जिसमें इतिहास के पाठ्यक्रम में कई बिसरे और कम-जाने गए भारतीय राजवंशों को शामिल किया गया है।
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NCERT: एनसीईआरटी ने कथा 7 की नई सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक जारी की है, जिसमें भारत के मध्यकालीन इतिहास को अब उत्तर भारत केंद्रित दृष्टिकोण से हटाकर पूरे देश के विविध राज्यों और सभाओं के नजरिए से प्रस्तुत किया गया है। 6वीं से 12वीं शताब्दी तक की अवधि की कवर करने वाली किताब 'एक्सप्लोरिंग सोसाइटीम इंडिया एंड बियॉन्ड' पहली बार विद्यार्थियों को भारत का समग्र परिप्रेक्ष्य उपलब्ध कराती है।
पहले की किताबों में मुख्यतः पाल, गुरजर-प्रतिहार और राष्ट्रकूटी के बीच हुए त्रिपक्षीय संघर्ष तथा शुरुआती सुल्तनत काल पर अधिक जोर दिया जाता था। नई किताम, नई शिक्षा नीति 2020 और एनसीएफ-एसई 2023 के अनुरूप, कम ज्ञात राजवंशों, क्षेत्रीय साहित्य, दर्शन और मंदिर स्थापत्य को प्रमुखता देती है।
भक्ति आंदोलन की जड़ों को भी समझाया गया:
काकतीयों को तेलुगु साहित्य के संरक्षण, सिंचाई परियोजनाओं, ग्राम स्वशासन और राजस्व व्यवस्था के लिए सराहा गया है। हनमकोंडा का प्रसिद्ध हजार स्तंभ मंदिर इस काल की उत्कृष्ट कला का उदाहरण बताया गया है।
कल्याणी के चालुक्यों के राजा सोमेश्वर तृतीय की पुस्तक मानसोल्लासा में खगोल, संगीत, चिकित्सा, भोजन और खेलों का व्यापक उल्लेख होने की वजह से उसे विशेष स्थान मिला है। पल्लवों की गुफा मंदिर कला और महाबलीपुरम के तट मंदिर को यूनेस्को धरोहर के रूप में रेखांकित किया गया है। अलवार और नयनार संतों के जरिये भक्ति आंदोलन की जड़ों को भी समझाया गया है।
पश्चिम और पूर्व भारत का प्रतिनिधित्व
होयसलों द्वारा बेलूर और हलेबिडु में निर्मित बारीक नक्काशी वाले मंदिरों को क्षेत्रीय कला का श्रेष्ठ उदाहरण बताया गया है। पूर्वी गंग वंश को पुरी के जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क के सूर्य मंदिर जैसी भव्य रचनाओं के लिए स्थान दिया गया है।
उत्तर-पूर्व भारत भी शामिल:
कम रूप से उल्लेखित ब्रह्मपाल वंश को कामरूप (वर्तमान असम) के इतिहास में उनकी भूमिका के आधार पर प्रमुखता से
शामिल किया गया है। किताब में भंजा, चापा, गुहिल, कलचुरी, मैत्रक, मौखरी, शिलाहार, सोमवंशी, तोमर, चैहमान सहित कई अन्य राजवंशों का योगदान भी जोड़ा गया है। आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और बसवेश्वर जैसे आध्यात्मिक एवं सामाजिक सुधारकों का उल्लेख इस दौर की बौद्धिक समृद्धि दर्शाता है।
मंदिर स्थापत्य पर विशेष जोर
एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर, चोल काल का बसवेश्वर मंदिर और चंदेलों का लक्ष्मण मंदिर स्थापत्य सौंदर्य और इंजीनियरिंग कौशल के उदाहरणों के रूप में शामिल किए गए हैं।
पहले की किताबों में उत्तर भारत और दिल्ली सल्तनत की इमारतों पर अधिक जोर था, जबकि नई पुस्तक क्षेत्रीय कला और धार्मिक परंपराओं को केंद्र में रखती है।
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