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Supreme Court: देशभर में बच्चों के लिए एक समान पाठ्यक्रम की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल
Wed, 22 Dec 2021 10:41 PM IST
सुभाष कुमार
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: सुभाष कुमार
Updated Wed, 22 Dec 2021 10:41 PM IST
सार
Supreme Court: याचिका में कहा गया है कि आरटीई अधिनियम की धाराएं एक (चार) और एक (पांच) संविधान की व्याख्या करने में सबसे बड़ी बाधा हैं और मातृभाषा में समान पाठ्यक्रम का नहीं होना अज्ञानता को बढ़ावा देता है।
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भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह जनहित याचिका दायर की है।
- फोटो : Social Media
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट में ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009’ (आरटीई) की कुछ मनमानी, तर्कहीन धाराओं के खिलाफ और देशभर में सभी विद्यार्थियों के लिए समान पाठ्यक्रम अपनाए जाने का अनुरोध करने वाली एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है। भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह जनहित याचिका दायर की है।
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याचिका में कहा गया है कि आरटीई अधिनियम की धाराएं एक (चार) और एक (पांच) संविधान की व्याख्या करने में सबसे बड़ी बाधा हैं और मातृभाषा में समान पाठ्यक्रम का नहीं होना अज्ञानता को बढ़ावा देता है। जनहित याचिका में कहा गया है कि समान शिक्षा प्रणाली लागू करना संघ का कर्तव्य है, लेकिन वह इस अनिवार्य दायित्व को पूरा करने में विफल रहा है और उसने 2005 के पहले से मौजूद राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे (एनसीएफ) को अपना लिया है।
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याचिका में कहा गया है कि केंद्र ने मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले शैक्षणिक संस्थानों को शैक्षिक उत्कृष्टता से वंचित करने के लिए धारा- 1(4) और1(5) डाला। याचिकाकर्ता उपाध्याय का कहना है कि धारा-1(4) और 1(5) न केवल अनुच्छेद 14, 15, 16, 21, 21ए का उल्लंघन है बल्कि अनुच्छेद 38 39 और 46 और प्रस्तावना के भी विपरीत है।
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याचिका में कहा गया है कि प्रचलित प्रणाली सभी बच्चों को समान अवसर प्रदान नहीं करती है क्योंकि समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए पाठ्यक्रम भिन्न होता है। शिक्षा प्रत्येक बच्चे का मूल अधिकार है और राज्य द्वारा इस महत्वपूर्ण अधिकार के खिलाफ भेदभाव नहीं किया जा सकता है। एक बच्चे का अधिकार केवल मुफ्त शिक्षा तक ही सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि बच्चे की सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव के बिना समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त करने का भी होना चाहिए। इसलिए न्यायालय को धारा-1(4) और 1( 5) को मनमाना, तर्कहीन करार दिया जाना चाहिए।
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