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प्लॉट दिलाने का झांसा देकर करोड़ों की ठगी में दो दबोचे
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नई दिल्ली। आर्थिक अपराध शाखा ने दिल्ली स्टेट इन्फ्राट्रक्चरल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (डीएसआईआईडीसी) का अधिकारी बनकर निवेशकों से करोड़ों की ठगी करने वालेे दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। दोनों आरोपी रिश्तेदार हैं और आरोप है कि दोनों ने औद्योगिक प्लॉट के लिए निवेशकों के आवेदन को स्वीकार करवाने का झांसा देकर पैसे ऐंठ लिए। जबकि निवेशकों के आवेदन को डीएसआईआईडीसी ने अस्वीकार कर दिया था। शाखा के पुलिस उपायुक्त मोहम्मद अली ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों की पहचान मूलत: देहरादून, उत्तराखंड निवासी विक्रम सक्सेना और सहारनपुर यूपी निवासी मिथुन भटनागर के रूप में हुई है।
पुलिस विक्रम के एक भाई की तलाश कर रही है। केवल पार्क, आजादपुर निवासी नरेश जिंदल ने वर्ष 2020 में आर्थिक अपराध शाखा में दी शिकायत में बताया था कि वर्ष 1998 में औद्योगिक प्लॉट के लिए डीएसआईआईडीसी में री-एलोकेशन स्कीम के तहत आवेदन किया था। लेकिन संबंधित एजेंसी ने उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया।
वर्ष 2018 में आरोपी विक्रम सक्सेना और अजय सक्सेना उनसे मिले, जिन्होंने खुद को डीएसआईआईडीसी में कार्यरत बताया। आरोपियों ने शिकायत कर्ताओं को विश्वास दिलाने के लिए अपना पहचान पत्र और शिकायत कर्ताओं का असली फार्म भी दिखाया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था। फिर आरोपियों ने उन्हें अतिरिक्त खर्च करने पर प्लॉट दिलाने का झांसा दिया।
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उनकी बातों में शिकायतकर्ता समेत सात लोग आ गए। निवेशकों से करीब आठ करोड़ रुपये ले लिए गए। लेकिन न ही उन्हें प्लॉट मिला और न ही पैसे वापस हुए। शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों को शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में पता चला कि विक्रम सक्सेना दिल्ली स्टेट इन्फ्राट्रक्चरल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में बतौर एजेंट काम करता था। वह लोगों के फाइल वर्क को पूरा करवाने में उनकी मदद करता था। उसे पता चला कि वर्ष 1996 मेें एजेंसी ने एक स्कीम के तहत पटपडग़ंज में प्लॉट के लिए आवेदन मांगे थे। जिसे बाद में अस्वीकार कर दिया। उसके बाद आरोपी ने अपने भाई अजय सक्सेना और जीजा मिथुन भटनागर के साथ ठगी की योजना बनाई। उसने देव सेवा इनकम डवलपमेंट कंपनी के नाम से राजौरी गार्डन स्थित एक बैंक में खाता खोला और निवेशकों से लिए पैसे को उसमें जमा करवाया। फिर जिनके आवेदन अस्वीकार किए गए थे, उनसे संपर्क कर ठगी को अंजाम दिया।
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पुलिस विक्रम के एक भाई की तलाश कर रही है। केवल पार्क, आजादपुर निवासी नरेश जिंदल ने वर्ष 2020 में आर्थिक अपराध शाखा में दी शिकायत में बताया था कि वर्ष 1998 में औद्योगिक प्लॉट के लिए डीएसआईआईडीसी में री-एलोकेशन स्कीम के तहत आवेदन किया था। लेकिन संबंधित एजेंसी ने उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया।
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वर्ष 2018 में आरोपी विक्रम सक्सेना और अजय सक्सेना उनसे मिले, जिन्होंने खुद को डीएसआईआईडीसी में कार्यरत बताया। आरोपियों ने शिकायत कर्ताओं को विश्वास दिलाने के लिए अपना पहचान पत्र और शिकायत कर्ताओं का असली फार्म भी दिखाया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था। फिर आरोपियों ने उन्हें अतिरिक्त खर्च करने पर प्लॉट दिलाने का झांसा दिया।
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उनकी बातों में शिकायतकर्ता समेत सात लोग आ गए। निवेशकों से करीब आठ करोड़ रुपये ले लिए गए। लेकिन न ही उन्हें प्लॉट मिला और न ही पैसे वापस हुए। शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों को शुक्रवार को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में पता चला कि विक्रम सक्सेना दिल्ली स्टेट इन्फ्राट्रक्चरल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में बतौर एजेंट काम करता था। वह लोगों के फाइल वर्क को पूरा करवाने में उनकी मदद करता था। उसे पता चला कि वर्ष 1996 मेें एजेंसी ने एक स्कीम के तहत पटपडग़ंज में प्लॉट के लिए आवेदन मांगे थे। जिसे बाद में अस्वीकार कर दिया। उसके बाद आरोपी ने अपने भाई अजय सक्सेना और जीजा मिथुन भटनागर के साथ ठगी की योजना बनाई। उसने देव सेवा इनकम डवलपमेंट कंपनी के नाम से राजौरी गार्डन स्थित एक बैंक में खाता खोला और निवेशकों से लिए पैसे को उसमें जमा करवाया। फिर जिनके आवेदन अस्वीकार किए गए थे, उनसे संपर्क कर ठगी को अंजाम दिया।