35 साल पुराने ट्रांजिस्टर बम विस्फोट मामले में 30 लोग बरी
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इन मामलों में दिल्ली पुलिस ने आठ एफआईआर दर्ज की थीं। जांच के बाद 14 आरोप पत्र पुलिस ने अदालत में दाखिल किए थे। इनमें से एक आरोप पत्र कोर्ट से गायब हो गया था। इसके बाद कोर्ट स्टाफ पर एफआईआर व विभागीय जांच हुई थी।
साकेत जिला अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संदीप यादव ने आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि पुलिस की जांच में कई खामियां हैं और ऐसी घटिया जांच के आधार पर 35 साल पुराने मामले में 30 लोगों को सजा नहीं सुनाई जा सकती।
राजधानी दिल्ली और आसपास के यूपी व हरियाणा के इलाकों में बसों तथा सार्वजनिक स्थलों पर 10 मई 1985 को हुए ट्रांजिस्टर ब्लास्ट में 69 लोग मारे गए थे। दिल्ली में ही 49 लोगों की मौत हुई थी और 127 जख्मी हुए थे। इन धमाकों की जांच मध्य जिला डीसीपी की देखरेख में विशेष जांच दल ने की थी।
पुलिस ने जांच के बाद 59 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। अदालत ने इनमें से पांच लोगों भगोड़ा घोषित कर दिया था और पांच अन्य को बरी कर दिया था। अदालत ने बाकी 49 लोगों पर 2006 में हत्या, देशद्रोह, आपराधिक साजिश, एक्प्लोसिव एक्ट तथा अन्य संबंधित धाराओं में आरोप तय किए थे। इन आरोपियों में से 19 की केस की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी। मामले में जिन 30 लोगों को दोषी ठहराया गया है वह 1986 से जमानत पर थे।
अदालत ने 120 पन्नों के फैसले में मोटे तौर पर कहा कि पुलिस ने जांच के दौरान कुछ लोगों को उठाया और उन्हें डरा-धमका कर सरकारी गवाह बनाया। इन लोगों को धमकी दी गई कि अगर पुलिस के मुताबिक बयान नहीं दिया तो उन्हें भी आरोपी बनाया जाएगा।
अदालत ने सुरजीत कौर, मनमोहन सिंह, गुरदेव सिंह, बूटा सिंह, कुलबीर सिंह उर्फ भोला, इंदरजीत सिंह उर्फ हैप्पी, हरदीप सिंह, तीरथ सिंह, मुख्तियार सिंह, भूपिंदर सिंह उर्फ भिंडा, अरविंदर सिंह उर्फ नीटू, अनूप सिंह, मनजीत सिंह, जोगिंदर पाल सिंह भाटिया, तारजीत सिंह, सरवजीत सिंह, सुरिंदरपाल सिंह, दलजीत सिंह, राजेंदर सिंह, सेवा सिंह, सुरेंदरपाल सिंह उर्फ डौली, शाहबाज सिंह, सुखदेव सिंह, जसपाल सिंह, दलविंदर सिंह उर्फ पप्पा, नरेंदर सिंह, गुरमीत सिंह, हरचरन सिंह, गुरदीप सिंह सेहगल तथा गुरमीत सिंह उर्फ हैप्पी को बरी करते हुए कहा पुलिस इन आरोपियों के खिलाफ आरोपों को साबित करने में नाकाम रही है।
अदालत ने कहा...
अदालत ने कहा कि पुलिस यह भी साबित नहीं कर पाई कि इन लोगों ने जो बम बसों में रखे थे, वह फटे भी या नहीं। अगर बम फटे नहीं थे तो उन बमों को निष्क्रिय किया गया या नहीं। जिन बसों में बम रखे गये थे उनके नंबर भी जांच अधिकारी ने नहीं लिये।
इसके अलावा ऐसा कोई गवाह नहीं आया जिसने बमों को निष्क्रिय किया था। इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि मुख्तियार सिंह, अनूप सिंह, भूपिंदर सिंह, अरविंदर सिंह, मनजीत सिंह, तीरथ सिंह, दलजीत सिंह ने जो बम बसों में रख थे, उनमें विस्फोट हुआ था। पुलिस का सारा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है जिनमें अपराध का मकसद साबित करना बेहद जरूरी है। पुलिस ने आरोपों को साबित करने के लिए 1399 लोगों को गवाह बनाया था।
अदालत ने कहा अभियोजन का आरोप था कि ऑपरेशन ब्लू स्टार व नवंबर 1984 के बदला लेने तथा दहशत फैलाने के मकसद से इन धमाकों को अंजाम दिया गया था लेकिन यह साबित नहीं कर पाया कि किसी आरोपी को कोई परिजन, संबंधी या मित्र उस ऑपरेशन या सिख विरोधी दंगों में मारा गया था।
पुलिस को सूचना मिली थी कि पश्चिम दिल्ली में करतार सिंह नांरग के घर पर ट्रांजिस्टर बम बनाए जाते हैं। इस सूचना पर पुलिस ने 12 मई 1985 को पुलिस ने छापा मार कर नारंग, उसके सहयोगी मोहिंदर सिंह ऑबरोय, मनमोहन सिंह खालसा को को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने इनके कब्जे से बम, बारूद, बिजली का सामान, पिस्टल व लोहे के सरिये बरामद किए थे। मनमोहन सिंह खालसा की पूछताछ के दौरान पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी।