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World Environment Day : क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा... राजधानी दिल्ली को प्रदूषण ने घेरा

Sun, 05 Jun 2022 04:54 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 05 Jun 2022 04:54 AM IST
सार

माना जाता है कि इन्हीं पांच तत्वों से हम सबका शरीर बना है और सारा ब्रह्मांड भी इन्हीं की देन है। इनको मिलाकर पंचमहाभूत कहा गया है। जब तक इनमें संतुलन है, तभी तक धरती पर जीवन है, लेकिन आज मूल तत्व ही असंतुलित हैं। नतीजतन, पूरी दुनिया में प्राकृतिक आपदाओं की बाढ़ है।

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This report examines what is the state of the environment in Delhi
पर्यावरण के लिए घातक है इस तरह की आगजनी... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

क्षिति मतलब धरती, जल यानी पानी, पावक मतलब अग्नि, गगन मतलब आकाश और समीर यानी हवा। माना जाता है कि इन्हीं पांच तत्वों से हम सबका शरीर बना है और सारा ब्रह्मांड भी इन्हीं की देन है। इनको मिलाकर पंचमहाभूत कहा गया है। जब तक इनमें संतुलन है, तभी तक धरती पर जीवन है, लेकिन आज मूल तत्व ही असंतुलित हैं। नतीजतन, पूरी दुनिया में प्राकृतिक आपदाओं की बाढ़ है। भारत और राजधानी दिल्ली भी इससे अछूती नहीं। अलग-अलग तरह के कचरे से धरती खराब है और नुकसानदेह गैसों से हवा, पानी, आसमान भी। तापमान भी रिकॉर्ड कायम कर रहा है। गर्मी ने इस बार तो लोगों को बेहाल कर दिया है। आज बात पांच तत्वों, इनको खराब करने वाले कारकों और इसे बेहतर करने के पांच-पांच तरीकों पर। विश्व पर्यावरण दिवस पर संतोष कुमार की विशेष रिपोर्ट...

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पृथ्वी
सूक्ष्म जीवाणु, केंचुआ व दीमक जैसे जीव मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं, लेकिन प्लास्टिक समेत हर तरह के कचरे ने इनको नुकसान पहुंचाया है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता खराब हुई है।
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जल
यमुना नदी का करीब दो फीसदी हिस्सा दिल्ली की सीमा छूता है, लेकिन नदी में करीब 80 फीसदी प्रदूषण देश की राजधानी से होता है। वहीं, जमीन के अंदर के पानी के दोहन से दक्षिणी दिल्ली समेत दूसरे कई इलाकों का भूजल रेड श्रेणी में है। मतलब, यहां धरती के अंदर का पानी भी बेहद कम हो गया है।
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आग
आग लगने से प्रदूषण बढ़ता है। कार्बन डाइऑक्साइड समेत दूसरी ग्रीन हाउस गैसों ने तापमान भी बढ़ाया है। स्थानीय स्तर पर दैनिक तापमान के सामान्य औसत से कई इलाके दो से तीन डिग्री सेल्सियस ज्यादा गरम होते हैं। नतीजतन, इस साल अप्रैल व मई में रिकॉर्ड गरमी पड़ी।
आकाश
सल्फर व नाइट्रोजन के ऑक्साइड, ओजोन की बढ़ती मात्रा, धूल व धुएं के महीन कणों ने दिल्ली के आसमान को ढक सा रखा है। इससे कई बार पहली बारिश अम्लीय बारिश में तब्दील हो जाती है। वहीं, सड़क पर दूर तक देख पाना संभव नहीं होता।  
वायु
गैसों और धूल के कणों ने दिल्ली की हवा को भी दमघोंटू बना दिया है। सर्दियों में अमूमन दिल्ली की हवा खतरनाक स्तर तक प्रदूषित रहती है, जबकि गर्मियों में भी इसकी गुणवत्ता खराब से बेहद खराब बनी रहती है।     

विशेषज्ञों की राय
धरती की उर्वरता को बनाए रखने के लिए पहले तो जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। साथ ही, जैविक खाद का ज्यादा इस्तेमाल हो। हरी खाद के तौर पर ढैंचा के बीज की बुआई की जा सकती है। इसके अगले तीन साल तक बुआई करने की आवश्यकता नहीं होती है। वहीं, धरती में मौजूद जीवाणुओं को भी नुकसान नहीं पहुंचता है। सरकार को तय करना चाहिए कि सभी उद्योगों से निकलने वाला गंदा पानी शोधित होकर निकले। 
- डॉ. एसके त्यागी, पूर्व अतिरिक्त निदेशक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

पंचभूतों से पर्यावरण भी बना है। गाड़ियों के धुएं से लेकर बिजली उत्पादन व सड़कों पर जलने वाले कचरे के पीछे आग ही है। आसमान में सल्फर व नाट्रोजन ऑक्साइड की वजह से कई बार अम्लीय बारिश होती है। ऐसे में पर्यावरण को बचाने की जरूरत है। इसके लिए हमें वाहनों का उपयोग कम से कम करने के साथ कार्बन उत्सर्जन को भी कम करना होगा। तभी हवा को साफ किया जा सकता है। 
- डॉ. दीपांकर साहा, पूर्व अतिरिक्त निदेशक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

यदि हमें जल संकट से उबरना है तो तालाबों के संरक्षण के साथ वर्षा जल संचयन करना होगा। साथ ही, निर्मित नम भूमि की आवश्यकता होगी। इनमें पानी को साफ किया जा सकता है। इस वक्त दिल्ली में कालिंदी जैव विविधता पार्क में दो निर्मित नम भूमियां बनी हैं। तालाबों में इन-सीटू उपचार तकनीक का इस्तेमाल कर 20 से 30 एमएलडी पानी को साफ किया जा सकता है। वहीं, जल प्रदूषण रोकने के लिए हमें सीवेज शोधित संयंत्रों पर भी काम करने की आवश्यकता है।
- प्रो. सीआर बाबू, प्रभारी, जैव विविधता पार्क, दिल्ली विकास प्राधिकरण

जल संरक्षण के लिए हमें अपने घरों, स्कूल-कॉलेजों व कार्यालयों से शुरुआत करनी होगी। इसके लिए दैनिक कार्यों में इस्तेमाल किए जाने वाले पानी के उपयोग को कम करना होगा। उदाहरण के तौर पर शौचालय में पूरा फ्लश के बजाय आधा फ्लश बटन का उपयोग, सप्ताह में एक बार और अधिक कपड़े होने पर ही वॉशिंग मशीन का इस्तेमाल, नहाने में कम से कम पानी का उपयोग व आरओ से निकलने वाले पानी का अन्य कामों में उपयोग करके भी काफी मात्रा में पानी को बचाया जा सकता है। 
- भुवन भास्कर, पर्यावरणविद

दिल्ली समेत पूरे देश में जो चरम मौसमी दशाएं दिख रही हैं, अचानक से एक जगह पर तेज बारिश होने, तूफान आने, ठंड पड़ने के मामले जिस तरह बढ़ रहे हैं, उनके पीछे की मूल वजह वैश्विक तापमान है। पूरी दुनिया में धरती का तापमान बढ़ रहा है। बीते नवंबर महीने में ग्लासगो सम्मेलन में इसको लेकर पूरी दुनिया ने चिंता जाहिर की है। इससे बचने के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों पर हमें निर्भर होना पड़ेगा। वहीं, जल, जंगल व जमीन को बचाए रखने की कोशिश करनी होगी।      
- प्रशांत गुंजन, पर्यावरणविद, इकोस्फेयर

राजधानी में पांच तत्वों को खराब करने वाले ये हैं कारक
कचरा

  • दिल्ली में रोजाना करीब 12,350  टन ठोस कचरा निकलता है। 2041 में 18,915 टन होने की संभावना।
  • हर दिन लगभग 3,268 मिलियन टन सीवरेज निकलता है।
  • रोजाना करीब 689.8    टन प्लास्टिक वेस्ट निकलता है।
  • 1,912 औद्योगिक इकाइयों से सालाना ई-वेस्ट समेत दूसरे खतरनाक कचरे के मात्रा रहती है 2,683 मीट्रिक टन।
  • प्रतिदिन करीब 2,500 टन बायो मेडिकल वेस्ट।
  • 18 नालों से यमुना नदी में रोजाना 3,026 मिलियन गैलन अपशिष्ट गिरता है।


गैस और धूल के कण

  • पल्ला से ओखला तक नदी के पानी में घुली 9.54 आक्सीजन की मात्रा 9.54 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से .08 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक।
  • हवा में घुलते धूल के महीन कण पीएम2.5, 2021 में इसका सालाना औसत 133 माइक्रो ग्राम प्रति घर मीटर। इसमें वाहनों की हिस्सेदारी 41 फीसदी, जबकि उद्योग 18.6, ऊर्जा 4.9, निर्माण स्थलों, सड़कों समेत दूसरी जगहों से निकलने वाले धूल का हिस्सा 21.5 फीसदी है।
  • पीएम10 का सालाना औसत 2008 के 201 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर से बढ़कर 2017 में 263 पर पहुंचा। 2021 का आंकड़ा 221 पर।
  • 2008 के सालाना औसत 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से 2017 में SO2 की मात्रा हुई 23.36 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर। 2021 में आंकड़ा 12.79 पर।. इस बीच NO2 की मात्रा 43.3 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से 74.05 घन मीटर रही। 2021 का आंकड़ा 42.31 पर। 
  • बेंगलुरू, हैदराबाद व चेन्नई को मिलाकर जितनी CO2 निकलती है, दिल्ली में उससे ज्यादा निकलती है। मात्रा हर साल 69.4 मिलियन टन।


नोट : सभी आंकड़े दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति, दिल्ली सरकार की आर्थिक समीक्षा 2020-21 और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट से लिए गए हैं।

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