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Delhi News: विभाजन विभीषिका तमस- जब मंच पर इतिहास ने चीख मारी
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विभाजन विभीषिका तमस- जब मंच पर इतिहास ने चीख मारी
-स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने विभाजन विभीषिका तमस को मंच पर उतारा
ज्योति सिंह
नई दिल्ली। शहर में चील मंडराएगी... घर में रखे तेलों को गर्म कर दो... अरे देखो जरा ये हिन्दुओं का मोहल्ला तो नहीं...। पूरा ऑडिटोरियम शांत था, हाथों के महीन रोम उठ खड़े हुए, हथेलियां तालियों में तब्दील होने की बजाय शांत थी, लफ्ज खामोश थे। इस बार बेहतरीन मंजन को तालियों से नहीं बल्कि खामोशी से नवाजा गया था। बिल्कुल वैसे ही जैसे अति प्रसन्नता से हंसी नहीं आंसू निकलते हैं। मंच पर कलाकारों की चाल में विभाजन से पहले की तमस और आंखों में तैरती बौखलाहट दर्शकों की आंखों को घूर रही थी।
बृहस्पतिवार को स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने विभाजन विभीषिका तमस को मंच पर उतारा और मंच ने जैसे इतिहास का सबसे काला पन्ना खोल दिया हो। भीष्म साहनी के कालजयी ‘तमस’ से जन्मा यह नाटक सिर्फ कहानी नहीं कहता, यह 1947 का वो रक्तरंजित दृश्य जिंदा करता है, जहां धरती लाल हो गई थी, आसमान धुएं से भर गया था, और इंसानियत लहूलुहान पड़ी थी। लाखों की लाशें, करोड़ों का विस्थापन और असंख्य स्त्रियों की चीखें, यह सब अभिमंच की रोशनी और अंधेरे में यूं तैरता है मानो समय फिर वहीं लौट आया हो।
नाटक में धर्मों के बीच पनपे तनाव को दिखाया गया। जैसे विश्वास जब अति हो तो वो विषाद बन जाता है, और इस नाटक मेंं यह विषाद धर्म को ठेस पहुंचाने पर पैदा हुआ था। किस तरीके से ब्रिटिश शासन और कुछ लोगों ने सत्ता के लालच में दो धर्म की आस्था को बीच में लाकर दंगों को जन्म दिया। इन दंगों में सिर्फ पत्नियों ने अपने पतियों को ही नहीं खोया बल्कि बीबियों ने अपने शौहर भी खोए। जहां हिन्दुओं के बच्चे अनाथ हुए तो वहीं मुस्लिमों की औलादें भी यतीम हुईं। खून से मंदिर हो या मस्जिद सब लाल हुए क्योंकि दंगे धर्म नहीं देखती, बल्कि लहू देखती है।
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निर्देशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने इस नाटक के जरिए दर्शाया कि नफरत की आग, धार्मिक पागलपन और सत्ता की भूख, जो कभी पड़ोसी को दुश्मन बना देती थी, आज भी किसी कोने में सुलग रही है। संत कबीर के दोहे, अटल बिहारी वाजपेयी और फैज़ की पंक्तियां, जैसे जख्म पर नमक और मरहम दोनों एक साथ रख देती हैं। दर्शक चुप बैठे रहे, कुछ की आंखें नम थीं, कुछ की सांसें भारी। यह सिर्फ नाटक नहीं था, यह उन आत्माओं का शोकगीत था जिनकी कहानियां इतिहास ने भावनाओं को ठेस के नाम पर मिटा दीं।
नाटक के अंत में अटल बिहारी वाजपेयी की लिखित पंक्तियां- जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था... से यह नाटक खत्म होता है।
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-स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने विभाजन विभीषिका तमस को मंच पर उतारा
ज्योति सिंह
नई दिल्ली। शहर में चील मंडराएगी... घर में रखे तेलों को गर्म कर दो... अरे देखो जरा ये हिन्दुओं का मोहल्ला तो नहीं...। पूरा ऑडिटोरियम शांत था, हाथों के महीन रोम उठ खड़े हुए, हथेलियां तालियों में तब्दील होने की बजाय शांत थी, लफ्ज खामोश थे। इस बार बेहतरीन मंजन को तालियों से नहीं बल्कि खामोशी से नवाजा गया था। बिल्कुल वैसे ही जैसे अति प्रसन्नता से हंसी नहीं आंसू निकलते हैं। मंच पर कलाकारों की चाल में विभाजन से पहले की तमस और आंखों में तैरती बौखलाहट दर्शकों की आंखों को घूर रही थी।
बृहस्पतिवार को स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने विभाजन विभीषिका तमस को मंच पर उतारा और मंच ने जैसे इतिहास का सबसे काला पन्ना खोल दिया हो। भीष्म साहनी के कालजयी ‘तमस’ से जन्मा यह नाटक सिर्फ कहानी नहीं कहता, यह 1947 का वो रक्तरंजित दृश्य जिंदा करता है, जहां धरती लाल हो गई थी, आसमान धुएं से भर गया था, और इंसानियत लहूलुहान पड़ी थी। लाखों की लाशें, करोड़ों का विस्थापन और असंख्य स्त्रियों की चीखें, यह सब अभिमंच की रोशनी और अंधेरे में यूं तैरता है मानो समय फिर वहीं लौट आया हो।
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नाटक में धर्मों के बीच पनपे तनाव को दिखाया गया। जैसे विश्वास जब अति हो तो वो विषाद बन जाता है, और इस नाटक मेंं यह विषाद धर्म को ठेस पहुंचाने पर पैदा हुआ था। किस तरीके से ब्रिटिश शासन और कुछ लोगों ने सत्ता के लालच में दो धर्म की आस्था को बीच में लाकर दंगों को जन्म दिया। इन दंगों में सिर्फ पत्नियों ने अपने पतियों को ही नहीं खोया बल्कि बीबियों ने अपने शौहर भी खोए। जहां हिन्दुओं के बच्चे अनाथ हुए तो वहीं मुस्लिमों की औलादें भी यतीम हुईं। खून से मंदिर हो या मस्जिद सब लाल हुए क्योंकि दंगे धर्म नहीं देखती, बल्कि लहू देखती है।
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निर्देशक चित्तरंजन त्रिपाठी ने इस नाटक के जरिए दर्शाया कि नफरत की आग, धार्मिक पागलपन और सत्ता की भूख, जो कभी पड़ोसी को दुश्मन बना देती थी, आज भी किसी कोने में सुलग रही है। संत कबीर के दोहे, अटल बिहारी वाजपेयी और फैज़ की पंक्तियां, जैसे जख्म पर नमक और मरहम दोनों एक साथ रख देती हैं। दर्शक चुप बैठे रहे, कुछ की आंखें नम थीं, कुछ की सांसें भारी। यह सिर्फ नाटक नहीं था, यह उन आत्माओं का शोकगीत था जिनकी कहानियां इतिहास ने भावनाओं को ठेस के नाम पर मिटा दीं।
नाटक के अंत में अटल बिहारी वाजपेयी की लिखित पंक्तियां- जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था... से यह नाटक खत्म होता है।