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Delhi: दिल्ली में हर पांच में से एक बच्चे को चश्मा लगाना मजबूरी, स्क्रीनिंग समय बढ़ने से रोशनी हो रही प्रभावित

Tue, 10 Mar 2026 05:45 AM IST
Digvijay Singh अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Tue, 10 Mar 2026 05:45 AM IST
सार

मोबाइल, टीवी सहित दूसरे डिवाइस पर स्क्रीनिंग समय बढ़ने के चलते लोगों की आंखों की रोशनी प्रभावित हो रही है। दिल्ली में 30 फीसदी लोगों को चश्मे की जरूरत है।

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One in five children in Delhi is forced to wear glasses with increased screening time affecting vision in Delh
दिल्ली एम्स - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मोबाइल, टीवी सहित दूसरे डिवाइस पर स्क्रीनिंग समय बढ़ने के चलते लोगों की आंखों की रोशनी प्रभावित हो रही है। दिल्ली में 30 फीसदी लोगों को चश्मे की जरूरत है। यानी आबादी के हिसाब से करीब 60 लाख लोग दृष्टि दोष या प्रेसबायोपिया(उम्र के अनुसार होने वाली दृष्टि परेशानी) की समस्या से जूझ रहे है। यह जानकारी एम्स के डॉ. आरपी सेंटर के एक शोध में सामने आई है। 

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सोमवार को प्रेस वार्ता में एम्स के सामुदायिक नेत्र विज्ञान विभाग के प्रभारी और प्रोफेसर प्रवीण वशिष्ठ ने बताया कि 50 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों में 70 फीसदी को चश्मे की आवश्यकता है। स्कूल जाने वाले बच्चों में मायोपिया दृष्टि दोष सर्वाधिक देखा गया है। दिल्ली में 13.1 फीसदी बच्चे मायोपिया से प्रभावित है। हर पांच में से एक बच्चे को चश्मे की जरूरत है। यानी 20 फीसदी बच्चों को चश्मे लगाने की आवश्यकता है। इस प्रेस वार्ता में प्रोफेसर भावना चावला और डॉ. मनदीप सहित कई दूसरे डॉक्टर शामिल रहे।
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सिर्फ 50 केंद्रों पर आंखों की देखरेख की सुविधा 
शोध में सामने आया कि 59.8 फीसदी लोग दूर की दृष्टि और 47.1 फीसदी नजदीक दृष्टि की समस्या से प्रभावित है। दिल्ली में 249 नेत्र देखरेख संस्थान है। इसमें 77.5 फीसदी निजी तौर पर संचालित होते है। 1085 नेत्र रोग विशेषज्ञ और ऑप्टोमेट्रिस्ट की संख्या 489 है जो विश्व स्वास्थ्य संगठनों के दिशा-निर्देशों के अनुसार कम है।  दिल्ली में 270 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है जिसमें 50 में आंखों की देखरेख की सुविधा है। 
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त्रिलोकपुरी में दृष्टि जांच का नेतृत्व कर रही आशा वर्कर
एम्स ने पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी में बड़े स्तर पर प्रेसबायोपिया कार्यक्रम का शुभारंभ किया है। इसमें आशा वर्कर प्राथमिक नेत्र देखभाल को मजबूत करने के लिए समुदाय-आधारित दृष्टि जांच का नेतृत्व कर रही हैं। इसके तहत 2085 घरों को कवर कर लिया गया है। सात हजार से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है। 401 लोगों को जांच के लिए रेफर किया गया है। सामुदायिक तौर पर जरूरतमंदों को चश्मे भी वितरित किए। 

एआई से होगी ग्लूकोमा की जांच 
एम्स के डॉ. आरपी सेंटर में प्रोफेसर तनुज दादा ने बताया कि काला मोतियाबिंद(ग्लूकोमा) की जांच के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है। इसमें एक क्लिक में मरीज के ग्लूकोमा के बारे में पता चल जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय के सहयोग से दो माह में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर एआई से ग्लूकोमा की जांच की व्यवस्था लागू कर दी जाएगी। फिर देशभर में इस योजना को लागू किया जाएगा।  

90 फीसदी ग्लूकोमा को लेकर अंजान
प्रोफेसर तनुज दादा ने कहा कि 90 फीसदी लोग ग्लूकोमा को लेकर अंजान होते है। 40 साल से अधिक उम्र वालों को साल में दो बार ग्लूकोमा की जांच करानी चाहिए जबकि 60 वर्ष से अधिक उम्र वालों को हर साल यह जांच करानी चाहिए। मधुमेह, ब्लड प्रेशर, स्टेरॉयड क्रीम व दवा के इस्तेमाल से भी ग्लूकोमा होता है। इसके लिए भी जांच जरूरी है। शोध में सामने आया कि योग और ध्यान ग्लूकोमा के उपचार में कारगर हैं।  


मधु नेत्र एआई मंच से रेटिनोपैथी की हो रही स्क्रीनिंग
सेंटर की उपलब्धियों के बारे में प्रोफेसर राजपाल ने बताया कि रेटिना संबंधी बीमारियों के उपचार और शोध के क्षेत्र में कई नई पहलें की जा रही हैं। यहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रीजेनरेटिव मेडिसिन और नई दवाओं पर महत्वपूर्ण शोध चल रहा है, जिससे भविष्य में आंखों की गंभीर बीमारियों के उपचार की नई संभावनाएं खुल सकती हैं। इसमें मधु नेत्र एआई मंच प्रमुख है। 

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