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ग्राउंड रिपोर्ट: दिल्ली-एनसीआर में गैर कोविड मरीजों को नहीं मिल रहा इलाज, ओपीडी बंद

Tue, 27 Apr 2021 01:10 AM IST
नोएडा ब्यूरो परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नोएडा ब्यूरो Updated Tue, 27 Apr 2021 01:10 AM IST
सार

दिल्ली-एनसीआर में गैर कोविड मरीजों को अपना इलाज करने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा रहा है। अधिकतर अस्पतालों के ओपीडी बंद कर दिए गए हैं। 

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Non-Kovid patients are not getting treatment in Delhi-NCR
मरीज - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली के सरिता विहार निवासी मोहम्मद जुबैर इसी साल जनवरी माह में टीबी संक्रमित पाए गए थे। उनका उपचार राजन बाबू टीबी अस्पताल से चल रहा था, लेकिन इस माह के पहले सप्ताह से वे उपचार के लिए भटक रहे हैं। अस्पताल में 60 बिस्तरों को कोविड विशेष घोषित किया गया है। उन्हें ओपीडी में भी चिकित्सीय परामर्श नहीं मिल पा रहा है। करीब दो सप्ताह इधर-उधर भटकने के बाद उन्हें दक्षिणी दिल्ली में ही एक निजी टीबी केंद्र पर जाकर उपचार लेना पड़ा। यहां उनके जैसे अन्य मरीजों की भीड़ भी काफी है।

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ठीक इसी तरह, लक्ष्मी नगर निवासी 64 वर्षीय आशा सचदेवा मधुमेह, उच्च रक्तचाप के साथ दिल की मरीज भी हैं। पिछले साल ही जीबी पंत अस्पताल में उनका ऑपरेशन हुआ था। अभी हालत ऐसी है कि उन्हें जीबी पंत अस्पताल में ओपीडी नहीं मिल पाई और दवाएं भी बाजार में बड़ी मुश्किल से मिल रही हैं। इकोस्प्रिन तक उन्हें लक्ष्मी नगर की ही आठ दुकानों पर पूछताछ के बाद सफदरजंग अस्पताल के पास जाकर मिलीं। उधर, गाजियाबाद के इंदिरापुरम निवासी 42 वर्षीय विवेक वर्मा को हार्ट अटैक के बाद दिल्ली लाया गया। उनके भाई सुभाष ने बताया कि आठ अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद भी उन्हें भर्ती नहीं किया गया तो उन्हें सोनीपत में जाकर भर्ती होना पड़ा।
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यह स्थिति सिर्फ एक-दो मरीजों की नहीं, बल्कि ज्यादातर गैर कोरोनो मरीजों की है, जिन्हें किडनी, लिवर, कैंसर, दिल आदि से जुड़ी गंभीर बीमारियां हैं। उन्हें दिल्ली के ज्यादातर बड़े अस्पतालों में ओपीडी नहीं मिल पा रही है। इन्हें कोविड संक्रमण का खतरा भी सबसे ज्यादा है। इसके बावजूद मजबूरी में अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। कहीं ओपीडी सेवा है भी तो इन्हें दवाओं के लिए काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
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नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल का कहना है कि देश के किसी भी राज्य में स्वास्थ्य सेवा प्रभावित होना गंभीर संकेत होता है। गैरकोविड मरीजों का उपचार और सुरक्षा उतनी ही जरूरी है, जितना कोविड संक्रमण। पहले से बीमार लोगों के सामने संक्रमण के संपर्क में आने से बचने की भी चुनौती है। इसलिए लोगों को टेलीमेडिसिन के प्रति जागरूक रहना चाहिए। हालांकि, डॉ. पॉल की यह सलाह फिलहाल अधिक असरदार साबित नहीं हो रही है। केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष ई संजीवनी वेबसाइट शुरू की थी, जिससे केवल लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज ही जुड़ा है। दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद आदि एनसीआर के शहरों में गैरकोविड मरीजों के लिए एक जैसे ही हालात हैं।

इसी तरह का मामला नोएडा सेक्टर-12 निवासी महेंद्र विश्वकर्मा का है। नई दिल्ली स्थित आरएमएल अस्पताल में किडनी का उपचार करा रहे महेंद्र डायलिसिस के लिए यहां आते हैं। दो दिन पहले वह आरएमएल अस्पताल पहुंचे तो उन्हें डायलिसिस कराने में पहले से काफी ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा।

कोरोना से बचने के लिए पहले से बीमार मरीजों को टेलीमेडिसिन का इस्तेमाल करने को कहा जा रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि दिल्ली और एनसीआर के अधिकतर वरिष्ठ डॉक्टर इन दिनों कोविड मरीजों की सेवा में जुटे हैं। इनके लिए 14 घंटे ड्यूटी करने के बाद अलग से टेलीमेडिसिन पर सलाह देना मुश्किल हो रहा है। लोकनायक अस्पताल के डॉ. विवेक का कहना है कि टेलीमेडिसिन सुविधा समय के अनुरूप बहुत जरूरी है, लेकिन इसके लिए डॉक्टर भी तो हों। आम तौर पर मरीज उसी डॉक्टर के पास फॉलोअप में यकीन रखता है, जिससे उसका इलाज चल रहा हो।


जीटीबी अस्पताल के डॉ. अरुण कुुमार का कहना है कि टेलीमेडिसिन को लेकर जागरूकता की जरूरत है। देश में हर कोई इंटरनेट फ्रेंडली नहीं है। हो सकता है कि आधे से ज्यादा लोगों को ईमेल या वीडियो कॉल के साथ इलाज के दस्तावेज अपलोड करने का तरीका न पता हो। यह स्थिति तब और ज्यादा गंभीर हो जाती है, जब पहले से बीमार मरीजों की चर्चा की जाए, क्योंकि उनमें 80 से 90 फीसदी 50 या उससे अधिक आयु के हैं।

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