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नहीं बदला सरकार में सिख-पंजाबियों का दबदबा
नवनीत श्ारण्ा/ नई दिल्ली
Updated Fri, 15 Nov 2013 01:35 AM IST
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दिल्ली बदली है, लेकिन अब भी सिख-पंजाबियों का दिल्ली की राजनीति में दबदबा कायम है।
डेढ़ दर्जन से अधिक सीटों पर बदले परिसीमन के बावजूद सिख-पंजाबी समुदाय जीत-हार तय करने की स्थिति में हैं।
लिहाजा इस समुदाय के नेताओं को दोनों प्रमुख पार्टियां भी चुनावी अखाड़े में उतारती रही हैं।
करीब एक दर्जन सीटों से इस समुदाय के लोग चारों विधानसभा में जीत दर्ज करा चुके हैं। वहीं, आधा दर्जन से अधिक क्षेत्रों में तीन व दो बार जीत दर्ज कर दिल्ली विधानसभा में पहुंचे हैं।
भले ही राजधानी में आधी से ज्यादा आबादी प्रवासी वर्ग की है, लेकिन विधानसभागठन से ही सिख व पंजाबी प्रत्याशी बड़ी संख्या में चुनावी अखाड़े में उतरते हैं।
चुनाव जीत कर पहुंचने वाले कई विधायक भी इसी वर्ग विशेष से होते हैं। कैबिनेट में भी 50 प्रतिशत सिख-पंजाबी समाज से ही विधायक होते हैं।
दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना इनके बाद सुषमा स्वराज हो या तीन बार की कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सभी पंजाबी समुदाय से ही है।
विधानसभा के गठन के साथ ही प्रमुख पार्टियां पंजाबी-सिख प्रत्याशियों पर विश्वास करती रही हैं। लिहाजा 70 विधानसभा में 25-30 से अधिक उम्मीदवारों को प्रमुख पार्टियां टिकट देती रही हैं।
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ये बात अलग है कि 2003 में पंजाबी-खत्री नौ प्रतिशत ही थे। पिछले विधानसभा चुनाव में ढाई दर्जन उम्मीदवार मैदान में थे तो इस बार पूरी सूची आने के बाद करीब इतने ही प्रत्याशी होंगे।
हालांकि इस बार गुर्जर, जाट और पूर्वांचलियों को अहम मानते हुए राजनीतिक पार्टियों ने दो दर्जन के करीब उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।
पिछला चुनावी आंकड़ा
विधानसभा चुनावों केनतीजे को भी अगर देखा जाए तो 1993 में करीब 15 सिख-पंजाबी उम्मीदवार जीत कर विधानसभा पहुंचे थे।
1998 में इनकी संख्या में इजाफा हुआ और विधानसभा पहुंचने वालों की संख्या 20 तक पहुंच गई।
इसी तरह 2003 के चुनाव में भी इस समुदाय के 17 विधायक जीत कर पहुंचे थे। चौथी विधानसभा में भी कमोबेश इतना ही प्रतिनिधित्व था।
विधानसभा में इस समुदाय का इतिहास
प्रथम मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना बने। खुराना के कैबिनेट में हरशरण सिंह बल्ली व प्रो. जगदीश मुखी मुख्य थे।
भाजपा से सुषमा स्वराज भी पंजाबी समुदाय से ही मुख्यमंत्री रही।
इसी तरह दूसरे विधानसभा (1998) में शीला दीक्षित के कैबिनेट में डॉ. एके वालिया और महेंद्र सिंह थे और तीसरे विधानसभा (2003) में डॉ. एके वालिया व अरविंदर सिंह लवली कैबिनेट मंत्री थे।
चौथी विधानसभा (2008) में अरविंदर सिंह लवली, एके वालिया और किरण वालिया इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
इस चुनाव मे बीजेपी के प्रमुख पंजाबी-सिख उम्मीदवार-अजय मल्होत्रा (ग्रेटर कैलाश), राजीव बब्बर (तिलक नगर), प्रो. जगदीश मुखी (जनकपुरी), सुभाष सचदेवा (मोतीनगर), आरती मेहरा (मालवीय नगर), रजनी अब्बी (तिमारपुर), राजेंद्र नगर (आरपी सिंह), मनजिंदर सिंह सिरसा (राजौरी गार्डन अकाली गठबंधन), शाहदरा (जितेंद्र सिंह शंटी), हरमीत कालका (कालकाजी)।
कांग्रेस के प्रमुख पंजाबी-सिख उम्मीदवार
सुरेंद्र पाल सिंह बिट्टू (तिमारपुर), प्रह्लाद सिंह साहनी (चांदनी चौक), उत्तमनगर (मुकेश शर्मा), किरण वालिया (मालवीय नगर), तरविंदर सिंह मारवाह (जंगपुरा), एके वालिया (लक्ष्मीनगर), अरविंदर सिंह लवली (गांधीनगर), हरशरण सिंह बल्ली (हरिनगर)।
पंजाबी-सिख प्रतिशत
हरिनगर-64 प्रतिशत, मोतीनगर 40 प्रतिशत, तिलक नगर 65 प्रतिशत, कालकाजी-40 प्रतिशत, लक्ष्मीनगर-21 प्रतिशत, गांधीनगर-28 प्रतिशत, राजौरी गार्डन में 35 प्रतिशत, राजेंद्र नगर-35 प्रतिशत, करोल बाग-26 प्रतिशत, ग्रेटर कैलाश 16 प्रतिशत, पटेल नगर-18 प्रतिशत, जंगपुरा-22 प्रतिशत, कस्तूरबा नगर-22 प्रतिशत, मॉडल टाऊन 14 प्रतिशत, मालवीय नगर 22 प्रतिशत, तिमारपुर में 14 प्रतिशत, आदर्श नगर 17 प्रतिशत, नांगलोई जट-14 प्रतिशत, रोहिणी-10 प्रतिशत, विकासपुरी 16 प्रतिशत (इन सभी इलाके में 5-15 प्रतिशत सिख मतदाता भी हैं)।
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डेढ़ दर्जन से अधिक सीटों पर बदले परिसीमन के बावजूद सिख-पंजाबी समुदाय जीत-हार तय करने की स्थिति में हैं।
लिहाजा इस समुदाय के नेताओं को दोनों प्रमुख पार्टियां भी चुनावी अखाड़े में उतारती रही हैं।
करीब एक दर्जन सीटों से इस समुदाय के लोग चारों विधानसभा में जीत दर्ज करा चुके हैं। वहीं, आधा दर्जन से अधिक क्षेत्रों में तीन व दो बार जीत दर्ज कर दिल्ली विधानसभा में पहुंचे हैं।
भले ही राजधानी में आधी से ज्यादा आबादी प्रवासी वर्ग की है, लेकिन विधानसभागठन से ही सिख व पंजाबी प्रत्याशी बड़ी संख्या में चुनावी अखाड़े में उतरते हैं।
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चुनाव जीत कर पहुंचने वाले कई विधायक भी इसी वर्ग विशेष से होते हैं। कैबिनेट में भी 50 प्रतिशत सिख-पंजाबी समाज से ही विधायक होते हैं।
दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना इनके बाद सुषमा स्वराज हो या तीन बार की कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सभी पंजाबी समुदाय से ही है।
विधानसभा के गठन के साथ ही प्रमुख पार्टियां पंजाबी-सिख प्रत्याशियों पर विश्वास करती रही हैं। लिहाजा 70 विधानसभा में 25-30 से अधिक उम्मीदवारों को प्रमुख पार्टियां टिकट देती रही हैं।
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ये बात अलग है कि 2003 में पंजाबी-खत्री नौ प्रतिशत ही थे। पिछले विधानसभा चुनाव में ढाई दर्जन उम्मीदवार मैदान में थे तो इस बार पूरी सूची आने के बाद करीब इतने ही प्रत्याशी होंगे।
हालांकि इस बार गुर्जर, जाट और पूर्वांचलियों को अहम मानते हुए राजनीतिक पार्टियों ने दो दर्जन के करीब उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।
पिछला चुनावी आंकड़ा
विधानसभा चुनावों केनतीजे को भी अगर देखा जाए तो 1993 में करीब 15 सिख-पंजाबी उम्मीदवार जीत कर विधानसभा पहुंचे थे।
1998 में इनकी संख्या में इजाफा हुआ और विधानसभा पहुंचने वालों की संख्या 20 तक पहुंच गई।
इसी तरह 2003 के चुनाव में भी इस समुदाय के 17 विधायक जीत कर पहुंचे थे। चौथी विधानसभा में भी कमोबेश इतना ही प्रतिनिधित्व था।
विधानसभा में इस समुदाय का इतिहास
प्रथम मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना बने। खुराना के कैबिनेट में हरशरण सिंह बल्ली व प्रो. जगदीश मुखी मुख्य थे।
भाजपा से सुषमा स्वराज भी पंजाबी समुदाय से ही मुख्यमंत्री रही।
इसी तरह दूसरे विधानसभा (1998) में शीला दीक्षित के कैबिनेट में डॉ. एके वालिया और महेंद्र सिंह थे और तीसरे विधानसभा (2003) में डॉ. एके वालिया व अरविंदर सिंह लवली कैबिनेट मंत्री थे।
चौथी विधानसभा (2008) में अरविंदर सिंह लवली, एके वालिया और किरण वालिया इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
इस चुनाव मे बीजेपी के प्रमुख पंजाबी-सिख उम्मीदवार-अजय मल्होत्रा (ग्रेटर कैलाश), राजीव बब्बर (तिलक नगर), प्रो. जगदीश मुखी (जनकपुरी), सुभाष सचदेवा (मोतीनगर), आरती मेहरा (मालवीय नगर), रजनी अब्बी (तिमारपुर), राजेंद्र नगर (आरपी सिंह), मनजिंदर सिंह सिरसा (राजौरी गार्डन अकाली गठबंधन), शाहदरा (जितेंद्र सिंह शंटी), हरमीत कालका (कालकाजी)।
कांग्रेस के प्रमुख पंजाबी-सिख उम्मीदवार
सुरेंद्र पाल सिंह बिट्टू (तिमारपुर), प्रह्लाद सिंह साहनी (चांदनी चौक), उत्तमनगर (मुकेश शर्मा), किरण वालिया (मालवीय नगर), तरविंदर सिंह मारवाह (जंगपुरा), एके वालिया (लक्ष्मीनगर), अरविंदर सिंह लवली (गांधीनगर), हरशरण सिंह बल्ली (हरिनगर)।
पंजाबी-सिख प्रतिशत
हरिनगर-64 प्रतिशत, मोतीनगर 40 प्रतिशत, तिलक नगर 65 प्रतिशत, कालकाजी-40 प्रतिशत, लक्ष्मीनगर-21 प्रतिशत, गांधीनगर-28 प्रतिशत, राजौरी गार्डन में 35 प्रतिशत, राजेंद्र नगर-35 प्रतिशत, करोल बाग-26 प्रतिशत, ग्रेटर कैलाश 16 प्रतिशत, पटेल नगर-18 प्रतिशत, जंगपुरा-22 प्रतिशत, कस्तूरबा नगर-22 प्रतिशत, मॉडल टाऊन 14 प्रतिशत, मालवीय नगर 22 प्रतिशत, तिमारपुर में 14 प्रतिशत, आदर्श नगर 17 प्रतिशत, नांगलोई जट-14 प्रतिशत, रोहिणी-10 प्रतिशत, विकासपुरी 16 प्रतिशत (इन सभी इलाके में 5-15 प्रतिशत सिख मतदाता भी हैं)।