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आत्मविश्वास व बागियों ने डुबोई नैया
New Delhi
Updated Sun, 15 Sep 2013 05:35 AM IST
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नई दिल्ली। डूसू चुनाव में मतदान तक 4-0 का दावा करने वाली एनएसयूआई के लिए एबीवीपी के लिए किया गया नकारात्मक प्रचार, भीतर घात व आत्मविश्वास भारी पड़ गया। रही सही कसर आइसा उम्मीदवारों ने पूरी कर दी। एनएसयूआई पर सबसे ज्यादा घाटा दो बागियों के चुनाव लड़ने से हुआ, जिसका खामियाजा उन्हें उपाध्यक्ष पद गंवा कर भुगतना पड़ा। एनएसयूआई बागियों को मनाने में कामयाब होती तो यह समीकरण दो-दो को हो सकता था। एनएसयूआई को ऐसे समय में झटका लगा, जब विधानसभा चुनाव सिर पर है।
इस साल भी एनएसयूआई 4-0 की जीत का दावा कर रही थी, लेकिन नामांकन से ही एनएसयूआई का खेल बिगड़ने लगा था। एनएसयूआई ने उपाध्यक्ष पद के लिए संदीप चौधरी को टिकट ना देकर कपिल शर्मा को चुना, जबकि सचिव पद के लिए कुसुम दहिया की जगह करिश्मा ठाकुर को तवज्जो दी गई। टिकट ना मिलने पर इन दोनों ने बागी के रूप में निर्दलीय चुनाव लड़ा। संदीप चौधरी ने उपाध्यक्ष पद पर एनएसयूआई के 4193 वोट काटे। यदि संदीप चौधरी मैदान में न होते तो ये वोट एनएसयूआई के खाते में जा सकते थे। इसी तरह सचिव पद पर भले ही एनएसयूआई की उम्मीदवार ने जीत दर्ज की हो, लेकिन यदि एनएसयूआई कुसुम दहिया को मना लेती तो जीत का अंतर अधिक हो सकता था। कुसुम दहिया ने एनएसयूआई के लगभग 4203 वोट काटे।
माना जा रहा है कि चार वर्षीय डिग्री प्रोग्राम को मुद्दा बनाते हुए आइसा मैदान में कूदी, जिसके कारण एनएसयूआई के काफी वोट कटे। आइसा की अध्यक्ष पद की उम्मीदवार अजंलि ने 8229 वोट हासिल किए। जहां आइसा व एबीवीपी ने शुरू से ही चार वर्षीय डिग्री प्रोग्राम को मुद्दा बनाए रखा, वहीं एनएसयूआई ने एफवाईयूपी को मुद्दा तो बनाया लेकिन इसे वापस लिए जाने की बजाए रिव्यू कराते रहने की बात की। चार वर्षीय डिग्री प्रोग्राम को लेकर छात्रों में काफी गुस्सा देखने को मिला, लेकिन एनएसयूआई इस पर चुप्पी साधे बैठी रही। वहीं, आइसा और एबीवीपी ने इस मौके पर भी छात्रों का साथ दिया और विरोध प्रदर्शन के जरिए छात्रों की बात प्रशासन तक पहुंचाई। एबीवीपी ने इन मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल कर छात्रों के बीच प्रचार किया। एबीवीपी के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार अमन अवाना को लेकर की गई निगेटिव पब्लिसिटी भी एनएसयूआई पर भारी पड़ गई। अमन के दो बच्चों के पिता के रूप के पोस्टर सोशल मीडिया में छाए रहे। एनएसयूआई का ओवर कॉन्फिडेंस उसे डूसू चुनाव में ले डूबा।
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इस साल भी एनएसयूआई 4-0 की जीत का दावा कर रही थी, लेकिन नामांकन से ही एनएसयूआई का खेल बिगड़ने लगा था। एनएसयूआई ने उपाध्यक्ष पद के लिए संदीप चौधरी को टिकट ना देकर कपिल शर्मा को चुना, जबकि सचिव पद के लिए कुसुम दहिया की जगह करिश्मा ठाकुर को तवज्जो दी गई। टिकट ना मिलने पर इन दोनों ने बागी के रूप में निर्दलीय चुनाव लड़ा। संदीप चौधरी ने उपाध्यक्ष पद पर एनएसयूआई के 4193 वोट काटे। यदि संदीप चौधरी मैदान में न होते तो ये वोट एनएसयूआई के खाते में जा सकते थे। इसी तरह सचिव पद पर भले ही एनएसयूआई की उम्मीदवार ने जीत दर्ज की हो, लेकिन यदि एनएसयूआई कुसुम दहिया को मना लेती तो जीत का अंतर अधिक हो सकता था। कुसुम दहिया ने एनएसयूआई के लगभग 4203 वोट काटे।
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माना जा रहा है कि चार वर्षीय डिग्री प्रोग्राम को मुद्दा बनाते हुए आइसा मैदान में कूदी, जिसके कारण एनएसयूआई के काफी वोट कटे। आइसा की अध्यक्ष पद की उम्मीदवार अजंलि ने 8229 वोट हासिल किए। जहां आइसा व एबीवीपी ने शुरू से ही चार वर्षीय डिग्री प्रोग्राम को मुद्दा बनाए रखा, वहीं एनएसयूआई ने एफवाईयूपी को मुद्दा तो बनाया लेकिन इसे वापस लिए जाने की बजाए रिव्यू कराते रहने की बात की। चार वर्षीय डिग्री प्रोग्राम को लेकर छात्रों में काफी गुस्सा देखने को मिला, लेकिन एनएसयूआई इस पर चुप्पी साधे बैठी रही। वहीं, आइसा और एबीवीपी ने इस मौके पर भी छात्रों का साथ दिया और विरोध प्रदर्शन के जरिए छात्रों की बात प्रशासन तक पहुंचाई। एबीवीपी ने इन मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल कर छात्रों के बीच प्रचार किया। एबीवीपी के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार अमन अवाना को लेकर की गई निगेटिव पब्लिसिटी भी एनएसयूआई पर भारी पड़ गई। अमन के दो बच्चों के पिता के रूप के पोस्टर सोशल मीडिया में छाए रहे। एनएसयूआई का ओवर कॉन्फिडेंस उसे डूसू चुनाव में ले डूबा।
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