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दिल्ली : वैसा दिखेगा जंतर-मंतर, जैसा सवाई जयसिंह ने दिया था रंग

Tue, 15 Feb 2022 05:48 AM IST
दुष्यंत शर्मा सीमा शर्मा, नई दिल्ली
सीमा शर्मा, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Tue, 15 Feb 2022 05:48 AM IST
सार

केंद्र सरकार संवारने की योजना पर कर रही काम; 1724 में करवाया था तैयार, शाम ढलते ही जगमगा उठेगा।

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Jantar Mantar will look like it was given by Sawai Jai Singh
जंतर मंतर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जंतर-मंतर की सूरत बदलने जा रही है। मध्यकालीन इतिहास और विज्ञान का अनूठा स्मारक अब अपने मूलरंग में नजर आएगा। यह कुछ वैसा ही दिखेगा, जैसा इसके निर्माता सवाई जयसिंह ने वर्ष 1724 में तैयार करवाया था।

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खूबसूरती इसकी वैश्विक इमारतों से टक्कर लेगी। लाइट यहां की अत्याधुनिक होगी। शाम ढलते ही यह स्मारक  चमकदार लाइटों से चमकेगा। अंदर की सड़कें भी बेहतरीन होंगी। पूरे परिसर में इसका अतीत उजागर करने वाले अत्याधुनिक और बहुभाषी साइनेज लगेंगे।
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केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीनस्थ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इसकी योजना तैयार की है। वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, जल्द ही इस इस प्रोजेक्ट को पूरा भी कर लिया जाएगा। कनॉट प्लेस में स्थित स्थापत्य कला का अद्वितीय नमूना ‘जंतर मंतर’ दिल्ली के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। यह एक वेधशाला है। इसमें 13 खगोलीय यंत्र लगे हुए हैं। इसकी डिजाइन राजा जयसिंह ने की थी। फ्रेंच लेखक ‘दे बोइस’ के अनुसार, राजा जयसिंह खुद अपने हाथों से इस यंत्रों के मोम के मोडल तैयार करते थे।
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रंग को लेकर अक्सर रहा विवाद
इतिहासकारों में अक्सर जंतर-मंतर के रंग को लेकर विवाद रहा है। एक पक्ष का कहना था कि इसका रंग (टमाटरी लाल) वैसा नहीं है, जैसा 1724 में निर्माण के दौरान था। दूसरा उसे सही कहता था। इसके चलते वर्षों से इस एतिहासिक इमारत का रखरखाव सही से नहीं हो पा रहा था। इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इतिहासकारों, वास्तुकारों की विशेषज्ञों की टीम ने वर्षों अध्ययन के बाद रंग की पहचान की। इसके बाद आखिरकार जंतर-मंतर का रंगरूप निखरने जा रहा है।

इमारत का इतिहास
दिल्ली का जंतर-मंतर एक खगोलीय वेधशाला है। गणित में दिलचस्पी होने की वजह से जयपुर के राजा सवाई जय सिंह ने जंतर-मंतर सहित चार अन्य वेधशालाओं का निर्माण करवाया था। दिल्ली की वेधशाला 1724 में बनी थी। यह इमारत प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है। इसमें हिंदू, इस्लामिक और यूरोपीय खगोलशास्त्री सभी ने अपना बराबर योगदान दिया। जय सिंह ने ऐसी वेधशालाओं का निर्माण जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी किया था। ग्रहों की गति नापने के लिए यहां विभिन्न प्रकार के उपकरण लगाए गए हैं।

प्रमुख यंत्रों में सम्राट यंत्र, नाड़ी वलय यंत्र, दिगंश यंत्र, भित्ति यंत्र, मिस्र यंत्र आदि प्रमुख हैं। सम्राट यंत्र सूर्य की सहायता से वक्त और ग्रहों की स्थिति की जानकारी देता है। मिस्र यंत्र वर्ष के सबसे छोटे ओर सबसे बड़े दिन को नाप सकता है। राम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र खगोलीय पिंडों की गति के बारे में बताता है। इसके अलावा राजा जयसिंह द्वारा खगोल यंत्र भी बनवाए गए थे। इसमें सम्राट यंत्र, सस्थाम्सा, दक्सिनोत्तारा भित्ति यंत्र, जय प्रकासा और कपाला,  नदिवालय, दिगाम्सा यंत्र,  राम यंत्र और रसिवालाया। राजा जय सिंह तथा उनके राज्य ज्योतिषी पं जगन्नाथ ने इसी विषय पर ‘यंत्र प्रकार’ तथा ‘सम्राट सिद्धांत’ नामक ग्रंथ भी लिखे थे।


छह वर्ष में हुआ था तैयार, उन्नति की मिसाल
जयपुर की बसावट के साथ ही तत्कालीन महाराजा सवाई जयसिंह (द्वितीय) ने जंतर-मंतर का निर्माण कार्य शुरू करवाया। दरअसल, वे ज्योतिषशास्त्र में दिलचस्पी रखते थे और इसके ज्ञाता थे। जंतर-मंतर को बनने में करीब 6 साल लगे और 1734 में यह बनकर तैयार हुआ। इसमें ग्रहों की चाल का अध्ययन करने के लिए तमाम यंत्र बने हैं। यह इमारत प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है।

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