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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: इन महिलाओं ने बचपन के सपने को किया साकार, बच्चों में संस्कार भरने का उठा रखा जिम्मा
Tue, 08 Mar 2022 01:32 AM IST
सुशील कुमार
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: सुशील कुमार
Updated Tue, 08 Mar 2022 01:32 AM IST
सार
बचपन से ही रेल इंजन को देखना पसंद था, आज लोको पॉयलट है दूर से ही भाप इंजन को देखना अच्छा लगता था। स्टेशन पहुंचकर भाप इंजन से चलने वाली ट्रेन को निहारा करती थी। कौतूहल यह रहता था कि आखिर कोयले से ट्रेन चलती कैसे है।
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लक्ष्मी लाकड़ा, निरुपमा और अलिशा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है बात उस आधी आबादी की, जो दिल्ली में कुछ कर गुजरने की ललक को भी पूरा कर रही हैं और बचपन का उनका सपना भी साकार हुआ है। लक्ष्मी इन्हीं में से एक हैं। बचपन में रेल का इंजन देखते-देखते इन पर लोको पायलट बनने का जुनून सवार हो गया। आज वह दिल्ली रेल मंडल की इकलौती ट्रेन चालक हैं। आईआईटी करते-करते और शोध संस्थानों से जुड़ने के बाद निरूपमा गुप्ता ने बच्चों में संस्कार की जो कमी देखी, सेवानिवृत्ति के बाद उसकी भरपाई वह अपनी संस्कारशाला में कर रही हैं। कोविड काल में अलिशा ने अमेरिका में अपनी पढ़ाई करते जेब खर्च से सेविंग की और उससे दिल्ली की झुग्गी बस्ती के बच्चों को अक्षर ज्ञान करवाया। अमर उजाला की विशेष रिपोर्ट...
बचपन का शौक हो रहा पूरा
बचपन से ही रेल इंजन को देखना पसंद था, आज लोको पॉयलट है दूर से ही भाप इंजन को देखना अच्छा लगता था। स्टेशन पहुंचकर भाप इंजन से चलने वाली ट्रेन को निहारा करती थी। कौतूहल यह रहता था कि आखिर कोयले से ट्रेन चलती कैसे है। कितना जोखिम भरा यह काम होगा। यही से ख्याल आया कि ट्रेन की ड्राइविंग सीट पर एक दिन बैठना है। पढ़ाई में अच्छी थी तो इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। चाहती तो जूनियर इंजीनियर बन सकती थी। लेकिन कुछ अलग हटकर चैलेंजिंग काम को चुना और लोको पॉयलट बन गई। यह कहना है दिल्ली रेल मंडल की अकेली महिला ट्रेन चालक लक्ष्मी लाकड़ा का।
महिला होते हुए लाकड़ा ने रोजगार के लिए ऐसा माध्यम चुना जिसमें पुरुषों की बादशाहत थी। लाकड़ा कहती है कि रेलवे प्रशासन का बराबर सहयोग रहता है। तभी एक महिला ट्रेन को चलाने में सक्षम होती है। कोरोना काल में भी चुनौती का सामना करते हुए ट्रेन संचालन का काम किया। इन दिनों लाकड़ा तिलकब्रिज-सिरसा के बीच चलने वाली ट्रेन में सराय रोहिल्ला तक ट्रेन चलाती है। कोविड के पहले दिल्ली-रेवाड़ी के बीच ट्रेन चलाती थी।
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बच्चों के भविष्य को संवारने का काम करती है निरुपमा
देश का भविष्य बच्चों पर टिका है। इसके लिए उन्हें अतीत का ज्ञान देना भी बेहद आवश्यक है। बच्चों को अपनी मिट्टी से जोड़ने की जरूरत है। इसी उद्देश्य के साथ 74 वर्षीय आईआईटियन निरुपमा गुप्ता काम करती हैं। वैज्ञानिक शोध संस्थानों में ज्ञान की रौशनी फैला चुकीं गुप्ता कहती हैं कि पूसा इंस्टीट्यूट से सेवानिवृत होने के बाद युवकों को योग शिक्षा देना, संस्कार की बातें करना अच्छा लगा। इस वजह से बाल संस्कारशाला में बच्चों को अतीत की जानकारी देती हूं। इसका आयोजन डीडीए पार्क में करती है। हालांकि, कोरोना की वजह से बच्चों को पार्क में आना मुश्किल हो गया था। खुद भी पार्क नहीं पहुंच पाती थी। अब एक बार फिर इसे शुरू करने की तैयारी में गुप्ता जुटी हुई है। इन दिनों भारतीय योग संस्थान के सहयोग से सभी को योग के प्रेरित कर रही है।
हाशिए पर पड़े गरीब बच्चों का सहयोग करती है अलिशा
हाशिए पर पड़े गरीब बच्चों की जिंदगी में ज्ञान भरने का काम कई लोग कर रहे हैं। इनमें एक ऐसी भी छात्रा है जो विदेश में पढ़ाई करती है और दिल्ली के झुग्गियों में रहने वाले बच्चों का सहयोग। अमेरिका में रह कर पढ़ाई करने वाली अलिशा गरीब बच्चों के पढ़ाई के लिए खर्च भेजती है। बकौल अलिशा, लॉकडाउन के दौरान बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाने का का मौका मिला। इसके एवज में कई डॉलर रुपये की भी कमाई हुई। इस राशि को गोपालपुर व प्रगति मैदान स्थित झुग्गी में पढ़ने वाले बच्चों की सहायता की गई। अलिशा बताती है कि सोशल मीडिया से जब पता चलता है कि भारत में कई लोग गरीब बच्चों के मददगार साबित हो रहे है तो उनसे संपर्क साधकर मदद करती हूं, ताकि कोई पढ़ाई से वंचित नहीं रह सके। इस काम में दिल्ली के सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट में रहने वाले उनके पिता मधुर्वरशि व मां शमा का भी पूरा सहयोग रहता है।
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बचपन का शौक हो रहा पूरा
बचपन से ही रेल इंजन को देखना पसंद था, आज लोको पॉयलट है दूर से ही भाप इंजन को देखना अच्छा लगता था। स्टेशन पहुंचकर भाप इंजन से चलने वाली ट्रेन को निहारा करती थी। कौतूहल यह रहता था कि आखिर कोयले से ट्रेन चलती कैसे है। कितना जोखिम भरा यह काम होगा। यही से ख्याल आया कि ट्रेन की ड्राइविंग सीट पर एक दिन बैठना है। पढ़ाई में अच्छी थी तो इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। चाहती तो जूनियर इंजीनियर बन सकती थी। लेकिन कुछ अलग हटकर चैलेंजिंग काम को चुना और लोको पॉयलट बन गई। यह कहना है दिल्ली रेल मंडल की अकेली महिला ट्रेन चालक लक्ष्मी लाकड़ा का।
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महिला होते हुए लाकड़ा ने रोजगार के लिए ऐसा माध्यम चुना जिसमें पुरुषों की बादशाहत थी। लाकड़ा कहती है कि रेलवे प्रशासन का बराबर सहयोग रहता है। तभी एक महिला ट्रेन को चलाने में सक्षम होती है। कोरोना काल में भी चुनौती का सामना करते हुए ट्रेन संचालन का काम किया। इन दिनों लाकड़ा तिलकब्रिज-सिरसा के बीच चलने वाली ट्रेन में सराय रोहिल्ला तक ट्रेन चलाती है। कोविड के पहले दिल्ली-रेवाड़ी के बीच ट्रेन चलाती थी।
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बच्चों के भविष्य को संवारने का काम करती है निरुपमा
देश का भविष्य बच्चों पर टिका है। इसके लिए उन्हें अतीत का ज्ञान देना भी बेहद आवश्यक है। बच्चों को अपनी मिट्टी से जोड़ने की जरूरत है। इसी उद्देश्य के साथ 74 वर्षीय आईआईटियन निरुपमा गुप्ता काम करती हैं। वैज्ञानिक शोध संस्थानों में ज्ञान की रौशनी फैला चुकीं गुप्ता कहती हैं कि पूसा इंस्टीट्यूट से सेवानिवृत होने के बाद युवकों को योग शिक्षा देना, संस्कार की बातें करना अच्छा लगा। इस वजह से बाल संस्कारशाला में बच्चों को अतीत की जानकारी देती हूं। इसका आयोजन डीडीए पार्क में करती है। हालांकि, कोरोना की वजह से बच्चों को पार्क में आना मुश्किल हो गया था। खुद भी पार्क नहीं पहुंच पाती थी। अब एक बार फिर इसे शुरू करने की तैयारी में गुप्ता जुटी हुई है। इन दिनों भारतीय योग संस्थान के सहयोग से सभी को योग के प्रेरित कर रही है।
हाशिए पर पड़े गरीब बच्चों का सहयोग करती है अलिशा
हाशिए पर पड़े गरीब बच्चों की जिंदगी में ज्ञान भरने का काम कई लोग कर रहे हैं। इनमें एक ऐसी भी छात्रा है जो विदेश में पढ़ाई करती है और दिल्ली के झुग्गियों में रहने वाले बच्चों का सहयोग। अमेरिका में रह कर पढ़ाई करने वाली अलिशा गरीब बच्चों के पढ़ाई के लिए खर्च भेजती है। बकौल अलिशा, लॉकडाउन के दौरान बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाने का का मौका मिला। इसके एवज में कई डॉलर रुपये की भी कमाई हुई। इस राशि को गोपालपुर व प्रगति मैदान स्थित झुग्गी में पढ़ने वाले बच्चों की सहायता की गई। अलिशा बताती है कि सोशल मीडिया से जब पता चलता है कि भारत में कई लोग गरीब बच्चों के मददगार साबित हो रहे है तो उनसे संपर्क साधकर मदद करती हूं, ताकि कोई पढ़ाई से वंचित नहीं रह सके। इस काम में दिल्ली के सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट में रहने वाले उनके पिता मधुर्वरशि व मां शमा का भी पूरा सहयोग रहता है।