{"_id":"5fd235b88ebc3e3b9c6e3cf4","slug":"high-court-seeks-reply-from-center-and-aiims-on-80-per-cent-reservation-for-women-in-nursing-ashram-news-noi5531740173","type":"story","status":"publish","title_hn":"एम्स में नर्सिंग कैडर में महिलाओं के लिए 80 फीसदी आरक्षण को चुनौती","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
एम्स में नर्सिंग कैडर में महिलाओं के लिए 80 फीसदी आरक्षण को चुनौती
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने एम्स के नर्सिंग कैडर में महिलाओं के लिए 80 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र व एम्स को नोटिस जारी किया है। अदालत ने यह नोटिस केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर जारी किया है। कैट ने 80 फीसदी नर्सिंग स्टाफ की सीटों को आरक्षित करने के मेडिकल संस्थान के फैसले को बरकरार रखा है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल व न्यायमूर्ति तलवंत सिंह की खंडपीठ तीन पुरुष उम्मीदवारों द्वारा दायर याचिका पर पर सुनवाई कर रही है। याची ने कहा कि एम्स में 4600 से अधिक नर्सिंग पदों में से 80 फीसदी महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। यह उनके अधिकारों से भेदभाव है। संविधान के अनुच्छेद 15 (3) के तहत महिलाओं के लिए आरक्षण एक लंबे समय से है। ऐसे में कैट के फैसले का रद्द किया जाए।
खंडपीठ ने माना कि महिलाओं के लिए आरक्षण लंबे समय से बरकरार है। वर्तमान मामला नर्सिंग स्टाफ से संबंधित है, जो परंपरागत रूप से लंबे अरसे से महिलाओं की पकड़ में है। अदालत ने दोनों पक्षों को यह भी स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्यों न कैट के आदेश पर रोक लगा दी जाए। इसके अलावा अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में की गई कोई भी नियुक्ति अदालत के आदेश पर निर्भर करेगी।
विज्ञापन
याचिकाकर्ता हरीश कुमार काजला, राजेश कुम्हार और कृष्ण कुमार बोहरा ने याचिका में कहा कि यहां सवाल यह है कि क्या एम्स के नर्सिंग कैडर में महिलाओं के लिए 80 प्रतिशत आरक्षण असंवैधानिक है या अवैध है। एम्स की सेंट्रल एक्जीक्यूटिव बॉडी की 27 जुलाई, 2019 को आयोजित एक बैठक में उक्त आरक्षण का निर्णय लिया गया था। उक्त निर्णय 5 अगस्त, 2020 को एम्स द्वारा 4629 नर्सिंग अधिकारी लेवल -7 के भर्ती मामले में लागू किया गया है।
याची के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि 80 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षण करने पर पुरुषों के अधिक अंक आने के बावजूद उन्हें नौकरी से वंचित होना पड़ रहा है। याचिका में कहा गया है कि एम्स द्वारा यह आरक्षण सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण के लिए विचार किए गए 50 प्रतिशत आरक्षण का उल्लंघन है कि इसे पार नहीं किया जा सकता है।
वर्तमान मामले में मुद्दा रोगी के आराम और देखभाल का है। लिंग भेद के आधार पर पुरुषों से नर्सिंग मामले में भेदभाव नहीं किया जा सकता। महिला देखभाल में बेहतर हैं, ऐसे किसी भी प्रकार के सर्वे को किए बिना महिलाओं के लिए ये आरक्षण गलत है।
विज्ञापन
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल व न्यायमूर्ति तलवंत सिंह की खंडपीठ तीन पुरुष उम्मीदवारों द्वारा दायर याचिका पर पर सुनवाई कर रही है। याची ने कहा कि एम्स में 4600 से अधिक नर्सिंग पदों में से 80 फीसदी महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। यह उनके अधिकारों से भेदभाव है। संविधान के अनुच्छेद 15 (3) के तहत महिलाओं के लिए आरक्षण एक लंबे समय से है। ऐसे में कैट के फैसले का रद्द किया जाए।
विज्ञापन
खंडपीठ ने माना कि महिलाओं के लिए आरक्षण लंबे समय से बरकरार है। वर्तमान मामला नर्सिंग स्टाफ से संबंधित है, जो परंपरागत रूप से लंबे अरसे से महिलाओं की पकड़ में है। अदालत ने दोनों पक्षों को यह भी स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्यों न कैट के आदेश पर रोक लगा दी जाए। इसके अलावा अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में की गई कोई भी नियुक्ति अदालत के आदेश पर निर्भर करेगी।
विज्ञापन
याचिकाकर्ता हरीश कुमार काजला, राजेश कुम्हार और कृष्ण कुमार बोहरा ने याचिका में कहा कि यहां सवाल यह है कि क्या एम्स के नर्सिंग कैडर में महिलाओं के लिए 80 प्रतिशत आरक्षण असंवैधानिक है या अवैध है। एम्स की सेंट्रल एक्जीक्यूटिव बॉडी की 27 जुलाई, 2019 को आयोजित एक बैठक में उक्त आरक्षण का निर्णय लिया गया था। उक्त निर्णय 5 अगस्त, 2020 को एम्स द्वारा 4629 नर्सिंग अधिकारी लेवल -7 के भर्ती मामले में लागू किया गया है।
याची के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि 80 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षण करने पर पुरुषों के अधिक अंक आने के बावजूद उन्हें नौकरी से वंचित होना पड़ रहा है। याचिका में कहा गया है कि एम्स द्वारा यह आरक्षण सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण के लिए विचार किए गए 50 प्रतिशत आरक्षण का उल्लंघन है कि इसे पार नहीं किया जा सकता है।
वर्तमान मामले में मुद्दा रोगी के आराम और देखभाल का है। लिंग भेद के आधार पर पुरुषों से नर्सिंग मामले में भेदभाव नहीं किया जा सकता। महिला देखभाल में बेहतर हैं, ऐसे किसी भी प्रकार के सर्वे को किए बिना महिलाओं के लिए ये आरक्षण गलत है।