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कथित आतंकियों की न्यायिक हिरासत बढ़ाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज
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नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार दो आरोपियों की न्यायिक हिरासत अवधि 45 दिन बढ़ाने के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। उन्होंने निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। दोनों आरोपी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन अलकायदा से प्रेरित जेहादी आतंकवादियों के ग्रुप के सदस्य हैं।
न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर ने आरोपी नजमस साकिब और अल मामून कमाल की याचिका खारिज की है। दोनों ने पटियाला हाउस स्थित विशेष एनआईए कोर्ट द्वारा पिछले वर्ष पारित 16 दिसंबर के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने जांच एजेंसी को जांच में तेजी लाने का निर्देश देते हुए उनकी न्यायिक हिरासत 45 दिन बढ़ा दी थी।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क रखा कि न्यायिक हिरासत में भेजने और उनकी नजरबंदी को 45 दिन तक बढ़ाने का निर्णय मनमाने और बिना किसी आधार के हैं। उन्होंने कहा जांच एजेंसी ने याचिकाकर्ताओं की हिरासत के 90वें दिन से सात दिन पहले आवेदन दायर कर न्यायिक हिरासत अवधि बढ़ाने का आग्रह किया था। यदि 90 दिन पूरे हो जाते तो आरोपपत्र दायर न करने के आधार पर उनके मुवक्किल सीआरपीसी की धारा 167 (2) के तहत जमानत पाने के हकदार बन जाते।
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अदालत ने उनके इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यूएपीए अधिनियम में जांच की अवधि को 90 दिनों से 180 दिन बढ़ाने का प्रावधान है। अदालत ने कहा यह तभी होता है जब जांच पूरी करने की निर्धारित अवधि समाप्त हो रही हो और इसे बढ़ाने के लिए आवेदन दायर न हो। अदालत ने कहा कि यदि आवेदन जांच पूरी करने के लिए निर्धारित अवधि से बहुत पहले दायर किया जाता है तो यह स्पष्ट रूप से मान्य है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने दोनों आरोपियों को 19 सितंबर 2020 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले स्थित उनके स्थायी आवास से गिरफ्तार किया था। नजमस साकिब पश्चिम बंगाल के कल्याणी विश्वविद्यालय से संबद्ध मुर्शिदाबाद के दुमकाल कॉलेज में बी.एससी (ऑनर्स) कंप्यूटर साइंस का छात्र है। उसने हाल ही में तिहाड़ जेल परिसर से अपने चौथे सेमेस्टर की परीक्षाएं दी थीं। वहीं अल मामून कमल मजदूर है, जो पिछले साल लॉकडाउन के दौरान राजमिस्त्री और ड्राइवर के रूप में काम करता था।
दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, संदिग्ध आतंकी विश्व स्तर पर प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन अलकायदा से प्रेरित जेहादी आतंकवादियों के ग्रुप के सदस्य है। इसमें ज्यादातर बंगाली मूल के 10 से अधिक सदस्य शामिल हैं जो भारत में कई स्थानों पर राष्ट्र विरोधी/आतंकी गतिविधियों की योजना बना रहे थे।
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न्यायमूर्ति रजनीश भटनागर ने आरोपी नजमस साकिब और अल मामून कमाल की याचिका खारिज की है। दोनों ने पटियाला हाउस स्थित विशेष एनआईए कोर्ट द्वारा पिछले वर्ष पारित 16 दिसंबर के आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने जांच एजेंसी को जांच में तेजी लाने का निर्देश देते हुए उनकी न्यायिक हिरासत 45 दिन बढ़ा दी थी।
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याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क रखा कि न्यायिक हिरासत में भेजने और उनकी नजरबंदी को 45 दिन तक बढ़ाने का निर्णय मनमाने और बिना किसी आधार के हैं। उन्होंने कहा जांच एजेंसी ने याचिकाकर्ताओं की हिरासत के 90वें दिन से सात दिन पहले आवेदन दायर कर न्यायिक हिरासत अवधि बढ़ाने का आग्रह किया था। यदि 90 दिन पूरे हो जाते तो आरोपपत्र दायर न करने के आधार पर उनके मुवक्किल सीआरपीसी की धारा 167 (2) के तहत जमानत पाने के हकदार बन जाते।
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अदालत ने उनके इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यूएपीए अधिनियम में जांच की अवधि को 90 दिनों से 180 दिन बढ़ाने का प्रावधान है। अदालत ने कहा यह तभी होता है जब जांच पूरी करने की निर्धारित अवधि समाप्त हो रही हो और इसे बढ़ाने के लिए आवेदन दायर न हो। अदालत ने कहा कि यदि आवेदन जांच पूरी करने के लिए निर्धारित अवधि से बहुत पहले दायर किया जाता है तो यह स्पष्ट रूप से मान्य है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने दोनों आरोपियों को 19 सितंबर 2020 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले स्थित उनके स्थायी आवास से गिरफ्तार किया था। नजमस साकिब पश्चिम बंगाल के कल्याणी विश्वविद्यालय से संबद्ध मुर्शिदाबाद के दुमकाल कॉलेज में बी.एससी (ऑनर्स) कंप्यूटर साइंस का छात्र है। उसने हाल ही में तिहाड़ जेल परिसर से अपने चौथे सेमेस्टर की परीक्षाएं दी थीं। वहीं अल मामून कमल मजदूर है, जो पिछले साल लॉकडाउन के दौरान राजमिस्त्री और ड्राइवर के रूप में काम करता था।
दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, संदिग्ध आतंकी विश्व स्तर पर प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन अलकायदा से प्रेरित जेहादी आतंकवादियों के ग्रुप के सदस्य है। इसमें ज्यादातर बंगाली मूल के 10 से अधिक सदस्य शामिल हैं जो भारत में कई स्थानों पर राष्ट्र विरोधी/आतंकी गतिविधियों की योजना बना रहे थे।