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दिल्ली : कोरोना काल में बढ़ी टीबी से जान गंवाने वालों की दर, 192 गुना इजाफा
Thu, 09 Sep 2021 06:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 09 Sep 2021 06:18 AM IST
सार
एक आरटीआई में पता चला है कि साल 2019 में टीबी से दिल्ली में 11 मरीजों की मौत हुई थी लेकिन 2020 में कोरोना महामारी के बाद 2111 मरीजों की मौत हुई।
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- फोटो : pixabay
विस्तार
कोरोना महामारी की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर काफी गंभीर असर पड़ा है। इस दौरान टीबी (क्षय रोग) की मृत्युदर कई गुना बढ़ गई है। बीते दो साल में ही 192 गुना अधिक टीबी मरीजों की जान चली गई। एक आरटीआई में पता चला है कि साल 2019 में टीबी से दिल्ली में 11 मरीजों की मौत हुई थी लेकिन 2020 में कोरोना महामारी के बाद 2111 मरीजों की मौत हुई। वहीं, इस साल जनवरी से जून माह तक 600 मरीजों की मौत हो चुकी है।
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विशेषज्ञों के मुताबिक कोरोना महामारी की वजह से टीबी मरीजों की पहचान काफी प्रभावित हुई है। मरीजों को समय पर उपचार न मिलना, कोविड-19 और टीबी के लक्षणों में समानता और मरीजों की पहचान नहीं होने की वजह से मृत्युदर में बढ़ोतरी हुई है। दरअसल, टीबी एक संक्रामक रोग है जो फेफड़ों के अलावा शरीर के दूसरे अंगों में भी हो सकता है। यह हवा के जरिये भी एक संक्रमित रोगी से सामान्य व्यक्ति को चपेट में ले सकता है। यह संक्रमण काफी तीव्र होता है और हर साल देश में हजारों लोगों की इससे मौत भी हो रही है। केंद्र सरकार ने साल 2025 तक देश को टीबी मुक्त करने के लिए बड़े स्तर पर अभियान भी छेड़ा है लेकिन कोरोना महामारी की वजह से टीबी रोगियों के उपचार में गंभीर असर पड़ा है।
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सरिता विहार निवासी जुनैद अहमद (28) बताते हैं कि पिछले साल लॉकडाउन लगने के बाद तीन महीने तक उन्हें दवा नहीं मिल पाई थी जिसके चलते उनकी हालत खराब हुई और गंभीर स्थिति में एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। यहां 15 दिन उपचार के बाद उन्हें डिस्चार्ज किया गया। वहीं लक्ष्मी नगर निवासी शैफाली लांबा ने बताया कि उनके पिता को टीबी संक्रमण हुआ था लेकिन जांच इत्यादि होने से पहले लॉकडाउन लग गया। इसके बाद छह महीने तक घर में रहते हुए नजदीकी एक क्लिनिक से उपचार लेते रहे और 17 सितंबर, 2020 को उनकी मौत हो गई।
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गैर कोविड मरीजों पर गंभीर असर
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि वर्षों से टीबी का संक्रमण हजारों लोगों को चपेट में ले रहा है। कोरोना महामारी की तुलना में टीबी संक्रमण कई गुना घातक है लेकिन कोविड-19 की वजह से टीबी नियंत्रण पर ध्यान हटा है। इसी का असर है कि अब पोस्ट कोविड में भी टीबी के गंभीर मामले देखने को मिल रहे हैं। एम्स के वरिष्ठ डॉ. विजय हड्डा ने कहा कि गैर कोविड मरीजों के उपचार पर काफी गंभीर असर पड़ा है जिसके परिणाम इस तरह आंकड़ों में दिखाई दे रहे हैं। अब ऐसे भी मामले सामने आ रहे हैं जिन्हें कोरोना के वक्त स्टेरॉयड दिया गया और मधुमेह के चलते उनमें टीबी संक्रमण देखने को मिल रहा है।
प्राइवेट अस्पतालों में बढ़े टीबी मरीज
मूलचंद अस्पताल में ऐसे मामले दर्ज भी हुए हैं। अस्पताल के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ भगवान मंत्री ने कहा कि ज्यादातर मरीजों की आयु 40 साल से भी कम है। कोरोना महामारी के चलते स्टेरॉयड दवाओं का इस्तेमाल किया गया जिनका असर इन सभी टीबी रोगियों पर साफ दिखाई दे रहा है। इनके अलावा आकाश अस्पताल में टीबी रोगियों को लेकर 15 से 20 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
क्या कहती है आरटीआई रिपोर्ट
आरटीआई कार्यकर्ता विवेक पांडे ने देश भर में साल 2018 से अब तक टीबी मरीजों के बारे में जानकारी मांगी थी। इसके अनुसार साल 2018 में 93580 टीबी मरीजों की पहचान दिल्ली में हुई थी। वहीं, साल 2019 में यह संख्या बढ़कर 1,07,982 तक पहुंच गई, लेकिन साल 2020 में जब कोरोना महामारी आई तो टीबी मरीजों की पहचान घटकर 86,842 तक पहुंची और इसके बाद साल 2021 में अब तक 47570 नए मरीज मिले हैं। इसी दौरान साल 2018 में 1006 मरीजों की टीबी से मौत हुई थी। जबकि साल 2019 में 11, साल 2020 में 2111 और इस साल 600 मरीजों की मौत दर्ज की गई है।
टीबी मुक्त दिल्ली का लक्ष्य हुआ और कठिन
दिल्ली स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि कोविड-19 की वजह से टीबी मुक्त दिल्ली का लक्ष्य अब और कठिन हो चुका है। उन्होंने बताया कि साल 2020 में चार बार दिल्ली कोरोना महामारी की नई-नई लहर का सामना कर चुका है। लंबे समय तक लॉकडाउन रहने से काफी असर टीबी उपचार पर पड़ा है और इसमें सुधार के लिए लगातार प्रयास भी किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अभी दूसरी लहर के बाद से टीबी मरीजों की पहचान, उपचार इत्यादि में तेजी भी आई है। हर जिले में टीबी मरीजों को लेकर विशेष अभियान चलाने के निर्देश भी दिए जा चुके हैं।