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दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: सामूहिक दुष्कर्म के दोषी को चार सप्ताह की पैरोल, बहन के अंतिम संस्कार में होगा शामिल
Sun, 09 Nov 2025 08:23 PM IST
राहुल तिवारी
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
Published by: राहुल तिवारी
Updated Sun, 09 Nov 2025 08:23 PM IST
सार
दिल्ली हाईकोर्ट ने सामुहिक दुष्कर्म के मामले में दोषी तसलीम (55 वर्षीय) को उसकी बहन के निधन पर चार सप्ताह की पैरोल दी। अदालत ने यह आदेश मानवीय आधार पर विशेष सुनवाई में रविवार को दिया। तसलीम की बहन का उसी दिन निधन हुआ था।
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दिल्ली हाईकोर्ट, Delhi High Court
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दिल्ली हाईकोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई करते हुए सामुहिक दुष्कर्म के एक दोषी को उसकी बहन के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए चार सप्ताह की पैरोल मंजूर की। यह सुनवाई न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने की। न्यायमूर्ति नरूला ने सात नवंबर को 55 वर्षीय दोषी तसलीम को मानवीय आधार पर एक दिन की कस्टडी पैरोल दी थी ताकि वह अस्पताल में भर्ती अपनी बीमार बहन से मिल सके। रविवार सुबह अदालत को बताया गया कि तसलीम की 60 वर्षीय बहन का निधन हो गया है और शाम को अंतिम संस्कार होना है।
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अदालत ने आदेश दिया, आवेदन स्वीकार किया जाता है। याचिकाकर्ता को उसकी रिहाई की तारीख से चार सप्ताह की पैरोल दी जाती है, बशर्ते वह दस हजार रुपये का निजी मुचलका जमा करे। साथ ही पिछली फरलो के दौरान जमा कराई गई नकद जमानत को बरकरार रखा जाएगा। यह सब संबंधित जेल अधीक्षक की संतुष्टि के अनुसार होगा।
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तसलीम की बहन पोस्ट-टीबी फेफड़ों की जटिलताओं से पीड़ित थीं और लंबे समय से ऑक्सीजन थेरेपी पर थीं। छह नवंबर को उन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया था। बहन के निधन के बाद तसलीम ने तत्काल पैरोल की मांग की ताकि वह अंतिम संस्कार में शामिल हो सके और शोक की इस घड़ी में परिवार के साथ रह सके।
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तसलीम को 1997 में एक महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म के मामले में गिरफ्तार किया गया था। 1999 में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उसने हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपनी सजा के खिलाफ अपील की, लेकिन दोनों अदालतों ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
हाल ही में तसलीम ने सजा समीक्षा बोर्ड (एसआरबी) द्वारा पैरोल से इनकार करने के निर्णय को चुनौती दी थी। अदालत ने एसआरबी को मामलों के सतही और औपचारिक निपटारे के लिए फटकार लगाई थी। अदालत ने कहा था कि कई मामलों में समयपूर्व रिहाई से जुड़ी याचिकाएं विचाराधीन हैं, और इनके न्यायपूर्ण निपटारे के लिए एकसमान और तर्कसंगत प्रक्रिया जरूरी है, जैसा कि संतोष कुमार सिंह मामले में निर्देश दिए गए थे।
संतोष कुमार सिंह 1996 में कानून की छात्रा प्रियदर्शिनी मट्टू के दुष्कर्म और हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है। हाईकोर्ट ने उसकी समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज करते हुए एसआरबी के लिए दिशानिर्देश तय किए थे। अदालत ने कहा था कि वर्तमान व्यवस्था में दोषियों का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन शामिल नहीं है, जिससे यह तय करना कठिन होता है कि क्या दोषी में अपराध की प्रवृत्ति समाप्त हो चुकी है। इसलिए, एसआरबी को हर ऐसे मामले में मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कराना चाहिए।