2015 में स्टार प्रचारकों की हाजिरी पड़ी थी कांग्रेस-भाजपा को भारी, इस बार बदली रणनीति
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दोनों ही पार्टियों के निष्ठावान कार्यकर्ता स्टार प्रचारकों के लिए महज भीड़ जुटाने का एक साधन बनकर रह गए। इस काम में वरिष्ठ पदाधिकारी और बूथ कार्यकर्ता, दोनों को लगा दिया गया। नतीजा, वोटरों के साथ बूथ कार्यकर्ताओं का सीधा संपर्क टूट गया। दूसरी ओर 'आप' ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाया और अपने वालंटियर को एक नहीं, बल्कि कई बार लोगों के घर भेज दिया।
इस बार के चुनाव में तो खासतौर पर भाजपा की ओर से स्टार प्रचारकों की लंबी चौड़ी सूची आई है। कोई एक दो नहीं, अपितु हजारों जनसभाएं करने का लक्ष्य रखा गया है। भाजपा ने इस बार भीड़ जुटाने के लिए पार्टी में अलग एक इकाई का गठन कर दिया है। उस इकाई का कार्य केवल स्टार प्रचारकों की जनसभाओं को सफल बनाना है, जबकि बूथ कार्यकर्ता केवल वोटरों से संपर्क करेंगे।
आप की इस रणनीति में उलझीं पार्टियां
गत विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अलावा अनेक केंद्रीय मंत्री व मुख्यमंत्रियों का समूह प्रचार में जुटा थे। चूंकि ये स्टार प्रचारक थे, इसलिए इनकी जनसभाओं को सफल बनाना भी जरूरी था। वजह, आम आदमी पार्टी के वालंटियर दिल्ली के चप्पे-चप्पे पर मौजूद थे। उनका काम भाजपा और कांग्रेस के स्टार प्रचारकों की जनसभाओं पर नजर रखना था। उन्हें जिस किसी स्टार प्रचारक की जनसभा फीकी दिखाई पड़ती या कुर्सियां खाली रहतीं, तो वे उसका फोटो या वीडियो बनाकर सोशल मीडिया एवं पार्टी की वेबसाइट पर अपलोड कर उसे वायरल कर देते थे।
इसका पार्टी की छवि पर नकारात्मक असर पड़ता था। यही वजह रही कि भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने स्टार प्रचारकों की जनसभाएं सफल बनाने के लिए पूरी ताकत लगा दी। भाजपा ने तो अपने सभी कार्यकर्ताओं, जिनमें बूथ स्तर के पदाधिकारी भी शामिल थे, उन्हें स्टार प्रचारकों की हाजिरी भरने और भीड़ जुटाने का जरिया बना दिया। दूसरी ओर आप ने केवल इकलौते स्टार प्रचारक अरविंद केजरीवाल के दम पर वालंटियर्स करे जरिये लोगों को उनके घर जाकर अपनी बात समझाई।
बूथ कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा
2015 में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली चुनाव के बाद कहा था कि हमारी प्रचार सामग्री जमीनी स्तर पर नहीं पहुंच पाई। इसके बाद जो चुनावी विश्लेषण हुआ, उसमें सामने आया कि चुनाव प्रचार में बाहरी नेताओं की भीड़, जिनमें स्टार प्रचारक भी शामिल रहे, ने वोट बैंक बढ़ाने की बजाए बूथ कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया था।
पार्टी के लिए लंबे समय से काम कर रहे कार्यकर्ताओं को महज भीड़ जुटाने का साधन बना दिया गया। इसके चलते वोटरों के साथ इन जमीनी कार्यकर्ताओं का संपर्क टूट गया। अगर उनके पास कोई कार्यकर्ता पहुंचा भी तो वह स्टार प्रचारकों की जनसभा का निमंत्रण देने। दूसरी तरफ स्टार प्रचारकों की भीड़ और बूथ कार्यकर्ताओं में छाई निराशा से आम आदमी पार्टी को खासा फायदा पहुंचाया। मीडिया सर्वे में मिली बढ़त और केजरीवाल की रैलियों में उमड़ती भीड़ से आप के वालंटियर्स का हौसला लगातार बढ़ता गया।
भाजपा ने अपने 120 सांसद उतारे थे
भाजपा ने 2015 में अपने केंद्रीय मंत्रियों, कई प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और 120 सांसदों को दिल्ली के चुनाव प्रचार में उतारा था। ये नेता जहां भी जाते, वहां के बूथ कार्यकर्ताओं को पहले से ही यह हिदायत दे दी जाती कि वे उनकी जनसभा या पदयात्रा में मौजूद रहें। ये कार्यकर्ता जैसे ही वहां से फ्री होते तो उन्हें किसी दूसरे नेता के साथ लगा दिया जाता। इस बीच अगर किसी मुख्यमंत्री की जनसभा होती है, तो इन कार्यकर्ताओं को दोहरी मशक्कत करनी पड़ती।
पहली, ये लोगों को किसी तरह जनसभा स्थल तक लाते और दूसरी, इन्हें खुद की भी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती थी। किसी बड़े नेता का रोड शो होता तो भी इन्हीं बूथ कार्यकर्ताओं को वहां भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी मिलती थी। इस वजह से इन कार्यकर्ताओं में निराशा एवं हताशा बढ़ती रही। भाजपा एवं कांग्रेस के कई बूथ कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस समय उनकी ड्यूटी केवल मतदाताओं के साथ संपर्क करने की होनी चाहिए।
अगर उन्हें बाहरी नेताओं की हाजिरी भरने में ही लगाया जाएगा तो पार्टी की वोटरों से दूरी बढ़ना भी लाजिमी है। इस बार भाजपा और कांग्रेस ने अपने बूथ कार्यकर्ताओं को भीड़ जुटाने के काम से निजात दे दी है। भाजपा ने तो इसके लिए अलग से एक इकाई गठित की है। इसका काम केवल स्टार प्रचारकों की जनसभाओं का इंतजाम करना है। आरएसएस की कई टीमें और बूथ कार्यकर्ता लोगों के घरों में जाकर उनके बातचीत करेंगे। इसी तरह कांग्रेस भी अपने बूथ कार्यकर्ताओं को अहम जिम्मेदारी दे रही है।