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Delhi News: सैदुल्लाजाब की रिहायशी संपत्तियों पर संकट, 13 दावे खारिज

Wed, 12 Aug 2026 08:11 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Wed, 12 Aug 2026 08:11 PM IST
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Crisis for residential properties in Saidullajab; 13 claims rejected.
वन एवं वन्यजीव विभाग ने फैसले की जानकारी एनजीटी में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट के जरिये दी
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अमर उजाला ब्यूरो

नई दिल्ली। दक्षिण दिल्ली के सैदुल्लाजाब गांव में वन भूमि पर कथित कब्जे को लेकर स्थानीय निवासियों को बड़ा झटका लगा है। फॉरेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर एवं एडीएम (दक्षिण) ने खसरा नंबर 209 से जुड़े सभी 13 मामलों में निवासियों के दावों को खारिज कर दिया है। दिल्ली सरकार के वन एवं वन्यजीव विभाग ने इस फैसले की जानकारी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट के जरिये दी है। मामला इग्नू रोड स्थित पर्यावरण कॉम्प्लेक्स के आसपास की जमीन से जुड़ा है।

वन विभाग ने मार्च 2025 में नोटिस जारी कर खसरा नंबर 209 में मौजूद कथित अतिक्रमण को 15 दिन के भीतर हटाने का निर्देश दिया था। नोटिस में कार्रवाई और निर्माण हटाने की चेतावनी भी दी गई थी। इसके बाद स्थानीय निवासियों ने इस कार्रवाई के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट और फॉरेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर के समक्ष अपना पक्ष रखा। निवासियों का कहना था कि उनकी संपत्तियां खसरा नंबर 188, 206, 207 और 208 में स्थित हैं। उन्होंने बताया कि वे इन संपत्तियों में 30 साल से अधिक समय से रह रहे हैं और नियमित रूप से टैक्स तथा बिजली-पानी के बिलों का भुगतान करते आ रहे हैं। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने जीपीए और एग्रीमेंट टू सेल जैसे दस्तावेज पेश किए।
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दस्तावेजों को नहीं माना मालिकाना हक का आधार

मई 2026 में दिए गए आदेश में फॉरेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर सुधाकर, एडीएम (दक्षिण) ने इन दावों को स्वीकार नहीं किया। आदेश के अनुसार, निवासियों द्वारा पेश किए गए जीपीए और एग्रीमेंट टू सेल पंजीकृत नहीं हैं। ऐसे दस्तावेजों के आधार पर जमीन के मालिकाना हक का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। अधिकारी ने यह भी कहा कि सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में आवेदकों के नाम दर्ज नहीं हैं। रिकॉर्ड में खसरा नंबर 209 को वन विभाग के नाम पर आरक्षित वन भूमि के रूप में दर्ज बताया गया है। वहीं आसपास के कुछ अन्य खसरा नंबरों की जमीन ग्राम सभा की बताई गई है। फॉरेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर ने तहसीलदार और राजस्व विभाग की ओर से किए गए सीमांकन को भी सही माना है। आदेश में कहा गया है कि निवासियों की ओर से सीमांकन को गलत साबित करने के लिए कोई ठोस आधार पेश नहीं किया गया।
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