संकट के सिपाही : 16 दिन में तैयार करा दिया 500 बेड का अस्पताल, वो भी डेडलाइन से पहले
- डीआरडीओ के पास समय नहीं था तो एचएसआरडीसी को सौंपा था काम
- एचएसआरडीसी का यह ऐसा पहला प्रोजेक्ट था चुनौती भरा
- रात 2 बजे तक लगे रहते थे अधिकारी, सुबह 7 बजे फिर आ जाते थे
विस्तार
16 दिन में 500 बेड का अस्थायी अस्पताल तैयार करना एक बड़ी चुनौती थी। हरियाणा रोड एंड ब्रिज डेवलेपमेंट कारपोरेशन (एचएसआरडीसी) को ऐसे काम का अनुभव नहीं था। एचएसआरडीसी के इंजीनियर इन चीफ निहाल सिंह ने इस प्रोजेक्ट की कमान अपने हाथों में ली। 15 दिन में 5 बार मौके का मुआयना किया। तय समय के 2 दिन पहले इस काम को पूरा किया।
लॉकडाउन में मजदूर- मिस्त्री मिलना भी एक चुनौती था। इसके बाद दिल्ली की एक कंपनी से संपर्क किया। विशेष ऑर्डर देकर कंपनी में बेड तैयार कराए। किसी तरह की मंजूरी देनी हो तो अधिकारी अपनी मुहर अपनी गाड़ी में रखते थे। मौके पर ही कागजी कार्रवाई को पूरा करते थे। पर्दे के पीछे रहकर खाली मैदान को आधुनिक सुविधाओं वाले अस्पताल में बदलने वाले 4 अधिकारियों की जुबानी सुनिए पूरी कहानी।
सीएम और डिप्टी सीएम हर वक्त लेते रहते थे अपडेट
डीआरडीओ को यह काम करना था। डीआरडीओ के पास समय न होने के कारण ऐन वक्त पर यह काम हमें सौंपा गया। दो दिन में हमने प्रशासकीय मंजूरी ली। एजेंसी को 48 घंटे के भीतर काम सौंपा। इतने विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना ही एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा था। हर दस मिनट में फोन बजता रहता था। अधिकारियों से लेकर सीएम, डिप्टी सीएम हर कोई इस बारे में लगातार अपडेट ले रहा था। अधिकारियों को प्रोत्साहित करने के लिए मैंने 15 दिन में 5 बार खुद साइट विजिट किया। 18 दिन में काम पूरा होना चैलेंज दिख रहा था, हमने 16 दिन में लक्ष्य को हासिल किया।
-निहाल सिंह, इंजीनियर इन चीफ, एचएसआरडीसी
हमें खुशी है कि चुनौती को पूरा करने का अवसर मिला
फ्रेबिकेशन, पार्टिशन, टॉयलेट, रेस्ट रूम, सड़क निर्माण का काम मेरे जिम्मे था। साइट पर रात को दो बजना मामूली बात हो गई थी। सुबह फिर से 7 बजे साइट पर होते थे। बार-बार फोन बजते तो कई बार परिवार के लोगों के फोन भी नहीं सुन पाते थे। मरीजों को अस्पताल तक पहुंचने में किसी तरह की दिक्कत न हो, इसके लिए एक विशेष सड़क बनाई। साउथ बाईपास से चौधरी देवीलाल संजीवनी अस्पताल से जोड़ा गया है। हमें खुशी है कि इस अस्पताल का हिस्सा बनने का मौका मिला। चुनौती को पूरा करने के बाद खुशी है।
-विशाल कुमार, एक्सईएन
बिजली और ऑक्सीजन गैस पाइप लाइन की आपूर्ति महत्वपूर्ण
अस्पताल में बिजली और ऑक्सीजन आपूर्ति सबसे महत्वपूर्ण थे। अस्पताल परिसर के तीन ब्लॉक में ऑक्सीजन के लिए गैस पाइप लाइन डालने के लिए अतिरिक्त मैन पावर लगानी पड़ी। कोविड के कारण लोग मिल नहीं सकते थे। ऐसे में कई जगह से जुगाड़ करना पड़ा। रातों रात ट्रांसफार्मर लगवाए गए। बिजली और गैस दोनों चुनौती भरे थे। इनमें जरा सी लापरवाही पूरी व्यवस्था को तहस नहस कर सकती थी। ऐसे हालात में काम करना एक अलग अनुभव था। इस प्रोजेक्ट का हिस्सा होने की खुशी है।
- रितेश नांदल, एक्सईएन , हिसार
लोगों की जान बचेगी तो हमें खुशी होगी कि हमने कुछ योगदान दिया
इतने बड़े अस्पताल के लिए पानी-सीवर लाइन की व्यवस्था भी होनी थी। सीवर और पेयजल लाइनों के कनेक्शन के लिए विशेष मंजूरी ली। यह व्यवस्था छह महीने के लिए चलानी है। ऐसे में पक्के शौचालय बनाए गए। कंकरीट के साथ इनको मजबूती देकर केवल बाहरी हिस्से को फ्रेबिकेट किया गया है। अस्पताल को तैयार देखकर लगा कि मेहनत सफल हुई। यहां किसी की जान बचेगी तो खुुशी होगी कि हमने कुछ योगदान किया था।
-संजीव कुमार त्यागी, एक्सईएन , हिसार
कोरोना से जंग जीतकर फिर से मरीजों की सेवा में
डॉ. दीक्षा, सिविल अस्पताल, जोगिंद्रनगर, मंडी
कोरोना से जंग जीतकर डॉ. दीक्षा ने सिविल अस्पताल जोगिंद्रनगर में फिर से कार्यभार संभाल लिया है और मरीजों की सेवा में जुट गई हैं। दो सप्ताह पहले वह संक्रमित हो गईं थीं। मरीजों की सेवा के लिए युवा महिला चिकित्सक फिर से कोरोना के खिलाफ जंग में उतर आईं हैं।
सोमवार को ड्यूटी ज्वाइन करने के बाद बिना किसी खौफ से अस्पताल की आपात सेवाओं में भी सेवाएं देने वाली डॉ. दीक्षा बताती हैं कि 29 अप्रैल को जब वह अस्पताल की आपातकालीन सेवाओं में तैनात थीं तभी एक कोरोना संक्रमित के उपचार के दौरान संक्रमण की चपेट में आ र्गइं थीं। करीब दो सप्ताह तक होम आइसोलेट रहने के बाद जब खुद को पूरी तरह से स्वस्थ पाया तो अस्पताल में फिर से संक्रमितों की सेवा का जिम्मा उठा लिया।
दीक्षा के पिता सुशील ठाकुर नाहन जेल के अधीक्षक हैं। माता गृहिणी हैं, जिन्होंने अपनी बेटी को दोबारा संक्रमित मरीजों की सेवा के लिए अस्पताल में भेजा है। डॉ. दीक्षा अस्पताल की वैक्सीनेशन टीकाकरण की भी प्रभारी हैं। सोमवार को अस्पताल की ओपीडी में भी उन्होंने मरीजों का भी स्वास्थ्य जांचा और संक्रमित मरीजों को उपचार दिलाने का भी कार्य बखूबी निभाया। कहा कि संकट के समय में सभी को एक-दूसरे के काम आना चाहिए।
महामारी को हराने के लिए उतरे मददगार
विवेक पांडेय, संस्था गांधीगीरी टीम, आजमगढ़
कोरोना महामारी के बीच जहां लोग अस्पतालों में सिलेंडर, बेड और दवाओं के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। वहीं, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मददगार बनकर जरूरतमंद को सहारा दे रहे हैं। संकट के इस दौर में ऐसे लोग दूसरों को भी सेवा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। ऐसा ही एक सामाजिक संगठन है गांधीगीरी टीम जो लोगों की मदद कर रहा है। इस टीम में शामिल युवा कोरोना संक्रमित मरीजों को दवा की किट, ऑक्सीजन उपलब्ध करा रहे हैं। इतना ही नहीं जरूरत पड़ने पर अस्पतालों में भी भर्ती करा रहे हैं।
शहर के समीप स्थित सुंभी गांव निवासी विवेक पांडेय ने परिवर्तन सेवा संस्थान के नाम से एक टीम बनाकर जल संरक्षण को लेकर मुहिम चलाई थी। ताकि आने वाले कल में जल की कमी न हो। कोरोना के बढ़ते संक्रमण से इस अभियान पर विराम लग गया। लोग अपने घरों में कैद हो गए, लेकिन परिवर्तन सेवा संस्थान की टीम ने अपना रूप परिवर्तित कर गांधीगीरी टीम बनाई और लोगों की मदद को निकल पड़ी। ताकि कोई भी गरीब उपचार के अभाव में जान न गंवाए। सूचना मिलते ही टीम के सदस्य मदद में जुट जाते हैं। यदि परिवार के पास पैसे नहीं हैं तो टीम पैसा एकत्रित कर उपचार कराती है। यहां तक की जरूरतमंद लोगों को आक्सीजन भी उपलब्ध करा रही है।
व्हाट्सएप पर चल रहा ग्रुप
टीम के सदस्यों ने एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाया है। इसमें सदस्यों के साथ-साथ क्षेत्र के लोग भी जुड़े हैं। यदि कोई व्हाट्सएप पर मदद मांगता है तो टीम उसकी मदद के लिए जुट जाती है। टीम की मदद से अब तक दर्जनों लोगों की जान बचाई जा सकी है। टीम ने लखनऊ व वाराणसी में भी मरीजों को भर्ती कराया है।
संक्रमित होने के बाद भी दिखाया जज्बा
डॉ. एपीएस बत्रा, निदेशक, राजकीय मेडिकल कॉलेज, गोहाना, हरियाणा
खानपुर कलां स्थित बीपीएस मेडिकल कॉलेज के निदेशक ने संक्रमित होने के बाद भी गजब का जज्बा दिखाया। उन्होंने पहले होम आइसोलेशन और फिर आईसीयू में रहकर भी ड्यूटी की। होम आइसोलेशन में उन्होंने नौ दिन में 500 से अधिक फाइलें पास कीं और फिर पांच दिन आईसीयू में रहते हुए संक्रमित चिकित्सक की जिंदगी बचाने के साथ ही अन्य मरीजों की निगरानी की। कोरोना से जंग जीतकर फिर से सामान्य दिनों की तरह काम किया।