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अधिकारियों और वायुसैनिकों के लिए अलग-अलग पेंशन नियमों को चुनौती
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नई दिल्ली। उच्च न्यायालय ने अधिकारियों और वायुसैनिकों के लिए अलग-अलग पेंशन नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय वायुसेना से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति नवीन चावला की खंडपीठ ने सभी पक्षों को तीन सप्ताह में पक्ष रखने का निर्देश देते हुए सुनवाई 25 अप्रैल तय की है।
याचिका शिव नंद मिश्रा द्वारा दायर की गई है, जिन्हें अप्रैल 2017 में कोर्ट मार्शल द्वारा वायु सेना अधिनियम की धारा 40 (सी) और 41 के तहत सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। मिश्रा ने कहा कि उनकी बर्खास्तगी के बाद, उनकी पेंशन और ग्रेच्युटी को रोक दिया गया। इसी कारण उसे याचिका दायर करनी पड़ी।
याचिका के अनुसार तय नियम बर्खास्त वायु सेना अधिकारियों के लिए पेंशन और ग्रेच्युटी की अनुमति देता है। वहीं रेलुलेशन 102 (ए) में सेवा से बर्खास्त किए गए एयरमैन की पिछली सभी सेवाओं के संबंध में पेंशन और ग्रेच्युटी को जब्त करने का प्रावधान है।
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याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि रेगुलेशन मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 300 ए का उल्लंघन करता है। बर्खास्त/दोषी ठहराए गए कर्मचारियों की श्रेणी के भीतर अलग-अलग वर्ग नहीं हो सकते। रेगुलेशन 16 (ए) और 102 (ए) बर्खास्त कर्मियों के विभिन्न वर्ग बनाते हैं।
याचिका में कहा गया है कि बर्खास्त अधिकारी, उनके पति या पत्नी और बच्चों के प्रति अधिकारी कल्याणकारी रुख अपनाते हैं। वहीं, सेवा से बर्खास्त किए गए एयरमैन, उनके आश्रित जीवनसाथी और आश्रित बच्चों के प्रति बहुत कठोर अमानवीय रवैया अपना रहे हैं।
याचिका में आगे कहा गया है कि बर्खास्त किए गए कर्मियों की ग्रेच्युटी को जब्त करना उचित हो सकता है। ऐसे कर्मियों की पेंशन रोकना मनमाना है और यह दोहरे खतरे के बराबर है। किसी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करना अपने आप में कलंक है जिसे वह और उसके परिवार के सदस्य तब तक वहन करते हैं जब तक कि उसे रद्द नहीं किया जाता।
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याचिका शिव नंद मिश्रा द्वारा दायर की गई है, जिन्हें अप्रैल 2017 में कोर्ट मार्शल द्वारा वायु सेना अधिनियम की धारा 40 (सी) और 41 के तहत सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। मिश्रा ने कहा कि उनकी बर्खास्तगी के बाद, उनकी पेंशन और ग्रेच्युटी को रोक दिया गया। इसी कारण उसे याचिका दायर करनी पड़ी।
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याचिका के अनुसार तय नियम बर्खास्त वायु सेना अधिकारियों के लिए पेंशन और ग्रेच्युटी की अनुमति देता है। वहीं रेलुलेशन 102 (ए) में सेवा से बर्खास्त किए गए एयरमैन की पिछली सभी सेवाओं के संबंध में पेंशन और ग्रेच्युटी को जब्त करने का प्रावधान है।
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याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि रेगुलेशन मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 300 ए का उल्लंघन करता है। बर्खास्त/दोषी ठहराए गए कर्मचारियों की श्रेणी के भीतर अलग-अलग वर्ग नहीं हो सकते। रेगुलेशन 16 (ए) और 102 (ए) बर्खास्त कर्मियों के विभिन्न वर्ग बनाते हैं।
याचिका में कहा गया है कि बर्खास्त अधिकारी, उनके पति या पत्नी और बच्चों के प्रति अधिकारी कल्याणकारी रुख अपनाते हैं। वहीं, सेवा से बर्खास्त किए गए एयरमैन, उनके आश्रित जीवनसाथी और आश्रित बच्चों के प्रति बहुत कठोर अमानवीय रवैया अपना रहे हैं।
याचिका में आगे कहा गया है कि बर्खास्त किए गए कर्मियों की ग्रेच्युटी को जब्त करना उचित हो सकता है। ऐसे कर्मियों की पेंशन रोकना मनमाना है और यह दोहरे खतरे के बराबर है। किसी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करना अपने आप में कलंक है जिसे वह और उसके परिवार के सदस्य तब तक वहन करते हैं जब तक कि उसे रद्द नहीं किया जाता।