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15 अगस्त विशेष: शरीर पर खा चुका था 17 गोली, टाइगर हिल पर अकेले ही कर लिया था कब्जा

Sun, 12 Aug 2018 01:03 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 12 Aug 2018 01:03 PM IST
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yogendra singh yadav Flying Tiranga after win battle of tiger hill in kargil
yogendra yadav

ये कहानी उस जाबांज की है, जिसने कारगिल युद्ध में शरीर में 17 गोलियां खाई थीं। उसके सभी 20 साथी शहीद हो चुके थे, लेकिन उसका जज्बा हिला ही नहीं। उस वीर सैनिक का नाम परमवीर योगेंद्र सिंह यादव है। घायल हालत में इन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों से जंग लड़ी और टाइगर हिल पर उनके तीन बंकर पर कब्जा भी किया। 

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योगेंद्र सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र से अलंकृत होने वाले योद्धा हैं। ये साहिबाबाद के लाजपत नगर के रहने वाले हैं। योगेंद्र अभी बरेली में सूबेदार मेजर पद पर तैनात हैं। 
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योगेंद्र बताते हैं कि उस समय हालात बहुत खराब थे। 16500 फुट ऊंची टाइगर हिल बर्फ से पूरी तरह से ढकी थी। तापमान तो -30 डिग्री सेल्सियस था। इस दौरान बर्फीले तूफान के बीच पहाड़ी पर चढ़ना आसान नहीं था। पाकिस्तानी सेना ऊंचाई पर थी। दिन में पाकिस्तानी सैनिक किसी को भी निशाना बना लेते थे। 
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हम बीस साथियों ने रात में बर्फीले तूफान को चीरते हुए पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू की। रात में पहाड़ी चढते और दिन में छिप जाते। हम लगातार दो रात चले। तीसरी रात की सुबह हमारा दस्ता टाइगर हिल की चोटी के पास था। अचानक पाक सैनिकों ने हमें देख लिया और गोलियों की बौछार कर दी। भारतीय जवानों ने भी इसका करारा जवाब दिसा और पाक के कई सैनिकों को मार गिराया।

तीन बंकरों पर भी कब्जा किया।

yogendra singh yadav Flying Tiranga after win battle of tiger hill in kargil

हम टीम पहाड़ी पर चढ़ गई थी, इस दौरान 14 साथी शहीद हो चुके थे। हम बस 7 लोग बचे थे और पहाड़ी पर पहुंचते ही दुश्मनों ने गोलीबारी शुरू कर दी। उनसे लड़ते हुए हमारे छह जवान घायल हो गए। मैं एक साथी का इलाज कर रहा था कि ग्रेनेड का एक हिस्सा पैर में लगा। उस समय लगा कि मेरा पैर कट गया है लेकिन मुझे विश्वास था कि जब तक सीने या सिर में गोली नहीं लगेगी तब तक मर नहीं सकता। कई गोलियां मेरे हाथ पैर में लगी और एक गोली गोली मेरे सीने में आकर लगी लेकिन 5 रुपए के सिक्के ने मेरी जान बचा ली।

योगेंद्र ने बताया कि 17 गोली लगने के बाद मैं बेहोश हो गया था। पाक सैनिक पैरो से मारमार जांच कर रहे थे कि कौन सा सैनिक जिंदा है। जब एक सैनिक ने मुझे पैर से मारा तो एहसास हुआ कि मैं जिंदा हूं। वो हमारी पोस्ट पर कब्जा करने की सोच रहे थे कि मैंने ठान लिया कि अब जिंदा या मुर्दा इनको खत्म करके दम लूंगा।

मैंने पाकिस्तानी सैनिकों पर ग्रेनेड फेंक दिया जिससे कुछ तो खत्म हो गए और कुछ छिप गए। मेरे पास हथियार तो थे लेकिन मेरा बायां हाथ और दोनों पैर गोलियों से छलनी हो चुके थे। मैं जमीन पर लेटकर एक हाथ से हथियार चलाने लगा। सभी पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया।

तीन बंकरों पर भी कब्जा किया। इसके बाद मैं बेहोश हो गया। जब आंख खुली तो पता चला कि मैं अस्पताल में हूं। होश आने पर पता चला कि भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना पर हमला कर टाइगर हिल पर पूरी तरह से फतह हासिल कर ली है। इस मैं 16 महीने तक अस्पताल में रहा। 

जंग को याद करते हुए योगेंद्र बताते हैं कि हमने 12 जून को तोलोलिंग पहाड़ी कर कब्जा किया। इसके बाद टाइगर हिल की चुनौती थी। हमने अपने जज्बे और साहस से दुश्मनों को मात देकर टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया। हम जीतना चाहते थे और जीते भी।

सबसे कम उम्र में मिला सम्मान
10 मई 1980 को जन्मे योगेंद्र सिंह यादव सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र पाने वाले योद्धा हैं। महज 19 साल की उम्र में जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में अप्रतिम शौर्य दिखाया था। इसके लिए उन्हें जनवरी 2000 को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने परमवीर चक्र से अलंकृत किया।

वहीं बरेली स्थित रूहेलखंड विश्वविद्यालय ने परमवीर योगेंद्र सिंह यादव को डीलिट् की मानद उपाधि देने का निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय में चार सितंबर को होने वाले दीक्षा समारोह में उन्हें यह उपाधि दी जाएगी।

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