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World Thalassemia Day: इस आनुवंशिक बीमारी से अनजान हैं दिल्ली-एनसीआर के युवा, शोध में कई खुलासे

Fri, 08 May 2026 06:20 AM IST
दुष्यंत शर्मा सिमरन, अमर उजाला, नई दिल्ली
सिमरन, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 08 May 2026 06:20 AM IST
सार

अधिकांश युवाओं को इस बीमारी का नाम तक नहीं पता, बल्कि इसके खतरे, जांच और बचाव के तरीकों की जानकारी भी बेहद सीमित है।

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World Thalassemia Day: Youth of Delhi-NCR are unaware of this genetic disease
थैलेसीमिया - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

दिल्ली-एनसीआर के हजारों युवा जीवन के सबसे अहम फैसले शादी और परिवार बसाने की दहलीज पर खड़े हैं लेकिन एक ऐसी गंभीर आनुवंशिक बीमारी से अब भी अनजान हैं, जो आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी को गहरे संकट में डाल सकती है। इसका नाम है थैलेसीमिया...। 

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यह एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें शरीर पर्याप्त या सामान्य हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता है। ऐसे में अधिकांश युवाओं को इस बीमारी का नाम तक नहीं पता, बल्कि इसके खतरे, जांच और बचाव के तरीकों की जानकारी भी बेहद सीमित है। दिल्ली-एनसीआर, भारत के युवा वयस्कों के बीच एक क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन शीर्षक से प्रकाशित यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल बीएमसी पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुआ है।
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अध्ययन के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर के केवल 36.8 प्रतिशत युवा वयस्कों ने कभी थैलेसीमिया शब्द के बारे में सुना था, जबकि मात्र 7.7 प्रतिशत लोगों के पास इस आनुवंशिक रक्त विकार के बारे में पर्याप्त ज्ञान पाया गया। शोधकर्ताओं ने इसे भारत के लिए गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बताया है। शोध में बताया गया है भारत में बीटा-थैलेसीमिया लक्षण यानी ट्रेट की व्यापकता लगभग 3.74 प्रतिशत है। 
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अध्ययन में यह भी कहा गया है कि देश में सजातीय विवाह और अंतर्विवाह की परंपरा के कारण इस रोग का जोखिम बढ़ जाता है। यह एक क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन था, जिसे दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न विश्वविद्यालयों में 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के 1585 युवा वयस्कों के बीच संचालित किया गया। 

महिलाओं और शिक्षित वर्ग में अधिक जागरूकता 
शोध के लिए पूर्व-परीक्षित और संशोधित साक्षात्कार अनुसूची का उपयोग किया गया, जिसमें कुल 31 प्रश्न शामिल थे। इनमें 11 प्रश्न ज्ञान, 10 प्रश्न दृष्टिकोण और 10 प्रश्न व्यवहार या अभ्यास से संबंधित थे। इसमें पर्याप्त और अपर्याप्त ज्ञान, दृष्टिकोण व व्यवहार का वर्गीकरण ब्लूम कट-ऑफ यानी 60 प्रतिशत मानक के आधार पर किया गया। अध्ययन के प्रमुख लेखक ओशी चौधरी ने बताया कि अध्ययन के परिणामों में पाया गया कि महिलाओं, मुस्लिम समुदाय, उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों, उच्च सामाजिक-आर्थिक वर्ग और पश्चिमी भारत से जुड़े लोगों में थैलेसीमिया को लेकर जागरूकता अपेक्षाकृत अधिक थी। 


कई लोगों में दिखा नाकारात्मक दृष्टिकोण 
शोधकर्ता आकांक्षा दुबे ने बताया कि केवल 7.7 प्रतिशत लोगों के पास पर्याप्त ज्ञान था। 86.7 प्रतिशत प्रतिभागियों ने सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदर्शित किया। शोधकर्ता कल्लूर नव सरस्वती ने बताया कि पर्याप्त ज्ञान होने के बावजूद कई लोगों में नकारात्मक दृष्टिकोण मौजूद था। शोधकर्ता रवि रंजन ने पाया कि जिनके पास थैलेसीमिया के बारे में पर्याप्त ज्ञान था, उनमें सकारात्मक व्यवहार अपनाने की संभावना अधिक थी। हालांकि, जानकारी पर्याप्त नहीं है। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि युवा वयस्कों को लक्षित करते हुए व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, ताकि वे भविष्य में विवाह और प्रजनन संबंधी निर्णय अधिक जिम्मेदारी के साथ ले सकें। 

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